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    ट्रैफिक की वजह से हर साल हजारों करोड़ का नुकसान; क्या 'कंजेशन प्राइसिंग' से सुलझेगी समस्या?

    Updated: Tue, 10 Feb 2026 08:35 PM (IST)

    Traffic Jams Cost India Billions:भारतीय शहरों में ट्रैफिक जाम अब सिर्फ समय की बर्बादी नहीं, बल्कि एक बड़ी आर्थिक चोट बन गया है। इकोनामिक सर्वे में कहा ...और पढ़ें

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    दिल्ली-बेंगलुरु समेत मेट्रो शहरों को ट्रैफिक की वजह से हर साल हजारों करोड़ का नुकसान होता है। यह फोटो एआई जेनरेटेड है।

    स्मार्ट व्यू- पूरी खबर, कम शब्दों में
    डिजिटल डेस्‍क, नई दिल्‍ली। मेरे घर से ऑफिस की दूरी महज 9 किलोमीटर है। सुबह 9 बजे ऑफिस पहुंचने के लिए इस दूरी को तय करने में कम से 50 मिनट का समय लगता है और अगर बारिश हो जाए या फिर थोड़ा और जल्‍दी आना पड़ जाए तो यह समय बढ़कर सवा घंटे तक पहुंच जाता है। यह समस्‍या सिर्फ मेरी या मेरे कलीग्‍स की नहीं है; यह समस्‍या दिल्‍ली-मुंबई और बेंगलुरु समेत बड़े शहरों में रहने वाले सभी लोगों की है।  
     
    दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु जैसे मेट्रो शहर हों या लखनऊ जैसे टियर-2 शहर, घंटो जाम और सुस्त ट्रैफिक इन शहरों की साझा पहचान बन गया है। छोटे शहरों में भी हालात बहुत अलग नहीं हैं। लोग रुके हुए शहर में सुस्त गति से जीवन जीने के लिए मजबूर हैं।
     
    हाल में जारी किए गए इकोनामिक सर्वे में कहा गया है कि परिवहन शहरों की रक्तधारा, रीढ़ और मांसपेशियां है, जो लोगों, वस्तुओं और विचारों के प्रवाह को आगे बढ़ाता है। अगर यह तंत्र कमजोर होता है तो ट्रैफिक जाम, प्रदूषण और उत्पादकता में गिरावट शहरों की नियति बन जाते हैं।
     
    एक अध्ययन के अनुसार, दिल्ली में एक अकुशल कामगार जाम की वजह से सालाना 19,600 रुपये का नुकसान उठाता है। कुशल कामगार के लिए यह नुकसान बढ़कर सालाना 26,000 रुपये हो जाता है।
     
    एक और अध्ययन बताता है कि देश के प्रमुख चार मेट्रो शहर जाम की वजह से सालाना अरबों डॉलर गंवा रहे हैं। अगर इस अनुमान को राष्ट्रीय स्तर पर लागू किया जाए तो आसानी से अंदाजा लगाया जा सकता है कि इससे देश की आर्थिक वृद्धि दर किस हद तक प्रभावित हो रही है।
     
    Traffic Jam Delhi
     
    यहां पढ़ें शहरों में गतिशीलता की समस्या और इससे देश को हो रहे नुकसान की रिपोर्ट...
     

    ट्रैफिक जाम का क्‍या हो रहा असर?

    ट्रैफिक जाम का असर सिर्फ देर से ऑफिस पहुंचने तक सीमित नहीं है। इससे ईंधन की बर्बादी होती है, प्रदूषण बढ़ता है और लोगों की सेहत पर भी असर पड़ता है।
     
    इकोनामिक सर्वे में बताए गए अलग-अलग अध्ययनों के मुताबिक, एक अकुशल कामगार को जाम की वजह से हर साल हजारों रुपये का नुकसान होता है, वहीं कुशल और उच्च कुशल कामगार का नुकसान इससे भी ज्यादा है।
     
    बेंगलुरु में ही एक अध्ययन के अनुसार, ट्रैफिक जाम के कारण लाखों घंटे का उत्पादन खत्म हो जाता है, जिसकी कीमत अरबों रुपये में बैठती है।
    • 19,600 का आर्थिक नुकसान उठाना पड़ता  है दिल्ली में अकुशल कामगार को ट्रैफिक जाम के  कारण प्रतिवर्ष  
    • 23,800 प्रतिवर्ष नुकसान उठाता है कुशल कामगार दिल्ली में ट्रैफिक जाम की वजह से
    • 7.07 लाख उत्पादक घंटों का नुकसान उठा रहा है बेंगलुरु शहर प्रतिवर्ष, जाम के कारण लोगों के देर से ऑफिस पहुंचने के चलते
    • 1,00,000 करोड़ से अधिक की आर्थिक चपत झेल रहा है बेंगलुरु उत्पादक घंटों की बर्बादी से
    • 2,00,000 करोड़ से अधिक गंवा रहे हैं चार मेट्रो शहर दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु, कोलकाता
    Traffic Jam Gurgram

    ट्रैफिक जाम का अर्थव्यवस्था पर क्या पड़ेगा असर?

