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    18 जुलाई को सातवें आसमान पर स्काईरूट, अंतरिक्ष में विक्रम-1 के आगमन का अब्दुल कलाम कनेक्शन

    Updated: Sat, 18 Jul 2026 10:23 PM (IST)

    भारत ने निजी क्षेत्र की कंपनी स्काईरूट एयरोस्पेस के विक्रम-1 रॉकेट के सफल प्रक्षेपण के साथ अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था में नया अध्याय लिखा है। ...और पढ़ें

    अंतरिक्ष में विक्रम-1 के आगमन का अब्दुल कलाम कनेक्शन।

    अंतरिक्ष में विक्रम-1 के आगमन का अब्दुल कलाम कनेक्शन।

    HighLights

    1. स्काईरूट एयरोस्पेस ने विक्रम-1 रॉकेट का सफल प्रक्षेपण किया।

    2. भारत का पहला निजी ऑर्बिटल लॉन्च व्हीकल अंतरिक्ष में।

    3. निजी क्षेत्र की अंतरिक्ष क्षमता में भारत तीसरा देश।

    जागरण न्यूज नेटवर्क, नई दिल्ली। भारत के अंतरिक्ष इतिहास में शनिवार का दिन स्वर्णाक्षरों में दर्ज हो गया। जिस देश ने कभी साइकिल और बैलगाड़ी पर रॉकेट के पुर्जे ढोकर अंतरिक्ष अभियान की शुरुआत की थी और भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) के बलबूते किफायती और सटीक अभियानों में सिरमौर बने, उसी भारत ने अब निजी क्षेत्र के दम पर अंतरिक्ष में नई इबारत लिख दी है।

    हैदराबाद की निजी कंपनी स्काईरूट एयरोस्पेस ने श्रीहरिकोटा स्थित सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र से स्वदेशी तकनीक से लैस विक्रम-1 रॉकेट का सफल प्रक्षेपण कर देश को अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था के नए दौर में पहुंचा दिया। यह भारत का पहला निजी तौर पर विकसित आर्बिटल लांच व्हीकल है, जिसने सफलतापूर्वक पृथ्वी की निचली कक्षा (लो अर्थ आर्बिट) में प्रवेश किया।

    इसके साथ ही भारत निजी क्षेत्र की आर्बिटल लांच क्षमता हासिल करने वाला अमेरिका और चीन के बाद दुनिया का तीसरा देश बन गया। प्रक्षेपण के समय स्काईरूट के संस्थापक एवं इसरो के पूर्व विज्ञानी पवन कुमार चंदना और नागा भारत डाका, इसरो अध्यक्ष वी. नारायणन, पूर्व इसरो प्रमुख, अंतरिक्ष यात्री शुभांशु शुक्ला प्रमुख रूप से मौजूद रहे।

    पीटीआई के अनुसार, शनिवार दोपहर 12:05 बजे उड़ान भरने वाले चार चरणों के विक्रम-1 ने तय योजना के अनुरूप मात्र 15 मिनट में करीब 450 किलोमीटर ऊंचाई पर लो अर्थ आर्बिट हासिल कर ली। इस मिशन ने रॉकेट के प्रोपल्शन, एवियोनिक्स, गाइडेंस, नेविगेशन, टेलीमेट्री और कंट्रोल सिस्टम की वास्तविक अंतरिक्ष परिस्थितियों में सफल परीक्षा भी पूरी की।

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    मिशन की सबसे बड़ी तकनीकी उपलब्धियों में पूरी तरह कार्बन-कंपोजिट संरचना और 3डी-प्रिंटेड इंजन का सफल प्रदर्शन शामिल रहा, जिन्हें कंपनी ने अपनी तरह की पहली तकनीक बताया है। विक्रम-1 लगभग 350 किलोग्राम तक का पेलोड कक्षा में पहुंचाने में सक्षम है।

    रॉकेट ने न सिर्फ लांचिंग बल्कि सेटेलाइट को कक्षा में स्थापित करने का काम भी बखूबी किया। इसके चारों चरणों ने पहली ही कोशिश में उम्मीद के मुताबिक काम किया।

