दिल्ली का 'सिलबट्टा' और पिसता बचपन! 5G के दौर में बाल विवाह की कड़वी हकीकत और बस्तियों का अंधेरा
दिल्ली के प्रेम नगर की झुग्गियों में बाल विवाह की कड़वी हकीकत सामने आई है। 25 वर्षीय रेशमा की शादी 15 साल की उम्र में हुई थी, जो शिक्षा और अवसरों की क ...और पढ़ें
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राजधानी की चमक के पीछे छिपा सच, कम उम्र में दुल्हन बनती बेटियां
गुरप्रीत चीमा, नई दिल्ली। दफ्तर की थकान और दिल्ली के ट्रैफिक से जूझते हुए मैं ऑटो से घर लौट रही थी। प्रेम नगर के पास अचानक नजर बाहर की ओर गई। लोहे की कड़ाहियां, औजार, सिलबट्टे और मटके सजाए कुछ झोपड़ियां। मन में ख्याल आया, चलो आज 'सिलबट्टा' ले ही लेते हैं, मिक्सी के जमाने में हाथ का स्वाद भी चख लेंगे।
ऑटो से उतरी तो मंजर कुछ और ही था। दूर तक झोपड़ियों का अंतहीन सिलसिला, जैसे दिल्ली के दिल में एक छोटा सा 'कस्बा' बसा हो। तभी दाईं ओर से आवाज आई, "हां मेरी बेटी... क्या लेना है?"
सामने 50-60 साल की एक अम्मा थीं। चेहरे पर झुर्रियों से ज्यादा वक्त का तजुर्बा था। मैंने पूछा, 'अम्मा, आप यहां कब से हैं?' जवाब मिला, "बहुत साल हो गए बेटा, चित्तौड़गढ़ (राजस्थान) से आए थे, तब से यही बर्तन और पत्थर बेचकर गुजारा कर रहे हैं।'
अम्मा से बात करते हुए मेरी नजर 4-5 झोपड़ी दूर दो युवतियों पर पड़ी। चूल्हे पर हांडी चढ़ी थी और सोंधी सी खुशबू हवा में तैर रही थी। मैं उनकी तरफ बढ़ी, "दीदी... कैसी हो?"
हंसकर बोलीं, 'हम एकदम मस्त हैं!'
बातों-बातों में पता चला कि वे राजस्थान से नहीं, रायबरेली (उत्तरप्रदेश) से हैं और सालों से दिल्ली में उनका परिवार दिहाड़ी मजदूरी कर रहा है। मैंने उनकी आंखों में झांकने की कोशिश की, जहां सपनों की जगह बस जिम्मेदारी की 'धूल' जमी थी।
मैंने पूछा, 'शादी कब हुई?' 25 साल की रेशमा (सांकेतिक नाम) ने बड़े इत्मीनान से कहा, '2016 में।'
मेरा दिमाग चकरा गया! 2026 चल रहा है, उम्र 25 है, यानी 2016 में वह महज 15 साल की रही होगी! जिस उम्र में लड़कियां इंस्टाग्राम फिल्टर और स्कूल के प्रोजेक्ट्स में उलझी होती हैं, रेशमा के गले में मंगलसूत्र और हाथों में चूल्हे की कालिख थमा दी गई थी। उसकी 22 साल की देवरानी का हाल तो और भी 'एडवांस्ड' था, उसकी शादी महज 14 साल की उम्र में ही कर दी गई थी।
वहां 4-5 साल के बच्चे धूल में खेल रहे थे। मैंने पूछा, 'इन्हें स्कूल क्यों नहीं भेजतीं?'
