खिलौने छूटे, चूड़ियां खनकीं... बाल विवाह में सिसकता बचपन; अररिया से बंगाल तक डर और दहेज में जकड़ी पीढ़ी
बाल विवाह को लेकर राष्ट्रीय स्तर पर सुधार के बावजूद, क्षेत्रीय असमानताएं महत्वपूर्ण हैं। इसे रोकने के प्रयास जारी हैं, उधर छत्तीसगढ़ जैसे राज्य इस गहर ...और पढ़ें
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बिहार के अररिया से बंगाल तक बाल विवाह के आंकड़ों ने चौंकाया

समय कम है?
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
गुरप्रीत चीमा, नई दिल्ली। भारत के कुछ हिस्सों में शादी कोई उत्सव नहीं, बल्कि एक 'मैनेजमेंट टास्क' बन गई थी। लोग बेटी को 'पराया धन' ऐसे समझते थे जैसे कोई एक्सपायरी डेट वाला डिस्काउंट कूपन हो कि जितनी जल्दी रिडीम (विवाह) कर लो, उतना ही फायदा!
गांव में ढोल बज रहा है। रंग-बिरंगी पगड़ियां, हाथों में मेंहदी, और पंडाल के नीचे बैठे दो बच्चे जिनमें एक की ऊंचाई माइक तक नहीं पहुंचती, दूसरी की चूड़ियां उसकी कलाई से फिसल रही हैं। पुजारी मंत्र पढ़ रहा है, और भीड़ ताली बजा रही है। कोई कहता है “आज अक्षय तृतीया है, आज के दिन शादी होगी तो सात जन्म का बंधन पक्का।” बच्चे समझ नहीं पा रहे कि खेल कब खत्म हुआ और शादी कब शुरू हो गई।
यह कोई कहानी नहीं, बल्कि उन सामाजिक परंपराओं की झलक है जो दशकों तक भारत के कई हिस्सों में सामान्य मानी जाती रहीं। बाल विवाह का चेहरा सिर्फ आंकड़ों से नहीं समझा जा सकता... इसके पीछे मिथकों, डर, धार्मिक प्रतीकों और सामुदायिक दबाव की परतें हैं।
हरियाणा, राजस्थान, बिहार और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में यह प्रथा अलग-अलग सामाजिक रंगों में दिखती है। कहीं 'इज्जत' के नाम पर, कहीं 'पुण्य' के नाम पर, तो कहीं “गरीबी से राहत” के बहाने।
“52% की चुप्पी” अररिया की सच्ची तस्वीर
कल्पना कीजिए कि आप बिहार में अररिया जिले के एक गांव में हैं। गली में बच्चे खेल रहे हैं, पर कुछ-कुछ घरों में तूते-फूते ढोल की आवाजें आ रही हैं। नये दूल्हा-दुल्हन की चल रही रस्में… एक तस्वीर जो आम होने की वजह से किसी को अजीब नहीं लगती।
केवल अजीब इसलिए नहीं कि शादी है, बल्कि इसलिए कि वह लड़की अभी बच्ची है। यहां बच्चों के साथ खेलते-हंसते-कूदते-फांदते हुए बड़े ही सहजता से शादी का मंच सजता है।
पिछले कुछ सालों में इस जिले में बाल विवाह की दर लगभग 52% तक पहुंच गई है। यानी हर दो लड़कियों में से एक की शादी 18 साल से पहले हो चुकी है जिसे स्थानीय लोग सामाजिक चुप्पी की वजह से स्वीकार कर लेते हैं।
अररिया में यह सिर्फ दर नहीं- एक जीवन-धारा बन चुकी है। स्कूल से लौटती लड़की, रोज़ सुबह खेत में काम पर जाने वाली किशोरी, 16-17 की उम्र में सगाई-शादी के रस्मों से जूझती-सी दिखती है। प्रशासन ने अब बाल विवाह मुक्त अभियान शुरू किया है, और पुलिस-प्रशासन के साथ वकील और जागरण समूह गांव-गांव जाकर इसे रुकवाने की कोशिश कर रहे हैं।
सबसे बड़ा आश्चर्य यह है कि NFHS के बाद भी कुछ जिलों में बढ़ोतरी दर्ज हुई है, जैसे अररिया में 48.9% से बढ़कर 52% तक।
भारत में कौन सबसे ज्यादा पीछे?
