गिरमिटिया से ग्लोबल लीडर तक: विदेशों में कैसे लिखी जा रही है भारतीय मूल के नेताओं की राजनीतिक कहानी?
संघर्ष से सफलता का सफर तय कर सात समंदर पार आज भारतवंशियों ने दुनिया की महाशक्तियों के सत्ता गलियारों में ...और पढ़ें

विदेशों में भारतवंशी का बढ़ता दबदबा।
HighLights
भारतवंशी 15 से अधिक देशों में 200 से ज्यादा महत्वपूर्ण पदों पर।
ऋषि सुनक, कमला हैरिस जैसे नेता शीर्ष पदों पर आसीन।
दादाभाई नौरोजी ब्रिटिश संसद में पहले भारतीय सांसद बने।
शुभम कुमार, नई दिल्ली। औपनिवेशिक काल के दौर में जिन भारतीयों को गिरमिटिया मजदूर बनाकर या मामूली प्रवासियों के रूप में सात समंदर पार भेजा गया था, आज उन्हीं के वंशजों ने दुनिया के ताकतवर देशों की सत्ता के गलियारों में ऐसी धाक जमाई है कि बड़े-बड़े राजनीतिक दिग्गज भी हैरान हैं।
ब्रिटेन के प्रधानमंत्री की कुर्सी संभालने से लेकर अमेरिका, कनाडा, मॉरीशस, गुयाना, पुर्तगाल और सूरीनाम जैसे देशों में राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और मंत्री पद तक का सफर तय करने वाले भारतवंशियों का यह इतिहास संघर्ष, योग्यता और सफलता की एक अद्भुत कहानी है।
ऐसे में अब सवाल यह है कि अबतक दुनियाभर के कितने देशों में भारतवंशियों ने चुनाव लड़े? विदेश में चुनाव लड़ने वाले इतिहास के सबसे पहले व्यक्ति कौन थे?अब तक कौन जीता और कौन हारा? और सबसे बड़ा सवाल विदेशी धरती पर चुनाव लड़ने के लिए क्या कानूनी योग्यताएं जरूरी होती हैं?
कितने देशों में और कौन-कौन शीर्ष पद पर?
एक रिपोर्ट के अनुसार, आज के समय में दुनिया के 15 से अधिक देशों में 200 से ज्यादा भारतवंशी महत्वपूर्ण नेतृत्वकारी और विधायी पदों पर हैं। अमेरिका, ब्रिटेन, कनाडा, दक्षिण अफ्रीका, सिंगापुर, न्यूजीलैंड, ऑस्ट्रेलिया, फिजी, गुयाना, मॉरीशस और त्रिनिदाद एवं टोबैगो जैसे देशों में भारतीय मूल के राजनेताओं ने सांसद (MP) से लेकर राष्ट्र प्रमुख तक का सफर तय किया है।

बात ब्रिटेन की, जब पीएम बन गए ऋषि सुनक
चार साल पहले की बात है, ब्रिटेन में अक्टूबर 2022 में ऋषि सुनक ने इतिहास रचते हुए वहां के पहले हिंदू और भारतीय मूल के प्रधानमंत्री के रूप में पदभार संभाला था। उनके अलावा प्रीति पटेल, सुएला ब्रेवरमैन और कई अन्य सांसद ब्रिटिश संसद में मजबूत पकड़ रखते हैं।
गुयाना राष्ट्रपति पद संभाल रहे भारतीय
बात अब गुयाना की करें तो, वहां के वर्तमान राष्ट्रपति इरफान अली और उपराष्ट्रपति भरत जगदेव दोनों भारतीय मूल के हैं। वहीं, सूरीनाम में 2020 से लेकर 2025 तक राष्ट्रपति रहने वाले चंद्रिकाप्रसाद संतोखी भी भारतीय वंशज है।
पुर्तगाल और आयरलैंड की
पुर्तगाल के पूर्व प्रधानमंत्री एंटोनियो कोस्टा का संबंध गोवा से था। वहीं आयरलैंड के पूर्व प्रधानमंत्री लियो वराडकर के पिता मुंबई से ताल्लुक रखते थे।
अमेरिका में तो रचा गया था इतिहास
इस बात में कोई दोराय नहीं है कि अमेरिका में कई भारतवंशी सांसद और गवर्नर है। हालांकि सबसे अहम बात यह है कि कमला हैरिस ने अमेरिका की पहली महिला, भारतीय-अमेरिकी और अश्वेत उपराष्ट्रपति बनकर इतिहास रचा।