जवाब वही पुराना और घिसा-पिटा, 'सरकार हमारे लिए कुछ नहीं करती। न आईडी कार्ड है, न ठिकाना। आज यहां, कल वहां।'
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पीढ़ियों का 'डेथ वारंट'
जब मैंने उनसे पूछा कि आप खुद क्यों नहीं कमातीं, तो उन्होंने मासूमियत से एक ऐसा फैक्ट बताया जो हमारे 'डिजिटल इंडिया' के मुंह पर तमाचा था, 'दीदी, हम पढ़े-लिखे नहीं हैं। न कोई हुनर है, न कागज। और हमारे यहां औरतें बाहर काम नहीं करतीं, बस घर संभालती हैं।'
कलेजा मुंह को आ गया। 'पढ़े-लिखे नहीं हैं'??? यह सिर्फ एक जुमला नहीं, एक पूरी पीढ़ी का 'डेथ वारंट' है। शिक्षा के बिना बाल विवाह वहां एक 'रिवाज' नहीं, बल्कि 'सर्वाइवल' का तरीका बन गया है। वे लड़कियां जो खुद अभी ठीक से बड़ी नहीं हुई थीं, अब माएं बनकर अपनी अगली पीढ़ी को भी उसी अनपढ़ अंधेरे की ओर धकेल रही थीं।
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वहां से लौटते हुए मेरे एक हाथ में भारी सिलबट्टा था और दूसरे में 5G वाला स्मार्टफोन। विडंबना देखिए... दिल्ली टियर-1 शहर है जहां पिज्जा 10 मिनट में आ जाता है, लेकिन इन झोपड़ियों की दरारों से 'शिक्षा' का सूरज अंदर झांकने में आज भी दशकों पीछे है।
सिलबट्टा तो घर आ गया, पर ये सवाल आज भी मन में वैसे ही खड़ा है, क्या इन बस्तियों के नसीब में सिर्फ लोहा कूटना ही लिखा है, या कभी इनके हाथों में स्कूल की कलम का भी नंबर आएगा?
उस रात सिलबट्टे पर पहली बार हरी मिर्च और लहसुन पीसते हुए उसकी खुरदरी आवाज कानों में गूंज रही थी, ठक… ठक… ठक… हर चोट जैसे एक सवाल बनकर उभर रही थी। क्या सच में 'सरकार कुछ नहीं करती', या इन लोगों तक उसकी आहट पहुंच ही नहीं पाती?
रेशमा कभी स्कूल गई ही नहीं। न पहली कक्षा, न मिड-डे मील की घंटी, न कॉपी पर अपना नाम लिखने का अभ्यास। बचपन सीधे जिम्मेदारियों में बदल गया। जब मैंने उससे पूछा, 'पढ़ना चाहती थीं?' वह हल्की मुस्कान के साथ बोली, 'हमारे यहां लड़कियां पढ़ती नहीं… जल्दी शादी हो जाती है।'
यही वाक्य बाल विवाह की जड़ है।
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क्या कहता है NFHS-5 का आंकड़ा
National Family Health Survey (NFHS-5) के अनुसार, भारत में 20-24 वर्ष की करीब 23% महिलाओं की शादी 18 साल से पहले हो चुकी है। दिल्ली में यह प्रतिशत राष्ट्रीय औसत से कम है, लेकिन खत्म नहीं हुआ। आंकड़े साफ बताते हैं जिन लड़कियों ने माध्यमिक या उच्च माध्यमिक शिक्षा पूरी की, उनमें बाल विवाह की दर बेहद कम है। यानी शिक्षा सिर्फ किताब नहीं, सुरक्षा कवच है।
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दिल्ली में सरकारी स्कूलों में नर्सरी से 12वीं तक ट्यूशन फीस नहीं है। किताबें, यूनिफॉर्म, मिड-डे मील सब उपलब्ध है। आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के लिए निजी स्कूलों में 25% सीटें आरक्षित हैं। लेकिन रेशमा जैसी लड़कियां स्कूल के दरवाजे तक पहुंचती ही नहीं। वजह?