अगर आप सोचते हैं कि यह सिर्फ अररिया जैसी जगहों तक सीमित है, तो आंकड़े बताते हैं कि देश के कुछ राज्यों में बाल विवाह की दर आज भी बहुत ऊंची है:
- पश्चिम बंगाल: सबसे ऊपर है, लगभग 41.6% महिलाओं की शादी 18 से पहले हुई। कुछ ज़िलों में यह दर 55% से भी ऊपर है।
- बिहार: लगभग 40.8% महिलाओं की शादी भी बच्ची उम्र में हो जाती है।
- राजस्थान: इसके साथ-साथ अन्य पूर्वोत्तर/उत्तर राज्यों में भी यह समस्या गंभीर बनी हुई है।
ये संख्या आज भी राष्ट्रीय औसत (लगभग 23.3%) से कहीं ज्यादा है। यह सवाल खड़ा करती है कि इतने भारी कानून और अभियान होने के बावजूद क्यों इतनी बड़ी संख्या अभी भी बाल विवाह की गिरफ्त में है।
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'बालिका वधू' और ड्राइंग रूम की क्रांति
सोचिए, जिस समाज में घूंघट की मर्यादा पर घंटों चर्चा होती थी, वहां 'आनंदी' ने आकर सबके चाय के कप हिला दिए। टीवी सीरियल बालिका वधू ने पहली बार मुख्यधारा के दर्शकों को यह दिखाया कि एक बच्ची का विवाह सिर्फ रस्म नहीं, बल्कि उसके बचपन का छिन जाना है। “आनंदी” का किरदार काल्पनिक था, लेकिन उसकी परिस्थितियां काल्पनिक नहीं थीं। सीरियल ने गांवों के भीतर की उस चुप्पी को तोड़ा, जिसे अक्सर “परंपरा” कहकर ढक दिया जाता था।
इतिहासकारों का 'पोस्टमार्टम'
इतिहासकार उमा चक्रवर्ती की बात मानें तो यह सब 'कंट्रोल' का खेल था। उनकी पुस्तक Gendering Caste बताती है कि भारतीय समाज में स्त्री की यौनिकता और विवाह को नियंत्रित करना जाति व्यवस्था के संरक्षण से जुड़ा रहा है। कम उम्र में विवाह, स्त्री की स्वायत्तता सीमित करने का एक उपकरण बन गया, जिससे परिवार और समुदाय सामाजिक “शुद्धता” बनाए रख सकें।
दिलचस्प बात यह है कि प्राचीन वैदिक ग्रंथों में विवाह की आयु हमेशा बहुत कम नहीं थी; मध्यकालीन अस्थिरता और जाति-आधारित सामाजिक संरचना ने बाल विवाह को अधिक संस्थागत रूप दिया। यानी, जिसे हम 'सनातन परंपरा' कहते हैं, वह अक्सर मध्यकाल की 'सामाजिक असुरक्षा' की देन थी।
आंकड़ों का 'स्कोरकार्ड': गिरावट तो है, पर खेल अभी जारी
अगर हम National Family Health Survey (NFHS-5) को एक रिपोर्ट कार्ड मानें, तो भारत ने पिछले कुछ सालों में काफी सुधार किया है। 2019-21 के आंकड़े बताते हैं कि 20-24 वर्ष की लगभग 23% महिलाओं की शादी 18 से पहले हो गई थी।
हालांकि NFHS-4 के मुकाबले यह ग्राफ नीचे गिरा है, जो कि अच्छी खबर है!, लेकिन क्षेत्रीय असमानता अभी भी वैसी ही है जैसे किसी फिल्म के विलेन का डर कहीं बहुत ज्यादा, तो कहीं बिल्कुल नहीं।
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मेडिकल बुलेटिन: ‘अभी तो मैं बच्ची हूं!’
मेडिकल जर्नल्स और विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) की रिपोर्ट्स किसी डरावनी फिल्म की स्क्रिप्ट जैसी लगती हैं, अगर उन्हें नजरअंदाज किया जाए।
- मातृ मृत्यु दर: 15-19 साल की उम्र में मां बनना वैसा ही है जैसे किसी कच्चे घड़े में भारी सामान भर देना। शरीर पूरी तरह विकसित नहीं होता, और नतीजा? जानलेवा जटिलताएं।
- अगली पीढ़ी का हाल: कम उम्र की माताओं के बच्चे अक्सर कुपोषण और कम वजन (Low Birth Weight) का शिकार होते हैं। यानी एक गलत फैसला, दो पीढ़ियों का नुकसान।
- मेंटल हेल्थ: अचानक 'गुड्डे-गुड़ियों' वाले हाथों में 'घर की चाबियां' थमा देना किसी को भी अवसाद (Depression) और अलगाव के अंधेरे में धकेल सकता है।
- टीनएज प्रेगनेंसी: 15-19 साल की लगभग 6.8% लड़कियां या तो मां बन चुकी हैं या बनने वाली हैं। यह किसी डरावनी वेब सीरीज से कम नहीं कि जिस उम्र में हाथ में 'बोर्ड परीक्षा' का पेन होना चाहिए, वहां 'बच्चे का पालना' आ जाता है।
- अच्छी खबर: किशोर गर्भधारण की दर 51 से गिरकर 43 (प्रति 1000) पर आ गई है। यानी धीरे-धीरे सही, पर समाज को 'बायोलॉजी' समझ आने लगी है।
भारत का 'मैरिज रिपोर्ट कार्ड': प्रोग्रेस तो है, पर 'ए-ग्रेड' अभी दूर!
