आज से दिल्ली में सरकारी बैंकों का दो दिवसीय सम्मेलन, पीएम मोदी के संकल्प को आगे बढ़ाने पर होगा मंथन
दिल्ली में 17-18 अगस्त को 'पीएसबी कॉन्फ्लुएंस' में प्रधानमंत्री मोदी के भारतीय बैंकों को वैश्विक शीर्ष पांच में लाने के महत्वाकांक्षी लक्ष्य पर मंथन होगा।

दिल्ली में सरकारी बैंकों का दो दिवसीय सम्मेलन।
HighLights
दिल्ली में 'पीएसबी कॉन्फ्लुएंस' में बैंकिंग लक्ष्य पर चर्चा।
भारतीय बैंकों को वैश्विक शीर्ष पांच में लाने का लक्ष्य।
एनपीए समाधान, ग्रामीण बैंकिंग सुधारों पर विशेष जोर।
जयप्रकाश रंजन, नई दिल्ली। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 15 अगस्त 2026 को लाल किले की प्राचीर से स्वतंत्रता दिवस के अपने संबोधन में देश के बैंकिंग क्षेत्र के लिए एक महत्वाकांक्षी लक्ष्य रखा था। उन्होंने कहा कि आज भारत का बैंकिंग सेक्टर तेजी से आगे बढ़ रहा है, इसलिए कम से कम एक भारतीय बैंक दुनिया के शीर्ष पांच बैंकों में शामिल होना चाहिए।
इसी संकल्प को धरातल पर उतारने की दिशा में आगे किस तरह से बढ़ा जाएगा, इस पर वित्त मंत्रालय के वित्तीय सेवा विभाग (डीएफएस) की तरफ से 17-18 अगस्त को नई दिल्ली में आयोजित दो दिवसीय ‘पीएसबी कॉन्फ्लुएंस’ में विचार होगा।
यह बैठक सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों (पीएसबी) और सार्वजनिक वित्तीय संस्थानों के शीर्ष नेतृत्व को एक मंच पर लाकर बैंकिंग सेक्टर को लेकर प्रधानमंत्री के विजन पर विमर्श करने का मौका देगा।
सम्मेलन का उद्देश्य सहयोगपूर्ण संवाद
वित्त मंत्रालय की तरफ से बताया गया है कि सम्मेलन का उद्देश्य सहयोगपूर्ण संवाद, सर्वोत्तम प्रथाओं का आदान-प्रदान और समयबद्ध, व्यावहारिक रणनीतियां तैयार करना है, जिनका फोकस नागरिक-केंद्रित परिणामों पर होगा।
इसमें जमा संग्रहण, युवाओं के लिए बैंकिंग, निवेश चक्र को समर्थन, वैश्विक क्षमता बढ़ाने वाले केंद्रों की स्थापना, कृषि एवं बागवानी व इंफ्रास्ट्रक्चर क्षेत्र पर फोकस बढ़ाने, क्रेडिट कार्ड व्यवसाय को नये सिरे से मजबूत बनाने और प्राथमिकता क्षेत्र ऋण जैसे विषयों पर खास तौर पर चर्चा होगी।
देश की विशाल जरुरत के हिसाब से सस्ते कर्ज के लिए संसाधन उपलब्ध कराने, ग्रामीण क्षेत्रों में बैंकिंग व्यवस्था को और मजबूत बनाने के अलावा वंचित वर्गों तक औपचारिक ऋण पहुंचाने पर भी जोर होगा।
इसमें पीएसबी के चेयरमैन, प्रबंध निदेशक और कार्यकारी निदेशक के साथ-साथ नाबार्ड, एग्जिम बैंक, सिडबी, एनएचबी, आईआईएफसीएल, आईएफसीआई और नाबफिड जैसे सार्वजनिक वित्तीय संस्थानों के वरिष्ठ अधिकारी तथा इंडियन बैंक्स एसोसिएशन और डीएफएस के अधिकारी शामिल होंगे।
विश्व के शीर्ष पांच बैंकों में शामिल होने के लिए तय करना होगा लंबा सफर
अगर भारतीय बैंकिंग सेक्टर की मौजूदा स्थिति देखें तो यह साफ होता है कि मौजूदा स्वरूप में विश्व के शीर्ष पांच बैंकों में शामिल होने के लिए काफी लंबा सफर तय करना होगा। देश का सबसे बड़ा बैंक भारतीय स्टेट बैंक (एसबीआई) है, जिसका वर्तमान बाजार पूंजीकरण लगभग 103 अरब डॉलर (करीब 10 लाख करोड़ रुपये) और पूंजी आधार (इक्विटी) लगभग 6.2 लाख करोड़ रुपये है।
