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    भारत को दिवालिया होने से किसने बचाया था? जानिए उस गुमनाम नायक की कहानी

    Updated: Fri, 12 Jun 2026 09:18 PM (IST)

    RBI Governor S Venkitaramanan Real Story:1991 के आर्थिक संकट में जब देश कंगाल होने की कगार पर था, तब एक नायक ने बदनामी सहकर भी बेहद गोपनीय तरीके से सो ...और पढ़ें

    1991 के आर्थिक संकट में देश को बचाने वाले असली 'गवर्नर' की कहानी। फोटो- एआई इमेज

    1991 के आर्थिक संकट में देश को बचाने वाले असली 'गवर्नर' की कहानी। फोटो- एआई इमेज

    HighLights

    1. 'गवर्नर' फिल्म के असली नायक की कहानी।

    2. सोना गिरवी रख देश को टूटने से बचाया।

    डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। जनवरी 1991... दिल्ली की एक भयंकर ठंडी रात। बेशक सत्ता के गलियारे रोशन थे, लेकिन देश की अर्थव्यवस्था पर घना धुंधलका छाया हुआ था। उधर, खाड़ी में जंग छिड़ी थी। इधर, भारत में तेल के दाम आसमान छू रहे थे। महंगाई आम आदमी की रसोई तक पहुंच चुकी थी। विदेशी मुद्रा भंडार लगभग खत्म हो चुका था। देश के पास बमुश्किल सात दिनों के आयात लायक डॉलर बचे थे।

    देश में अस्थिर सरकार थी। अंतरराष्ट्रीय बैंक और निवेशक भारत को शक की नजर से देखने लगे थे। आर्थिक संकट इतना विकराल हो चुका था कि अगर तुरंत कोई बड़ा कदम नहीं उठाया गया तो देश में न खाने को खाना मिलेगा, न जरूरत का सामान और न ईंधन। तब एक वरिष्ठ अफसर ने प्रधानमंत्री को ऐसा सुझाव दिया, जिसे सुनकर सब सकते में आ गए। सुझाव था- 'भारत को अपना सोना विदेश में गिरवी रखना होगा।'

    उस वक्त गठबंधन की सरकार के पास भी कोई विकल्प नहीं था। ऐसे में यह फैसला पूरी गोपनीयता के साथ लिया गया। न कोई शोर, न कोई सार्वजनिक घोषणा। इस तरह भारत को आर्थिक डिफॉल्ट के मुहाने से वापस खींच लाया गया। यह फैसला भारत के इतिहास का सबसे साहसी आर्थिक दांव बन गया।

    मनोज बाजपेयी अभिनीत फिल्म 'गवर्नर: द साइलेंट सेवियर' (Governor: The Silent Saviour) के रिलीज होने के बाद यह संकट फिर से चर्चा में आ गया है।

    वह अफसर कौन था, जिसने कैमरों और सुर्खियों से दूर रहकर साल 1991 में आर्थिक संकट से देश को उबारने में अहम भूमिका निभाई थी? उस समय केंद्र में किसकी सरकार थी, सोना गिरवी रखने का फैसला कैसे हुआ और इसकी भनक दुनिया को कैसे लगी? आइए, बताते हैं पूरी कहानी...

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    फिल्‍म गवर्नर के एक दृश्‍य में अभिनेता मनोज बाजपेयी। 

    सोना गिरवी रखने की नौबत क्यों आई थी?

    साल 1990-91 का भारत आज के भारत से बहुत अलग था। आज हम फॉरेन एक्सचेंज रिजर्व, ग्लोबल इन्वेस्टमेंट, डिजिटल इकोनॉमी और दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में भारत की रैंकिंग की बात करते हैं, लेकिन उस समय हालात इतने गंभीर थे कि देश के पास आयात के लिए विदेशी मुद्रा न के बराबर बची थी।

    यह आर्थिक संकट सिर्फ आंकड़ों की कहानी नहीं था, बल्कि राष्ट्रीय प्रतिष्ठा का सवाल बन चुका था। अगर तब भारत समय पर अपने विदेशी भुगतान नहीं कर पाता, तो दुनिया के सामने उसकी साख पर बड़ा सवाल खड़ा हो जाता या फिर वह कंगाल देशों की सूची में शुमार हो जाता।

    किसने दी सोना गिरवी रखने की मंजूरी?