परिवार की आर्थिक अनिश्चितता
स्थायी पता और दस्तावेज़ों की कमी
'लड़की को ज्यादा पढ़ाकर क्या करना' जैसी सोच
और सबसे बड़ा कारण 'परंपरा'
जब लड़की कभी स्कूल नहीं जाती, तो उसके सामने विकल्प ही नहीं बनते। न कौशल, न रोजगार, न आत्मनिर्भरता। ऐसे में शादी ही एकमात्र ‘सुरक्षित’ रास्ता समझा जाता है। बाल विवाह वहां किसी उत्सव का नाम नहीं, बल्कि असुरक्षा से बचने की रणनीति बन जाता है।
कम उम्र में शादी का असर सिर्फ एक लड़की तक सीमित नहीं रहता। जल्दी गर्भधारण से स्वास्थ्य जोखिम बढ़ते हैं। आर्थिक निर्भरता बनी रहती है। और जब मां खुद अनपढ़ हो, तो अगली पीढ़ी की शिक्षा भी अक्सर छूट जाती है। यही चक्र पीढ़ी दर पीढ़ी चलता रहता है।
रेशमा की देवरानी, जिसकी शादी 14 साल की उम्र में हुई थी, अपने बच्चों को स्कूल भेजने की बात पर हिचकिचाती है।
'कागज नहीं हैं… आज यहां, कल वहां,' वह कहती है। यहां समस्या सिर्फ फीस की नहीं, पहुंच और भरोसे की है। योजनाएं हैं, कानून है- 18 साल से पहले शादी अपराध है। पर जागरूकता और समुदाय तक सीधी पहुंच के बिना नियम कागज पर ही रह जाते हैं।

रेशमा की यह बेबसी 'जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रेन' के राष्ट्रीय संयोजक रवि कांत की बातों को पुख्ता करती है। वे कहते हैं, ‘बाल विवाह का सबसे बड़ा कारण गरीबी है।’ यह एक कड़वा और स्थापित सत्य है। दिल्ली की इन बस्तियों में रहने वाले प्रवासी मजदूर गरीबी, अशिक्षा और असुरक्षा के त्रिकोण में फंसे हैं। यहां परिवारों को अपनी बेटियों के सुनहरे भविष्य से ज्यादा उनकी 'सुरक्षा' की चिंता सताती है। कानून-व्यवस्था की कमी और बढ़ती असुरक्षा के कारण उन्हें बेटियों को बाल विवाह के दलदल में धकेलना ही सबसे सुरक्षित 'विकल्प' लगने लगता है।’
5G शहर में 19वीं सदी की सोच
दिल्ली जैसे टियर-1 शहर में, जहां तकनीक 5G की रफ्तार से दौड़ रही है, कुछ बस्तियों में लड़कियों का बचपन अब भी 19वीं सदी की सोच में अटका है। फर्क सिर्फ इतना है कि अब झोपड़ी के बाहर स्मार्टफोन दिख जाता है, लेकिन भीतर सोच वही पुरानी रहती है।
उस रात घर आकर जब मैंने सिलबट्टे पर पहली बार हरी मिर्च और लहसुन पीसा, तो उसकी 'ठक... ठक...' की आवाज़ रसोई से ज्यादा मेरे ज़हन में गूंज रही थी। हर चोट जैसे एक सवाल पूछ रही थी मसाला तो पिस रहा है, पर क्या इन बस्तियों में बचपन भी ऐसे ही पिसता रहेगा?
15 साल की 'रिटायर्ड' दुल्हन
अजीब विडंबना है! हमारे टियर-1 शहरों में 'पिज़्ज़ा' 10 मिनट में डिलीवर हो जाता है, लेकिन 'शिक्षा' को इन झोपड़ियों तक पहुंचने में दशकों लग रहे हैं। हम ड्राइंग रूम में बैठकर 'वीमेन एम्पावरमेंट' पर भारी-भरकम चर्चा करते हैं, और यहां 25 साल की रेशमा 10 साल पहले ही 'रिटायर्ड दुल्हन' बन चुकी थी। 15 साल की उम्र में, जब हम स्कूल के क्रश और होमवर्क के बहानों में उलझे थे, रेशमा के हाथों में गृहस्थी का भारी-भरकम 'कड़ाही-मसाला' थमा दिया गया था।
मैंने उससे पूछा ‘पढ़ना चाहती थीं?’ उसने ऐसी मुस्कान दी जैसे मैंने मंगल ग्रह पर प्लॉट खरीदने की बात कर दी हो। बोली "हमारे यहां लड़कियां पढ़ती नहीं, बस विदा हो जाती हैं।"

वाह! क्या गजब का लॉजिक है। नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे (NFHS-5) के आंकड़े चिल्ला-चिल्ला कर कह रहे हैं कि देश में 23% लड़कियां 18 से पहले ही 'मिसेज' बन जाती हैं। दिल्ली में भले ही ये आंकड़ा थोड़ा कम हो, लेकिन खत्म नहीं हुआ है। यहां 'मिड-डे मील' की घंटी से ज्यादा तेज़ 'शादी की शहनाई' बजती है।
समस्या क्या है?