    'मिशन आगमन' नाम का यह अहम मिशन, आर्बिटल लांच के कारोबार में भारतीय प्राइवेट इंडस्ट्री के उद्भव का प्रतीक है। इसके साथ ही भारत उन चुनिंदा देशों की सूची में शामिल हो गया है, जहां निजी कंपनियों ने आर्बिटल रॉकेट को स्वतंत्र रूप से विकसित और लांच किया है।

    अपने साथ कई प्रायोगिक पेलोड ले गया विक्रम-1

    एएनआई के अनुसार, रॉकेट अपने साथ भारत और विदेशों के कई प्रायोगिक तथा व्यावसायिक पेलोड लेकर गया। इनमें अंतरिक्ष मलबा हटाने वाली रोबोटिक भुजाओं का प्रदर्शन करने वाला कासमोसर्व स्पेस का 'एम्ब्रेस', ग्रह स्पेस का ऊर्जा प्रौद्योगिकी प्रदर्शन मिशन 'सोलारास', स्काईरूट का प्रायोगिक उपग्रह 'स्कोप', जर्मनी के परीक्षण पेलोड तथा बेंगलुरु की कासमास डायमंड्स की प्रयोगशाला में विकसित हीरा 'डायमंड लोटस' भी शामिल हैं।

    इसके अलावा 18 कैरेट सोने से बने प्रतीकात्मक रॉकेट, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का 'वंदे मातरम्' संदेश, भारतीय अंतरिक्ष यात्रियों, विज्ञानियों और इंजीनियरों के संदेशों वाले पोस्टकार्ड तथा डॉ. विक्रम साराभाई, सर सीवी रमन और डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम की सूक्ष्म प्रतिमाएं भी अंतरिक्ष भेजी गईं।

    स्काईरूट ने बताया मिशन आगमन का उद्देश्य

    आईएएनएस के अनुसार, स्काईरूट एयरोस्पेस ने बताया कि 'मिशन आगमन' का उद्देश्य भविष्य की व्यावसायिक लॉन्च सेवाओं के लिए आवश्यक उड़ान संबंधी आंकड़े जुटाना और रॉकेट की सभी प्रमुख प्रणालियों को प्रमाणित करना था।

    कंपनी का दीर्घकालिक लक्ष्य 'स्पेस के लिए कैब सर्विस' विकसित करना है, जिसके तहत ग्राहक अपनी जरूरत के अनुसार उपग्रहों को निर्धारित कक्षा में भेजने के लिए समर्पित लॉन्च बुक कर सकेंगे। वर्ष 2022 में विक्रम-एस की सब-आर्बिटल उड़ान के बाद यह स्काईरूट का दूसरा मिशन और पहला आर्बिटल मिशन है।

    रायटर्स के अनुसार, इस मिशन के जरिये भारत का लक्ष्य ऑन-डिमांड सेटेलाइट लांचिंग के क्षेत्र में बड़ा बाजार बनने का है। 2033 तक भारत का अंतरिक्ष बाजार 44 अरब डॉलर तक होने का सरकार ने लक्ष्य निर्धारित किया है, जो अभी फिलहाल आठ अरब डॉलर है।

    स्काईरूट अभी एक अरब डॉलर मूल्य की कंपनी है। छोटे उपग्रहों की लॉन्चिंग से जुड़े बाजार में प्रतिस्पर्धा बढ़ने का फायदा भारत को मिल सकता है और एलन मस्क की स्पेसएक्स को कड़ी टक्कर दी जा सकती है।

    विक्रम-1 का अब्दुल कलाम कनेक्शन

    18 जुलाई, 2026 को हमेशा उस दिन के तौर पर याद किया जाएगा जब निजी तौर पर विकसित पहले रॉकेट ने ऑर्बिटल मिशन की सफल कोशिश की थी। ठीक 46 साल पहले, 18 जुलाई, 1980 को भारत के पहले स्वदेशी सैटेलाइट लॉन्च व्हीकल, SLV-3 ने रोहिणी (RS-1) सैटेलाइट को लो-अर्थ ऑर्बिट में स्थापित किया था, जिससे देश एक खास स्पेस क्लब का सदस्य बन गया था।