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    अब चांद दूर नहीं! Moon की मिट्टी से ऑक्सीजन निकालने की तैयारी, अंतरिक्ष में बदलेगी इंसान की दुनिया

    Updated: Thu, 28 May 2026 12:07 AM (IST)

    विज्ञानियों ने चांद की मिट्टी (रेगोलिथ) से ऑक्सीजन निकालने की तकनीक पर काम तेज कर दिया है, ताकि भविष्य में चंद्रमा पर स्थायी ठिकाने बनाए जा सकें। ...और पढ़ें

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    चांद की मिट्टी से ऑक्सीजन निकालने की तैयारी (फोटो-रॉयटर्स)

    HighLights

    1. चांद की मिट्टी से ऑक्सीजन निकालने का प्रयास।

    2. सौर वैक्यूम पायरोलिसिस तकनीक का उपयोग।

    3. स्थायी चंद्र ठिकाने बनाने की दिशा में कदम।

    डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। अब अंतरिक्ष की दौड़ सिर्फ चांद पर पहुंचने तक सीमित नहीं रह गई है। अमेरिका और चीन जैसे शक्तिशाली देश अब चांद पर स्थायी ठिकाना बनाने की तैयारी में जुट गए हैं।

    उद्देश्य साफ है ऐसी तकनीक तैयार करना, जिससे इंसान लंबे समय तक चांद पर रह सके और आगे मंगल ग्रह तक की यात्रा आसान हो जाए। इसी तैयारी के बीच विज्ञानियों ने एक ऐसी तकनीक पर काम तेज कर दिया है, जो भविष्य में अंतरिक्ष की तस्वीर बदल सकती है।

    चांद की मिट्टी से ही ऑक्सीजन निकालने की कोशिश

    विज्ञानी अब चांद की मिट्टी से ही ऑक्सीजन निकालने की कोशिश कर रहे हैं, ताकि अंतरिक्ष यात्रियों को सांस लेने के लिए धरती पर निर्भर न रहना पड़े।

    दरअसल, चांद की सतह पर मौजूद धूल और पत्थरों की परत को रेगोलिथ कहा जाता है। यही रेगोलिथ अब विज्ञानियों के लिए उम्मीद बन चुका है। इसमें करीब 40 से 45 प्रतिशत तक आक्सीजन मौजूद होती है, लेकिन यह गैस के रूप में नहीं बल्कि धातुओं के साथ रासायनिक रूप में जुड़ी रहती है।

    विज्ञानी इसी बंधन को तोड़कर आक्सीजन निकालने की कोशिश कर रहे हैं। अगर यह तकनीक सफल हो गई, तो चांद पर पानी, आक्सीजन, राकेट ईंधन और निर्माण सामग्री तक वहीं तैयार की जा सकेगी।

    इससे धरती से भारी सामान भेजने की जरूरत बहुत कम हो जाएगी और अंतरिक्ष मिशनों का खर्च भी घटेगा।सूरज की गर्मी से पिघलेगी चांद की मिट्टीविज्ञानी इस प्रक्रिया के लिए सोलर वैक्यूम पाइरोलिसिस तकनीक का इस्तेमाल कर रहे हैं।

    इसमें सूरज की किरणों को खास शीशों और लेंस की मदद से एक छोटे हिस्से पर केंद्रित किया जाता है। इससे तापमान हजारों डिग्री तक पहुंच जाता है।

    इसी तेज गर्मी में चांद की मिट्टी पिघलने लगती है और उसमें मौजूद ऑक्साइड टूटकर ऑक्सीजन छोड़ने लगते हैं।फ्रांस के विज्ञानियों ने दुनिया की सबसे बड़ी सोलर फर्नेस में इसका सफल परीक्षण भी किया है। वहां दो मीटर चौड़े परावर्तक सूरज की रोशनी को लगभग 10 हजार गुना तक केंद्रित करते हैं, जिससे तापमान 3000 डिग्री सेल्सियस से ऊपर पहुंच जाता है।

    विज्ञानियों ने चांद जैसी मिट्टी के छोटे नमूनों को वैक्यूम चैम्बर में रखकर गर्म किया। करीब 1200 डिग्री पर मिट्टी पिघलने लगी और 2000 डिग्री तक पहुंचते ही ऑक्सीजन निकलनी शुरू हो गई।शुरुआती परीक्षण में 3.38 ग्राम मिट्टी से 35 मिलीग्राम ऑक्सीजन निकाली गई। मात्रा अभी कम है, लेकिन विज्ञानियों का कहना है कि यह सिर्फ शुरुआत है।

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    इस प्रक्रिया के बाद मिट्टी कांच जैसी संरचना में बदल गई, जिसमें कई उपयोगी खनिज भी मिले। यानी भविष्य में चांद की मिट्टी से सिर्फ ऑक्सीजन ही नहीं, बल्कि घर, उपकरण और निर्माण सामग्री भी बनाई जा सकेगी।

    क्या है चुनौती?

    अब चुनौती तकनीक को चांद के असली माहौल में सफल बनाने कीविज्ञानियों के सामने अभी कई बड़ी चुनौतियां हैं। उन्हें ऐसी मशीनें बनानी होंगी जो चांद की खतरनाक धूल, तेज रेडिएशन और अत्यधिक तापमान बदलाव को झेल सकें।

    निकली हुई ऑक्सीजन को सुरक्षित तरीके से जमा करना, शुद्ध करना और इस्तेमाल करना भी बड़ी चुनौती होगी। साथ ही चांद की मिट्टी को इकट्ठा कर उसे रिएक्टर तक पहुंचाने की व्यवस्था भी तैयार करनी होगी।

    फिर भी विज्ञानियों को भरोसा है कि आने वाले समय में यही तकनीक इंसान को चांद पर बसाने की सबसे बड़ी ताकत बनेगी। जिस चांद को अब तक सिर्फ दूर से देखा गया, वहां अब इंसान सांस लेने और रहने की तैयारी कर रहा है। आने वाले वर्षों में शायद चांद सिर्फ सपना नहीं, इंसानों की नई दुनिया बन जाए।

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