अगर हम भारत की तुलना एक ऐसी फिल्म से करें जो धीरे-धीरे सुधर रही है, तो NFHS-5 के आंकड़े कुछ इस तरह का 'ट्रेलर' दिखाते हैं।
फ्लैशबैक (2005-06): तब हर 2 में से 1 लड़की (करीब 47.4%) का बचपन मंडप की भेंट चढ़ जाता था।
क्लाइमेक्स (आज): अब यह गिरकर 23.3% पर आ गया है। यानी अब 2 में से 1 नहीं, बल्कि हर 4 में से 1 लड़की इस चक्रव्यूह में है।
बॉयज क्लब: लड़के भी पीछे नहीं हैं; करीब 17.7% लड़कों की 'सफेद घोड़ी' 21 साल की उम्र से पहले ही सज जाती है।
क्या कहते हैं ये बदलते समीकरण?
इन आंकड़ों की गहराई में उतरें तो समझ आता है कि बदलाव की रफ्तार हर जगह एक जैसी नहीं है। जहां कुछ राज्य 'स्मार्ट सिटी' की तरह आधुनिक सोच अपना चुके हैं, वहीं कुछ इलाके अब भी 'कबीलाई' सोच के साए में हैं।
- जागरूकता का जंक्शन: शिक्षा ने लड़कियों को 'सवाल' करना सिखा दिया है। अब वे सिर्फ घर की चारदीवारी का हिस्सा नहीं, बल्कि अपने भविष्य की स्क्रिप्ट खुद लिख रही हैं।
- प्रशासनिक मुस्तैदी: अब शादियों में सिर्फ पकवानों की खुशबू नहीं, बल्कि 'पुलिस की सायरन' का खौफ भी रहता है। यह डर ही है जो कई बार मासूमों को मंडप तक पहुंचने से रोक लेता है।
- आर्थिक सुरक्षा का भ्रम: लोग अब धीरे-धीरे समझने लगे हैं कि बेटी की जल्दी विदाई 'जिम्मेदारी से मुक्ति' नहीं, बल्कि एक नए आर्थिक और स्वास्थ्य संकट का निमंत्रण है।
छत्तीसगढ़ बना उम्मीद की मिसाल
जहां एक तरफ देश के कई हिस्से आंकड़ों के जाल में उलझे हैं, वहीं छत्तीसगढ़ ने 'बालोद' और 'सूरजपुर' के जरिए यह साबित कर दिया है कि अगर समाज ठान ले, तो मंडप से बचपन की विदाई रोकी जा सकती है।
बालोद जिला: द फर्स्ट चैम्पियन
बालोद ने वह कर दिखाया जो मुमकिन नहीं लगता था, यह भारत का पहला बाल विवाह-मुक्त जिला बना। PIB की रिपोर्ट के मुताबिक, लगातार दो साल तक यहां बाल विवाह का 'शून्य' (Zero) मामला दर्ज हुआ।
सूरजपुर: 'पंचायतों की पावर'
यहां की 75 पंचायतों ने खुद को 'बाल विवाह-मुक्त' घोषित कर एक नई लकीर खींच दी है। इससे सीख मिलती है, जब पंचायत के बड़े-बुजुर्ग खुद पहरेदार बन जाएं, तो किसी कानून की किताब की जरूरत नहीं पड़ती। यहां जागरूकता अब पगडंडियों से लेकर चौपालों तक दौड़ रही है।
लब्बोलुआब
यह वाकई सोचने वाली बात है कि हम एक ऐसे दौर में जी रहे हैं जहां हमारी उपलब्धियां और हमारी सामाजिक हकीकतें एक-दूसरे को चिढ़ाती नजर आती हैं।
हम अंतरिक्ष में रॉकेट भेज रहे हैं, मंगल ग्रह की धूल में पानी के निशान ढूंढ रहे हैं और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से दुनिया बदलने का दावा कर रहे हैं। लेकिन कड़वा सच यह है कि आज भी इसी ज़मीन पर 23% लड़कियों के लिए उनका 'बचपन' किसी लग्जरी से कम नहीं है।"
जिस उम्र में उन्हें यह तय करना चाहिए कि वे बड़ी होकर 'साइंटिस्ट' बनेंगी या 'आर्टिस्ट', उस उम्र में समाज उनके लिए 'लाल जोड़ा' तय कर देता है। यह विडंबना नहीं तो और क्या है कि हम '5 ट्रिलियन इकोनॉमी' बनने का सपना तो देख रहे हैं, पर अपनी एक-चौथाई किशोर आबादी को घर-गृहस्थी के चूल्हे में झोंकने की तैयारी भी साथ-साथ कर रहे हैं।
(To report a child marriage, dial helpline: 1098, 1091; Police helpline 100) This report was filed under Population First’s Laadli Media Fellowship 2026.
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