टाटा स्टील लिमिटेड को सुप्रीम कोर्ट से बड़ी राहत, बांबे हाई कोर्ट का वसूली आदेश हुआ खारिज
आईबीसी के तहत नई शुरुआत के सिद्धांत को मजबूत करने वाले एक अहम फैसले में जस्टिस मनोज मिश्रा और जस्टिस मनमोहन की पीठ ने भूषण स्टील लिमिटेड के लिए सफल सम ...और पढ़ें

आईबीसी के तहत समाधान योजना मंजूर होने पर खत्म हो जाते हैं लंबित मामले व दावे : सुप्रीम कोर्ट (फोटो- एएनआई)
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आईबीसी के तहत समाधान योजना मंजूर होने पर खत्म हो जाते हैं लंबित मामले व दावे : सुप्रीम कोर्टॉ
बांबे हाई कोर्ट का फैसला रद कर मंजूर की टाटा स्टील लिमिटेड की अपील
योजना मंजूर होने के बावजूद हाई कोर्ट ने दी थी वसूली का मामला बढ़ाने की इजाजत
पीटीआई, नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को कहा कि इंसाल्वेंसी एंड बैंकरप्सी कोड (आइबीसी) के तहत समाधान योजना मंजूर होने के बाद दिवालियापन से पहले के लंबित दीवानी मामले व मध्यस्थता की कार्यवाही एवं संचालनात्मक दावे (ऑपरेशनल क्लेम) जारी नहीं रह सकते, बशर्ते ऐसे क्लेम निर्धारित न हो गए हों और मंजूर योजना का हिस्सा न बन गए हों।
आइबीसी के तहत नई शुरुआत के सिद्धांत को मजबूत करने वाले एक अहम फैसले में जस्टिस मनोज मिश्रा और जस्टिस मनमोहन की पीठ ने भूषण स्टील लिमिटेड के लिए सफल समाधान की आवेदक टाटा स्टील लिमिटेड की अपील को मंजूर कर लिया।
साथ ही बांबे हाई कोर्ट के उन फैसलों को रद कर दिया जिनमें समाधान योजना मंजूर होने के बावजूद आपरेशनल क्रेडिटर को वसूली का मामला (रिकवरी सूट) आगे बढ़ाने की इजाजत दी गई थी।
पीठ ने फैसले में कहा, "समाधान योजना को ध्यान से पढ़ने के बाद कोर्ट का मानना है कि नेशनल कंपनी ला ट्रिब्यूनल (एनसीएलटी) से मंजूरी मिलने की तिथि तक निश्चित दावों में परिवर्तित नहीं हुई सभी कानूनी कार्यवाहियां खत्म, रद या वापस ली हुए मानी जाएंगी। इनमें मध्यस्थता और दीवानी मामले शामिल हैं। सिर्फ प्रभावी तिथि (यानी 18 मई, 2018) पर निश्चित हो चुके दावे ही आनुपातिक आधार पर चुकाने योग्य हैं।
तदनुसार प्रतिवादी-1 वर्षा एवं द इंटरवेनर-मैसिक को एक-एक रुपये से अधिक कोई रकम नहीं दी जानी थी, क्योंकि समाधान योजना को मंजूरी मिलने के बाद उनकी लंबित मध्यस्थता व दीवानी कार्यवाही खत्म हो गई या वापस ले ली गई।"
फैसले में मौजूदा दिवालियापन प्रणाली के तहत छोटे ऑपरेशनल क्रेडिटर्स, खासकर माइक्रो, स्माल और मीडियम इंटरप्राइजेज (एमएसएमई) को होने वाली दिक्कतों को स्वीकार किया गया।
मौजूदा कानूनी ढांचे की वैधता को पुष्ट करते हुए पीठ ने कहा कि एमएसएमई और अन्य छोटे ऑपरेशनल क्रेडिटर्स अक्सर भुगतान के क्रम में सबसे नीचे रहते हैं और दिवालियापन की कार्यवाही से होने वाले वित्तीय नुकसान को झेलने में उन्हें कठिनाई का सामना करना पड़ सकता है।
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पीठ ने सुझाव दिया कि विधि आयोग और संसद को इस बात की जांच करनी चाहिए कि क्या ऐसे क्रेडिटर्स को भुगतान का बेहतर तरीका उपलब्ध कराने के लिए दिवालियापन समाधान प्रक्रिया की दक्षता से समझौता किए बिना आईबीसी में सुधार की आवश्यकता है।
इस अदालत का मानना है कि आईबीसी, एमएसएमई व वैधानिक स्थानीय निकायों समेत छोटे ऑपरेशनल क्रेडिटर्स की स्थिति पर ठीक से ध्यान नहीं देता।
यह विवाद भूषण स्टील की कॉरपोरेट दिवालियापन समाधान प्रक्रिया के दौरान ऑपरेशनल क्रेडिटर्स- वर्षा और मैसिक प्रोजेक्ट्स प्राइवेट लिमिटेड के दावों से शुरू हुआ था। उनके दावों पर पहले से दीवानी व मध्यस्थता की कार्यवाही चल रही थी। समाधान पेशेवर ने इनके दावों को एक रुपये की सांकेतिक कीमत पर स्वीकार किया था क्योंकि वे विवादित थे।
शीर्ष अदालत ने कहा कि समाधान योजना को मंजूरी देने से पहले तैयार की गई लेनदारों की अंतिम सूची में इन्हें एक रुपये के निर्धारित दावों के तौर पर दिखाया गया था। उस अंतिम सूची को किसी ने चुनौती नहीं दी थी। नतीजतन मंजूर समाधान योजना सभी पक्षों पर लागू हो गई।