    तब देश के प्रधानमंत्री चंद्रशेखर थे और डॉ. मनमोहन सिंह उनके आर्थिक सलाहकार हुआ करते थे। देश अभूतपूर्व आर्थिक संकट से जूझ रहा था और समाधान की तलाश में सरकार तथा आरबीआई के बीच लगातार मंथन चल रहा था।

    Venkitaramanan Manmohan Singh

    एआई एडिटेड तस्‍वीर।

    इसी क्रम में दिल्ली के वित्त मंत्रालय में आरबीआई के गवर्नर एस. वेंकटरमणन और डॉ. मनमोहन सिंह के बीच मुलाकात हुई। एस. वेंकटरमणन बोले, "सर, RBI के पास सैकड़ों टन सोना है। अगर हम इस सोने को गिरवी रखते हैं तो देश को काफी राहत मिल सकती है।" मनमोहन सिंह के हावभाव पढ़कर वेंकटरमणन आगे बोले, "सर, अगर देश मुश्किल में हो तो RBI ऐसा कर सकता है।"

    एस. वेंकटरमणन का प्रस्ताव सुनकर मनमोहन सिंह चौंक गए। मामला बेहद संवेदनशील था, इसलिए वे तुरंत आरबीआई गवर्नर को लेकर प्रधानमंत्री चंद्रशेखर के पास पहुंचे। वेंकटरमणन ने बिना लाग-लपेट अपना प्रस्ताव प्रधानमंत्री को बताया- “देश के पास डॉलर नहीं बचे हैं, लेकिन सोना है। अगर इस सोने को अंतरराष्ट्रीय बैंकों के पास गिरवी रख दिया जाए, तो उसके बदले विदेशी मुद्रा जुटाई जा सकती है और आर्थिक संकट से कुछ राहत मिल सकती है।”

    rbi gold reserves

    तत्कालीन प्रधानमंत्री चंद्रशेखर ने एस. वेंकटरमणन के प्रस्ताव पर गंभीरता से विचार किया और आरबीआई के गवर्नर को हिंदुस्तान का सोना गिरवी रखने की इजाजत दे दी। साथ ही कांग्रेस नेता राजीव गांधी को भी इसकी जानकारी देने को कहा, क्योंकि उनकी पार्टी सरकार को बाहर से समर्थन दे रही थी। राजीव गांधी ने इस कदम पर आपत्ति नहीं जताई और तत्कालीन वित्त मंत्री यशवंत सिन्हा ने भी अपनी मंजूरी दे दी।

    इसी बीच कांग्रेस ने समर्थन वापस ले लिया। केंद्र सरकार गिर गई और चंद्रशेखर कार्यवाहक प्रधानमंत्री बन गए, लेकिन संकट टला नहीं था। ऐसे में 20 टन सोना विदेश में गिरवी रखने की प्रक्रिया आगे बढ़ाई गई। जब तक सोना गिरवी रखने से संबंधित फाइल अंतिम स्वीकृति के लिए यशवंत सिन्हा के पास पहुंची, तब वे पटना में थे।

    हालांकि, अधिकारियों ने जब पूरा वाकया बताया तो हालात की गंभीरता को देखते हुए यशवंत सिन्हा ने फाइल पर हस्ताक्षर कर दिए। इसी के साथ भारत के आर्थिक इतिहास का सबसे साहसी वित्तीय कदम आगे बढ़ गया।

    RBI के पास इतना सोना कहां से आया?