- डॉक्यूमेंट का लोचा: ‘आईडी नहीं है, कागज नहीं है।’ भाई साहब, स्मार्टफोन चलाने के लिए डेटा है, पर स्कूल फॉर्म भरने के लिए एड्रेस प्रूफ नहीं।
- शॉर्टकट वाली सोच: ‘पढ़ाकर क्या करना है?’ सही बात है, पढ़ लिख गई तो सवाल पूछेगी, और सवाल पूछना तो परंपराओं के खिलाफ है!
- 5G बनाम 19वीं सदी: झोपड़ी के बाहर लड़के हाथ में लेटेस्ट स्मार्टफोन लेकर रील देख रहे हैं, और झोपड़ी के अंदर लड़कियों की किस्मत 19वीं सदी के 'बाल विवाह' वाले मोड पर हैंग (Hang) हो रखी है।
कानून कहता है 18 से पहले शादी अपराध है। सरकार कहती है स्कूल फ्री है। लेकिन हकीकत यह है कि इन बस्तियों के लिए कानून और स्कूल दोनों उतने ही दूर हैं जितना दिल्ली से न्यूयॉर्क।
सिलबट्टे का मसाला तो बारीक हो गया, पर समाज की ये खुरदरी सोच कब पिसेगी? क्या टियर-1 शहर का मतलब सिर्फ ऊंची इमारतें और चमकती मेट्रो है या कभी इन 'अदृश्य' गलियों में भी शिक्षा का 5G नेटवर्क पकड़ेगा?
चटनी तो तीखी बन गई, पर सोच कब पिसेगी?
अगली बार जब आप प्रेम नगर से गुजरें और सिलबट्टा खरीदें, तो याद रखिएगा उस पत्थर की खुरदरी सतह पर सिर्फ मसाला नहीं, कई बचपन भी पिसे हुए हैं।
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अफसोस की बात यह है कि हम जिस दिल्ली को 'स्मार्ट सिटी' कहते हैं, उसी की छाती पर ऐसी बस्तियां बसी हैं जहां बचपन आज भी 'मैनुअल मोड' पर चल रहा है। रेशमा और उसकी देवरानी के लिए 5G का मतलब शायद सिर्फ तेज़ रफ़्तार वाली रील देखना है, लेकिन उनके बच्चों के लिए शिक्षा की रफ़्तार आज भी 'बैलगाड़ी' से भी सुस्त है।
अजीब विरोधाभास है, जिन हाथों ने चित्तौड़गढ़ के किलों जैसी मज़बूती और रायबरेली की मिट्टी की सोंधी खुशबू को समेट रखा है, वे ही हाथ आज दिल्ली की धूल में अपने वजूद के 'कागज़' ढूंढ रहे हैं।
सिलबट्टे की वह 'ठक-ठक' अब मेरी रसोई से निकलकर मेरे ज़हन के बंद दरवाज़ों को पीट रही है। वह पूछ रही है क्या अगली बार जब मैं वहां से गुज़रूंगी, तो रेशमा का 5 साल का बेटा पत्थर तोड़ रहा होगा या किसी सरकारी स्कूल की 'कागज़ की नाव' लेकर बारिश के पानी में अपनी किस्मत ढूंढ रहा होगा?
शायद जवाब उस सिलबट्टे की तरह ही खुरदरा और कड़वा है, जिसे हम हर बार 'चटनी' का स्वाद लेकर भूल जाते हैं।
(To report a child marriage, dial helpline: 1098, 1091; Police helpline 100) This report was filed under Population First’s Laadli Media Fellowship 2026.
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