इसके अलावा अमेरिकी कांग्रेस में समोसा कॉकस के नाम से मशहूर भारतीय-अमेरिकी सांसदों जैसे अमि बेरा, प्रमिला जयपाल, राजा कृष्णमूर्ति, रो खन्ना और थानेदार का प्रभाव भी लगातार बढ़ रहा है।
दुनिया में चुनाव लड़ने वाले सबसे पहले भारतवंशी कौन थे?
इस बात को ऐसे समझिए कि विदेशों में चुनाव लड़ने और संसद तक पहुंचने का भारत के नागरिकों का इतिहास काफी पुराना है।
ब्रिटेन में सबसे पहले- समय था 19वीं सदी के अंत का। इस समय दादामोहरा नौरोजी ने ब्रिटिश संसद का चुनाव लड़ा था। उन्हें 1892 के आम चुनाव में लिबरल पार्टी के टिकट पर फिन्सबरी सेंट्रल सीट से ऐतिहासिक जीत मिली थी।

दादा मोहरा नौरोजी ब्रिटिश हाउस ऑफ कॉमन्स के पहले भारतीय सांसद बने थे। उनके बाद मनचेरजी भावनगरी ने 1895 में कंजर्वेटिव पार्टी से जीत दर्ज की थी।
अमेरिका में सबसे पहले कौन?
बता दें कि संयुक्त राज्य अमेरिका में इतिहास रचने वाले पहले भारतीय-अमेरिकी दिलीप सिंह सौंद थे। उन्होंने 1956 के ऐतिहासिक चुनाव में कैलिफोर्निया के 29वें डिस्ट्रिक्ट से डेमोक्रेट पार्टी के उम्मीदवार के रूप में अमेरिकी प्रतिनिधि सभा का चुनाव जीता और 1957 में सांसद बने।