    आरबीआई ने जिस 20 टन सोने को सबसे पहले विदेशी बैंक में गिरवी रखा, वह वर्षों के दौरान तस्करी के मामलों में जब्त किया गया सोना था, जिसे सरकारी भंडार में सुरक्षित रखा गया था। लेकिन इससे मिली विदेशी मुद्रा देश की जरूरतों के लिए पर्याप्त नहीं थी।

    हालात की गंभीरता को देखते हुए बाद में करीब 47 टन अतिरिक्त सोना भी विदेश भेजकर गिरवी रखना पड़ा, ताकि भारत को इतना विदेशी मुद्रा भंडार मिल सके कि वह जरूरी आयात कर सके और अपने अंतरराष्ट्रीय कर्ज व भुगतान समय पर चुका सके।

    RBI Gold

    सोना कहां गिरवी रखा गया था?

    • पहली खेप में 20 टन सोना स्विट्जरलैंड के यूबीएस में गिरवी रखा गया था।
    • दूसरी खेप में 47 टन सोना बैंक ऑफ इंग्लैंड और बैंक ऑफ जापान में गिरवी रखा गया था।


    देश को सोना गिरवी रखने की बात कैसे पता चली थी?

    सरकार की ओर से सोना गिरवी रखने के पूरे ऑपरेशन को बेहद गोपनीय रखा गया। हालांकि, यह राज ज्यादा दिन छिप नहीं पाया। एक वरिष्ठ पत्रकार ने एयरपोर्ट पर भारी सुरक्षा के बीच आरबीआई की कई वैन देखीं तो पड़ताल की और सोना गिरवी रखने की कहानी उजागर कर दी। तब देश को पहली बार एहसास हुआ कि आर्थिक संकट कितना गहरा था और उसे टालने के लिए कितने असाधारण कदम उठाने पड़े थे।

    कौन थे एस. वेंकटरमणन, जिन पर फिल्म 'गवर्नर' बनी?

    मनोज बाजपेयी अभिनीत फिल्म 'गवर्नर: द साइलेंट सेवियर' उस वक्त के भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के 18वें गवर्नर एस. वेंकटरमणन (S. Venkitaramanan) पर बनी है।

    RBI Governor S Venkitaramanan

    एस. वेंकटरमणन का जन्म 28 जनवरी 1931 को नागरकोइल में एक तमिल अय्यर परिवार में हुआ था। उस वक्त नागरकोइल त्रावणकोर रियासत का हिस्सा हुआ करता था। उन्होंने यूनिवर्सिटी कॉलेज तिरुवनंतपुरम (University College Thiruvananthapuram) से फिजिक्स में पोस्ट ग्रेजुएशन किया। इसके बाद अमेरिका के कार्नेगी मेलन विश्वविद्यालय से इंडस्ट्रियल एडमिनिस्ट्रेशन में मास्टर डिग्री हासिल की।

    वह 1953 बैच के तमिलनाडु कैडर के आईएएस अधिकारी थे। केंद्र सरकार में कई अहम पदों पर सेवा देने के बाद साल 1985 से 1989 तक भारत सरकार के वित्त सचिव रहे।

    Governor S Venkitaramanan

    RBI गवर्नर कैसे बने?

    साल 1990 में जब भारत गहरे आर्थिक संकट के दौर से गुजर रहा था, तब चंद्रशेखर सरकार ने उनकी वित्तीय विशेषज्ञता, प्रशासनिक अनुभव और जटिल परिस्थितियों में निर्णय लेने की क्षमता पर भरोसा जताते हुए एस. वेंकटरमणन को भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) का गवर्नर नियुक्त किया।

    वे 22 दिसंबर 1990 से 21 दिसंबर 1992 तक इस पद पर रहे। बता दें कि एस. वेंकटरमणन ने कर्नाटक सरकार में वित्त सचिव और सलाहकार के तौर पर भी काम किया था। आरबीआई के गवर्नर का कार्यकाल पूरा करने के बाद वह राज्यपाल भी रहे।

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