नया देश कैसे बनता है, कौन देता है दर्जा? अंतरराष्ट्रीय कानून और इतिहास के पन्नों से जानिए संप्रभुता का पूरा गणित
क्या कभी आपने सोचा है कि दुनिया के नक्शे पर कोई नया देश वजूद में कैसे आता है? अलग देश का दर्जा कौन देता है? क्या संयुक्त राष्ट्र के पास ऐसी कोई शक्ति ...और पढ़ें

कैसे बनता है नया देश?
HighLights
मोंटेवीडियो कन्वेंशन नए देश के लिए चार मानदंड तय करता है।
संयुक्त राष्ट्र सीधे देश को मान्यता नहीं देता, सदस्यता प्रक्रिया जटिल है।
मान्यता के लिए सुरक्षा परिषद और महासभा का समर्थन आवश्यक होता है।
डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। दुनिया के नक्शे पर किसी नए देश का उभरना सिर्फ एक भौगोलिक बदलाव नहीं होता, बल्कि यह एक बेहद जटिल कानूनी, राजनीतिक और कूटनीतिक प्रक्रिया है। इस बात को ऐसे समझा जा सकता है कि 2011 में दक्षिण सूडान के बाद से दुनिया ने किसी नए संप्रभु देश को आधिकारिक रूप से नक्शे पर जुड़ते नहीं देखा है।
ऐसे में क्या आपने कभी सोचा है कि अगर कल को कोई क्षेत्र खुद को आजाद घोषित कर दे, तो उसे देश का दर्जा कौन देगा? क्या संयुक्त राष्ट्र (यूएन) के पास नए देश बनाने की शक्ति है? आइए अंतरराष्ट्रीय कानून और इतिहास के चश्मे से इस पूरी प्रक्रिया को समझते हैं।
कौन से कानून तय करते हैं 'देश' की परिभाषा?
इस बात को ऐसे समझिए कि अंतरराष्ट्रीय कानून में किसी क्षेत्र को 'देश' मानने के लिए एक बुनियादी पैमाना तय है। साल 1933 में हुए मोंटेवीडियो कन्वेंशन के अनुच्छेद 1 के तहत किसी भी नए देश के पास चार बुनियादी योग्यताएं होनी चाहिए।
- स्थायी आबादी- वहां रहने वाले लोगों की एक निश्चित और स्थायी जनसंख्या हो।
- निश्चित सीमा (भूभाग)- एक ऐसा तय इलाका हो, जिस पर उसकी सीमाएं स्पष्ट हों, भलेही पड़ोसी देशों से सीमा विवाद चल रहा हो।
- प्रभावी सरकार- एक ऐसी शासन प्रणाली या सरकार हो, जो उस क्षेत्र के आंतरिक और बाहरी मामलों को संभालने में सक्षम हो।
- अंतरराष्ट्रीय संबंध बनाने की क्षमता- वह क्षेत्र दूसरे देशों के साथ संधियां, व्यापार और राजनयिक संबंध बनाने की कानूनी योग्यता रखता हो।
अब समझिए क्या यूएन देता है नए देश की मंजूरी?
आम तौर पर लोग मानते हैं कि संयुक्त राष्ट्र (UN) किसी नए देश को मान्यता देता है, लेकिन ये पूरी तरह से सच नहीं है। संयुक्त राष्ट्र खुद कोई देश या सरकार नहीं है, इसलिए वह किसी देश को मान्यता नहीं दे सकता।
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इस बात को ऐसे समझा जा सकता है कि नए देश को मान्यता देने का अधिकार केवल दुनिया के अन्य संप्रभु देशों के पास होता है। हालांकि, संयुक्त राष्ट्र की सदस्यता मिलना किसी भी नए देश के लिए अंतिम और सबसे बड़ी सफलता मानी जाती है। हां ये बात जरूर है कि इसकी प्रक्रिया बेहद कठिन है।
कितना कठिन है, ये भी समझिए
अंतरराष्ट्रीय कानून के अनुसार सबसे पहले नए देश को सुरक्षा परिषद (UNSC) के 15 सदस्यों में से कम से कम 9 सदस्यों का समर्थन चाहिए होता है। इसमें सबसे बड़ा पेंच यह है कि पांच स्थायी सदस्य अमेरिका, रूस, चीन, फ्रांस और ब्रिटेन में से कोई भी इसके खिलाफ वीटो का इस्तेमाल न करे।
अगर ये देश वीटो का इस्तेमाल नहीं करते हैं, तब इसे सुरक्षा परिषद की तरफ से हरी झंडी माना जाता है। इसके बाद मामला संयुक्त राष्ट्र महासभा (UNGA) में जाता है, जहां दो-तिहाई बहुमत की जरूरत होती है। साफ शब्दों में कहे तो 193 देशों में से कम से कम 129 देश से प्रस्ताव पास होना जरूरी है।