विश्व के शीर्ष-5 बैंकों (जिनका बाजार पूंजीकरण 300-350 अरब डॉलर से ज्यादा हो) में शामिल होने के लिए इसे अपना बाजार पूंजीकरण लगभग तीन गुना बढ़ाकर 300 अरब डॉलर से अधिक करना होगा यानी अतिरिक्त 200 अरब डॉलर की वृद्धि।
जबकि सरकारी क्षेत्र के दूसरे सबसे बड़े बैंक पीएनबी का बाजार पूंजीकरण मात्र लगभग 14 अरब डॉलर (1.35-1.36 लाख करोड़ रुपये) और पूंजी आधार करीब 1.5 लाख करोड़ रुपये है। इसे शीर्ष-5 में जगह पाने के लिए 20 गुना से ज्यादा की वृद्धि करनी होगी, जो वर्तमान स्तर से बहुत दूर है।
देश का दूसरा सबसे बड़ा बैंक निजी क्षेत्र का एचडीएफसी बैंक है, जिसका बाजार पूंजीकरण लगभग 120 अरब डॉलर (11.2-11.5 लाख करोड़ रुपये) और पूंजी आधार करीब 6 लाख करोड़ रुपये है। इसे भी शीर्ष-5 में प्रवेश के लिए लगभग ढाई से तीन गुना अपना कारोबार बढ़ाना होगा।
एसबीआई और पीएनबी के एकीकरण से भी आसान नहीं राह
यदि भारत के शीर्ष दो सरकारी बैंकों एसबीआई और पीएनबी का एकीकरण हो जाए तो संयुक्त बाजार पूंजीकरण लगभग 117 अरब डॉलर और पूंजी आधार करीब 7.7 लाख करोड़ रुपये हो जाएगा, जबकि कुल संपत्ति लगभग 1.1 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंच सकती है। इससे ये दोनों मिल कर वैश्विक स्तर पर शीर्ष-30 के आसपास पहुंच सकते हैं लेकिन फिर भी शीर्ष पांच से दूर ही होगा।
जानकार बताते हैं कि पीएम मोदी ने उक्त लक्ष्य दीर्घकालिक तौर पर रखा है जो संभव है। एक अनुमान है कि वर्ष 2047 भारतीय अर्थव्यवस्था का आकार मौजूदा तकरीबन चार ट्रिलियन डॉलर से बढ़ कर 30 ट्रिलियन डालर के करीब हो सकता है तब भारतीय बैंक भी शीर्ष पांच बैंकों में शामिल होने की स्थिति में संभवत: होंगे।
भारतीय बैंकिंग सेक्टर की स्थिति तुलनात्मक तौर पर काफी अच्छी
जहां तक मोदी सरकार के कार्यकाल की बात है तो आज भारतीय बैंकिंग सेक्टर की स्थिति तुलनात्मक तौर पर काफी अच्छी है। इसके लिए सरकार की तरफ से कई ठोस कदम उठाए गए हैं। सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों का विलय कर बड़े और अधिक प्रतिस्पर्धी बैंक बनाए गए, जिससे पैमाने की अर्थव्यवस्था, बेहतर जमा संग्रहण और बड़े कर्ज देने की क्षमता बढ़ी।
दिवालियापन और दिवालियापन संहिता (आईबीसी) के माध्यम से एनपीए की समस्या का प्रभावी समाधान किया गया, जिसके परिणामस्वरूप सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों का सकल एनपीए अनुपात एक समय के उच्च स्तर से घटकर लगभग 2 फीसद के आसपास आ गया है।
बैंकों की लाभप्रदाता रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गई है और वे अब बाजार से पूंजी जुटाने में सक्षम हो गए हैं। इन प्रयासों ने भारतीय बैंकों को वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धा करने के लिए मजबूत आधार प्रदान किया है।