फिजी में सबसे पहले कौन?
फिजी के राजनीतिक इतिहास में एडी पटेल और बाद में महेंद्र चौधरी जैसे नेताओं ने भारतीय प्रवासियों के अधिकारों के लिए चुनाव लड़े। महेंद्र चौधरी साल 1999 में फिजी के पहले इंडो-फिजीशियन प्रधानमंत्री बने थे।
जीत और हार का लेखा-जोखा; कौन जीते और कौन हारे?
विदेशों में राजनीतिक सफर जीत और हार दोनों से मिलकर बनता है। जहां एक तरफ कई भारतवंशियों ने पहली बार में ही परचम लहराया, वहीं कई दिग्गजों को कड़े मुकाबलों में हार का भी सामना करना पड़ा। आइए उनके बारे में जानते हैं।
विदेशों में जीत की बड़ी कहानियां
इतिहास के पन्नों से देखें तो कनाडा की राजनीति में अनिता आनंद, हरजीत सज्जन और जगमीत सिंह एनडीपी के पहले भारतवंशी मुख्य नेताओं ने लगातार चुनाव जीतकर अपनी पार्टी और देश की राजनीति में शीर्ष स्थान हासिल किया।
मॉरीशस में सर शिवसागर रामगुलाम से लेकर प्रविंद जुगनाथ तक, अधिकांश प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति भारतीय मूल के रहे हैं, जिन्हें वहां की जनता ने भारी बहुमत से जिताया।
हार और संघर्ष के पहलू भी समझिए
इस बात को ऐसे समझा जा सकता है कि कि अमेरिका और ब्रिटेन में शुरुआती दौर में भारतीय मूल के उम्मीदवारों को नस्लीय भेदभाव और जेनोफोबिया यानी विदेशी विरोधी भावना का सामना करना पड़ा। शुरुआती दशकों में कई उम्मीदवार स्थानीय गोरे बहुल इलाकों में प्राइमरी चुनाव या आम चुनाव हार गए थे।
उदाहरण के लिए, जब दिलीप सिंह सौंद ने अमेरिका में चुनाव लड़ा था, तो उन्हें उनकी नस्ल और पृष्ठभूमि के कारण श्वेत बहुल मतदाताओं की तीखी आलोचना और विरोध का सामना करना पड़ा था, हालांकि उन्होंने अपनी मेहनत से उस बाधा को पार किया। हालिया चुनावों में भी कई भारतीय मूल के काउंसलर और मेयर पद के उम्मीदवार कड़े संघर्ष के बाद मामूली वोटों से पराजित हुए हैं, जो यह दर्शाता है कि यह राह आसान नहीं थी।
समझिए भारतीय वहां चुनाव के लिए कैसे पात्र बनते हैं?
गौरतलब है कि किसी भी देश में चुनाव लड़ने के लिए वहां का संविधान और स्थानीय कानून कड़े नियम तय करते हैं। भारतीय मूल के लोग इन कानूनी नियमों के आधारों पर विदेशों में चुनाव लड़ने के योग्य बनते हैं।
नागरिकता- दुनिया के लगभग सभी लोकतांत्रिक देशों जैसे अमेरिका, ब्रिटेन, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया में चुनाव लड़ने की बुनियादी शर्त यह है कि उम्मीदवार के पास उस देश की स्थायी नागरिकता होनी चाहिए।
भारत दोहरी नागरिकता की अनुमति नहीं देता हालांकि भारत सरकार ओसीआई/OCI कार्ड देती है, लेकिन ओसीआई धारक विदेशी धरती पर चुनाव नहीं लड़ सकते। इसलिए, चुनाव लड़ने वाले सभी भारतवंशी उन देशों के नागरिक बन चुके होते हैं।
निवास अवधि- कई देशों या स्थानीय काउंटियों में यह नियम होता है कि उम्मीदवार को एक निश्चित अवधि जैसे 1, 3 या 5 साल तक उस क्षेत्र का स्थायी निवासी होना अनिवार्य है।
कानूनी पात्रता और आयु सीमा- उम्मीदवार दिवालिया या किसी गंभीर आपराधिक मामले में दोषी नहीं होना चाहिए। साथ ही, उसे उस देश की निर्धारित न्यूनतम आयु सीमा जैसे सांसद या कमिश्नर के लिए 18, 21 या 25 वर्ष को पूरा करना होता है।
स्थानीय राजनीतिक दलों की सदस्यता- अधिकांश देशों में सीधे निर्दलीय जीतना कठिन होता है, इसलिए भारतवंशी वहां की मुख्य राजनीतिक पार्टियों जैसे डेमोक्रेट/रिपब्लिकन इन यूएस, लेबर/कंजर्वेटिव इन यूके, लिबरल इन कनाडा की स्थानीय प्राथमिक सदस्यता लेकर और पार्टी के इंटरनलप्राइमरी चुनाव जीतकर मैदान में उतरते हैं।
विदेशों में उनके इतिहास को चुनौती देते भारतवंशी
इस बात को ऐसे समझिए कि दुनिया के किसी भी कोने में जब कोई भारतवंशी जैसे शुचिता पटेल जैसी उभरती हस्तियां चुनावी मैदान में उतरती हैं, तो वे केवल एक पद के लिए नहीं लड़तीं, बल्कि वे उस सदियों पुराने इतिहास को चुनौती देती हैं, जहां कभी उन्हें अछूत या बेगाना समझा जाता था। अपनी बौद्धिक क्षमता, अटूट मेहनत और स्थानीय कानूनों के दायरे में रहकर चुनाव लड़ने की कला ने आज भारतवंशियों को ग्लोबल लीडरशिप की कतार में ला खड़ा किया है।
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