    अगर ट्रैफिक जाम को गंभीरता से नहीं लिया जाता है तो आने वाले सालों में आर्थिक नुकसान और बढ़ेगा। सर्व की रिपोर्ट में साफ कहा गया है कि शहर सिर्फ रहने की जगह नहीं, देश की आर्थिक रीढ़ हैं। अगर यही रीढ़ ट्रैफिक जाम में जकड़ी रही, तो भारत की ग्रोथ की रफ्तार भी धीमी पड़ सकती है।

    ट्रैफिक जाम का क्‍या है कारण?

    इस समस्या की जड़ में एक बड़ी वजह है- निजी गाड़ियों पर बढ़ती निर्भरता। शहरों की सड़कें लोगों की आवाजाही के बजाय गाड़ियों की पार्किंग बनती जा रही हैं। एक कार में अक्सर एक या दो लोग ही होते हैं, लेकिन वह सड़क की उतनी ही जगह घेरती है जितनी एक बस या कई दोपहिया वाहन। नतीजा यह कि सड़क की क्षमता का सही इस्तेमाल नहीं हो पाता और जाम बढ़ता जाता है।
     
    City Speed

    मजबूत पब्लिक ट्रांसपोर्ट में है समाधान

    इकोनामिक सर्वे साफ कहता है कि समाधान सड़कों को चौड़ा करने में नहीं, बल्कि पब्लिक ट्रांसपोर्ट को मजबूत करने में है। मेट्रो, बस, ई-बस, पैदल चलने और साइकिल जैसे विकल्प अगर सुरक्षित, सस्ते और भरोसेमंद हों, तो लोग खुद-ब-खुद निजी गाड़ियों से दूरी बनाएंगे। बेंगलुरु, दिल्ली जैसे शहरों में मेट्रो का विस्तार हुआ है, लेकिन बसों और आखिरी छोर तक कनेक्टिविटी की अब भी भारी कमी है।
    • 60 बसें होनी चाहिए प्रति एक लाख लोगों पर केंद्रीय शहरी एवं आवास मंत्रालय के अनुसार
    • 47,650 बसें ही सेवाएं दे रही हैं पूरे देश के शहरों में
    • 60% बसें सिर्फ नौ बड़े शहरों में चल रहीं है देश में वर्तमान समय में

    इस समस्‍या पर एक्‍सपर्ट क्‍या कहते हैं?

    नीति निर्माताओं की सोच है कि हम रोड नेटवर्क का विस्तार करके  जाम की समस्या से निपट सकते  हैं, लेकिन यह सोच गलत साबित हो चुकी है। जाम की समस्या का  समाधान एक मजबूत सार्वजनिक  परिवहन में ही है, जो आखिरी छोर  तक कनेक्टिविटी सुनिश्चित करे। - अनुमिता चौधरी कार्यकारी निदेशक,  सेंटर फॉर साइंस एंड  एनवायरनमेंट 

    'बेहतर शहरी जीवन के लिए हो प्लानिंग'

    सफल शहरों का अनुभव बताता है  कि जब सड़कों को नागरिकों के लिए  बनाया जाता है तो न सिर्फ जाम और प्रदूषण घटता है, बल्कि आर्थिक  गतिविधियां बढ़ती हैं और जीवन बेहतर  होता है। शहरी गतिशीलता का लक्ष्य गाड़ियों की रफ्तार नहीं, बेहतर जीवन  होना चाहिए। - हितेष वैद्य, पूर्वनिदेशक,  नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ अर्बन अफेयर्स 
     
     
    Traffic jam 2
     
     

    क्‍या कंजेशन प्राइसिंग से मिलेगी मदद?

    शहरी भारतीय हर साल ट्रैफिक में बैठे-बैठे सैकड़ों घंटे बर्बाद कर देते हैं। यही समय वे काम, आराम या परिवार को दे सकते हैं। ट्रैफिक संकट पब्लिक हेल्थ इमरजेंसी भी है। जिन शहरों में कभी हवा साफ मानी जाती थी, वहां भी अब प्रदूषण से होने वाली मौतों में बढ़ोतरी देखी जा रही है।
     
    कंजेशन प्राइसिंग जैसे बड़े सुधारों के बिना ये शहर पूरी तरह से ठप हो सकते हैं। हाल में आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 में भी जाम की समस्या से निपटने के लिए कंजेशन प्राइसिंग लागू करने का सुझाव दिया गया है।
     
    Traffic Jam inside

    क्या है कंजेशन प्राइसिंग?

    दरअसल कंजेशन प्राइसिंग (Congestion Pricing ) जाम वाली सड़कों पर चलने का शुल्क है। आर्थिक सर्वेक्षण के अनुसार, इसका मूल विचार भीड़भाड़ से उत्पन्न बाहरी लागतों जैसे समय की हानि, प्रदूषण और ईंधन की बर्बादी को यूजर द्वारा ही वहन करना है ताकि सबसे अधिक भीड़भाड़ वाली सड़कों का उपयोग करने वाले यात्रा की वास्तविक कीमत चुकाएं।


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