मान्यता के दो सिद्धांत- डिक्लेरेटरी बनाम कॉन्स्टिट्यूटिव
अब नई कड़ी के आधार पर नए देश के निर्माण को समझे तो नए देश की मान्यता को लेकर अंतरराष्ट्रीय कानूनविदों में दो तरह के विचार रहे हैं। पहला घोषणात्मक सिद्धांत, जिसे डिक्लेरेटरी कहा जाता है, जो ऊपर मैंने लिखा भी है और दूसरा घटक सिद्धांत, जिसे कॉन्स्टिट्यूटिव कहा जाता है।
घोषणात्मक सिद्धांत के अनुसार, अगर कोई क्षेत्र मोंटेवीडियो कन्वेंशन की चारों शर्तों को पूरा करता है, तो वह अपने आप में एक देश है, भले ही दूसरे देश उसे स्वीकार करें या न करें। ताइवान और सोमालीलैंड इसके उदाहरण हैं, जिनके पास अपनी सेना, पासपोर्ट और सरकार है, लेकिन वैश्विक मंच पर इन्हें व्यापक मान्यता नहीं मिली है।
अब दूसरी ओर घटक सिद्धांत के अनुसार, एक क्षेत्र तब तक देश नहीं बन सकता जब तक कि दुनिया के अन्य प्रमुख संप्रभु देश उसे आधिकारिक मान्यता न दे दें।
पीओजेके के उदाहरण से समझिए पूरा मामला
जब आत्मनिर्णय और नए देश की मांग की बात आती है, तो वर्तमान में पाकिस्तान के अवैध कब्जे वाले कश्मीर (PoJK) को उदाहरण में लिया जा सकता है। पूरे मामले को ऐसे समझिए कि पिछले कुछ समय से PoJK में हालात बेहद तनावपूर्ण बने हुए हैं। महंगाई, आटे-बिजली की किल्लत, मानवाधिकारों का हनन और पाकिस्तानी हुकूमत के दोहरे रवैये के खिलाफ वहां की जनता सड़कों पर है।
आंदोलन का नेतृत्व कर रही 'जॉइंट अवामी एक्शन कमेटी' (JAAC) और स्थानीय प्रदर्शनकारियों की ओर से अब न सिर्फ अधिकारों की, बल्कि पाकिस्तान से पूरी तरह अलग होने और आजादी की मांग भी तेजी से उठने लगी है।
क्या अलग देश बन सकता है POJK?
वहां के लोगों की मांग के इतर अंतरराष्ट्रीय कानून के नजरिए से देखा जाए तो यह मामला बेहद पेचीदा है। इस मामले में भारत का आधिकारिक रुख स्पष्ट है कि पूरा जम्मू-कश्मीर और लद्दाख भारत का अभिन्न हिस्सा है, जिसे पाकिस्तान ने जबरन कब्जाया हुआ है।
अंतरराष्ट्रीय नियमों के तहत, किसी भी क्षेत्र को नया देश बनने या आत्मनिर्णय का अधिकार तब बेहद मुश्किल हो जाता है जब वह पहले से ही किसी बड़े संप्रभु देश के ऐतिहासिक और कानूनी दावों का हिस्सा हो। चूंकि भारत का इस क्षेत्र पर मजबूत कानूनी और ऐतिहासिक दावा है, इसलिए वैश्विक मंचों पर पीओजेके के भीतर उठने वाली मांगों को सीधे तौर पर एक स्वतंत्र देश के रूप में मान्यता मिलना लगभग असंभव है।
इतिहास के तथ्य क्या?
ऐसे में ये कहना गलत नहीं होगा कि इतिहास गवाह है कि जब तक कोई मूल देश स्वेच्छा से अपने किसी हिस्से को अलग होने की अनुमति न दे (जैसे सूडान ने दक्षिण सूडान को दी), तब तक दुनिया के देश उस नए क्षेत्र को मान्यता देने से बचते हैं ताकि अंतरराष्ट्रीय सीमाओं की संप्रभुता का उल्लंघन न हो।
दुनिया नक्शे पर लकीर खींचना आसान, मुश्किल है पाना अधिकार
कुल मिलाकर नए देश के निर्माण को आप ऐसे भी समझ सकते हैं कि दुनिया के नक्शे पर एक लकीर खींच देना बेहद आसान है, लेकिन उस लकीर को दुनिया से संप्रभुता की मान्यता दिलाना सबसे कठिन काम है। मोंटेवीडियो के नियम जितने कानूनी हैं, नए देश का उदय उससे कहीं ज्यादा राजनीतिक और कूटनीतिक समीकरणों पर निर्भर करता है।
ऐसे में जब तक महाशक्तियों के हित और अंतरराष्ट्रीय सर्वसम्मति किसी नए क्षेत्र के पक्ष में न हो, तब तक कोई भी आंदोलन या स्व-घोषित स्वतंत्रता केवल इतिहास के पन्नों में एक अधूरा संघर्ष बनकर रह जाती है।
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