काला पानी जेल: ब्रिटिश काल का वह नरक जहां क्रांतिकारियों की आवाज को दबाया गया
अंडमान की सेलुलर जेल, जिसे 'काला पानी' कहा जाता है, ब्रिटिश राज में क्रांतिकारियों की आवाज़ दबाने का एक क्रूर प्रयास थी। ...और पढ़ें

सेलुलर जेल ब्रिटिशों द्वारा क्रांतिकारियों को चुप कराने की कोशिश थी

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डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। भारत इस बार अपन 80वां स्वतंत्रता दिवस मानेगा इससे पहले आइए जानते हैं ‘काला पानी’ के बारे में वह जेल जो क्रांतिकारियों की आवाज दबाने और भारत के स्वतंत्रता सेनानियों को चुप कराने की ब्रिटिश कोशिश के तहत बनाई गई थी।
अंडमान द्वीप समूह में बनी सेलुलर जेल एक ऐसी जगह बन गई जहां कैदियों को घर से दूर अकेलेपन, ज़बरदस्ती काम करने, यातना और कड़ी सजा का सामना करना पड़ा।
फिर भी, उनका विरोध और बलिदान भारत की आजादी की लड़ाई का एक अहम हिस्सा बन गया। आज, यह जेल उस कीमत की याद दिलाती है जो आजादी के लिए चुकानी पड़ी थी, और उन विचारों की भी जिन्हें अंग्रेज कभी कैद नहीं कर पाए।

जबरदस्ती का निर्वासन
1906 में बनकर तैयार हुई इस जेल में एक सेंट्रल वॉचटावर से सात विंग्स निकलते थे, जिनमें 693 एकांत कोठरियां थीं। हर कैदी को अकेले रखा जाता था। उन्हें दूसरों से बात करने, मिलने या एकजुट होने का कोई मौका नहीं मिलता था।
अंग्रेजों को सबसे ज्यादा डर इस बात का था कि कहीं कैदी अपने विचारों को एक आंदोलन का रूप न दे दें। इन कोठरियों के अंदर जिंदगी भयानक थी. यहां अंधेरा, उदासी, भूख और 24 घंटे निगरानी। दूर अंडमान में निर्वासित कर ब्रिटिश हुकूमत यह सुनिश्चित करना चाहती थी कि क्रांतिकारी मुख्य भूमि से पूरी तरह कट जाएं और उनकी आवाज कहीं न पहुंचे।
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कठोर मेहनत के लिए मजबूर
आजादी की लड़ाई लड़ने वालों से बहुत थका देने वाला काम करवाया जाता था। हाथों से सरसों का तेल निकालना और नारियल के छिलकों से रेशा तैयार करना रोजमर्रा की सजा बन गई थी। रोज़ाना काम के कड़े लक्ष्य तय किए जाते थे और लक्ष्य पूरा न होने पर भारी सजा मिलती थी।
यह जेल कैदियों के शरीर और हौसले, दोनों को तोड़ने के लिए बनाई गई थी। लेकिन कैदियों ने चुप रहने से इनकार कर दिया। वे यातना सहते हुए भी अपने विचारों और संघर्ष की भावना को जीवित रखे रहे।

तीन शहीदों का बलिदान
महावीर सिंह, मोहन किशोर नामदास और मोहित मोइत्रा की मौत जबरदस्ती खाना खिलाए जाने के बाद भूख हड़ताल के दौरान हो गई। उनकी मौत से पूरे भारत में आक्रोश फैल गया और काला पानी में राजनीतिक कैदियों के साथ किए जाने वाले बर्ताव पर फिर से सबका ध्यान गया।
क्या अंग्रेज आक्रोश को दबा पाए?
नहीं। इन तीन शहीदों के बलिदान ने राजनीतिक कैदियों के मानवीय अधिकारों और स्वतंत्रता संग्राम की क्रूर हकीकत को देशभर में उजागर कर दिया।
स्वतंत्रता आंदोलन को नई ऊर्जा
बढ़ते आक्रोश और बार-बार हो रहे विरोध-प्रदर्शनों ने अंग्रेजों पर दबाव डाला। महात्मा गांधी और रवींद्रनाथ टैगोर ने बेहतर व्यवहार और राजनीतिक कैदियों की रिहाई की मांगों का समर्थन किया।
1930 के दशक के आखिर तक, राजनीतिक कैदियों को धीरे-धीरे रिहा कर दिया गया। वे क्रांतिकारी जो काला पानी से बचकर वापस आए, उन्होंने अपनी कहानियों से पूरे देश को प्रेरित किया और स्वतंत्रता आंदोलन को नई ऊर्जा दी।
क्रांतिकारी विरासत: सेलुलर जेल राष्ट्रीय स्मारक
विनायक दामोदर सावरकर, बटुकेश्वर दत्त और योगेंद्र शुक्ला जैसे स्वतंत्रता सेनानियों को सेलुलर जेल में कैद रखा गया था। आज यह उन लोगों के सम्मान में एक राष्ट्रीय स्मारक के रूप में खड़ा है जिन्होंने भारत की आजादी के लिए लड़ाई लड़ी।

अंग्रेजों ने भारत के क्रांतिकारियों को अलग-थलग करने और उनकी आवाज दबाने की कोशिश की, लेकिन उनका विरोध कायम रहा। काला पानी की दीवारें विचारों को कैद नहीं कर सकीं। वे दीवारें आज भी याद दिलाती हैं कि आजादी की कीमत कितनी भारी थी और क्रांतिकारियों का हौसला कितना अटूट था।