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    'SIR प्रक्रिया से नागरिकता का निर्धारण नहीं', सुप्रीम कोर्ट ने कहा- आयोग को संदिग्ध मामले केंद्र सरकार को भेजने होंगे

    By Mala DixitEdited By: Sakshi Gupta
    Updated: Thu, 28 May 2026 12:15 AM (IST)

    सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि चुनाव आयोग को मतदाता सूची में नाम दर्ज करने की पात्रता जांचने के लिए नागरिकता की जांच करने का अधिकार है। ...और पढ़ें

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    SIR पर सुप्रीम कोर्ट

    HighLights

    1. चुनाव आयोग को मतदाता सूची में नागरिकता जांचने का अधिकार।

    2. यह जांच नागरिकता का औपचारिक निर्धारण नहीं करती।

    3. आयोग को संदिग्ध मामले केंद्र सरकार को भेजने होंगे।

    माला दीक्षित, नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव द्वारा नागरिकता की जांच करने को लेकर उठ रहे सवालों पर कहा कि एसआइआर प्रक्रिया सही अर्थों में नागरिकता का निर्धारण नहीं, बल्कि यह केवल मतदाता सूची में नाम दर्ज कराने की पात्रता की जांच तक सीमित है।

    ऐसी जांच पूरी तरह से चुनाव आयोग के संवैधानिक अधिकार क्षेत्र में आती है और किसी अन्य अथारिटी के अधिकार क्षेत्र का अतिक्रमण नहीं करती।

    सुप्रीम कोर्ट के निर्देश

    शीर्ष अदालत ने कहा कि यहां मुद्दा नागरिकता के औपचारिक निर्धारण का नहीं, बल्कि आयोग द्वारा अपने संवैधानिक कार्यों के निर्वहन में की जाने वाली जांच के दायरे का है।

    संविधान के अनुच्छेद-325 व 326 और जनप्रतिनिधित्व कानून के प्रविधानों को एक साथ पढ़ने पर, आयोग का यह दायित्व है कि वह ऐसे व्यक्तियों की मतदाता सूची तैयार करे, जो मतदाता के रूप में पंजीकृत होने की योग्यता रखते हैं।

    जनप्रतिनिधित्व कानून की धारा-16 स्पष्ट रूप से गैर-नागरिकों को मतदाता सूची में पंजीकृत करने से अयोग्य ठहराती है। इस प्रविधान से स्पष्ट है कि मतदाता के रूप में नामांकन के लिए नागरिकता एक अनिवार्य शर्त है।

    इसलिए आयोग वैध मतदाता सूची बनाए रखने के अपने दायित्व का तब तक निर्वहन नहीं कर सकता, जब तक वह संतुष्ट न हो जाए कि उसमें शामिल व्यक्ति इस न्यूनतम आवश्यकता को पूरा करते हैं।

    कोर्ट ने कहा कि धारा-16 की कानूनी जरूरत के मद्देनजर नि:संदेह आयोग को मतदाता सूची तैयार करने या उसमें संशोधन करने के दौरान नागरिकता से जुड़े सवालों की जांच करने का अधिकार है।

    ऐसी जांच केवल मतदाता सूची में नाम शामिल करने या हटाने का फैसला करने के नजरिये से ही की जा सकती है। महत्वपूर्ण यह है कि इस पूरी प्रक्रिया की न्यायिक समीक्षा की जा सकती है, जिससे यह सुनिश्चित होता है कि जांच कानून के अनुसार और प्रक्रियागत निष्पक्षता से ही की जाए।

    अदालत ने कहा कि जहां किसी व्यक्ति द्वारा दी गई सामग्री से विश्वास पैदा नहीं होता या कोई संदेह उत्पन्न होता है, वहां आयोग के पास नामांकन से इन्कार करने या नाम हटाने का अधिकार है। लेकिन इसका अर्थ कोई ऐसी घोषणा नहीं है कि वह व्यक्ति भारत का नागरिक नहीं है।

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    यह केवल यह दर्शाता है कि चुनावी उद्देश्यों के लिए आयोग इस बात से संतुष्ट नहीं हो पाया कि वैधानिक शर्तें पूरी हुई हैं। ये किसी व्यक्ति के चुनावी प्रक्रिया में भाग लेने या मतदाता सूची में शामिल होने के अधिकार को प्रभावित करता है, लेकिन व्यक्ति को नागरिकता के दावे से वंचित नहीं करता, न ही नागरिकता अधिनियम के तहत सक्षम प्राधिकारी द्वारा इस प्रश्न के निर्धारण के मार्ग को अवरुद्ध करता है।

    आयोग के लिए यह अनिवार्य है कि वह ऐसे मामलों को कानून के मुताबिक निर्णय के लिए केंद्र सरकार के सक्षम प्राधिकारी को भेजे।

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