देश अलग, मांगें एक जैसी... नेपाल से केन्या तक क्यों एक ही सोच और हक की लड़ाई लड़ रही Gen Z?
दुनिय भर में लगातार जेन ज़ी का गुस्सा भड़क रहा है। आंदोलन सड़क से पहले सोशल मीडिया पर शुरू होता है और आगे की पिच तैयार होती है।

दुनिया के सभी देशों में जेन ज़ी की लड़ाई लगभग एक जैसी
गुरप्रीत चीमा, नई दिल्ली। आजकल आप कई वीडियो, रील और शॉट्स अपनी स्क्रीन पर खूब देख रहे होंगे। एक दौर था, जब भारत के लोकतंत्र की धड़कनें धूल उड़ाती रथ यात्राओं और गांव-गांव की पगडंडियों पर घूमते राजनीतिक अभियानों से नापी जाती थीं। लाउडस्पीकर पर गूंजते भाषण जनमत गढ़ा करते थे। लेकिन आज? आज तस्वीर बदल चुकी है।
अब क्रांति की गूंज सिर्फ मैदानों तक सीमित नहीं है वो स्क्रीन पर दिखती है। एक ट्रेंडिंग हैशटैग और महज कुछ सेकेंड के वायरल वीडियो, एक दमदार ऑनलाइन स्पीच और डिजिटल नेटवर्क। देखते ही देखते लाखों युवा एक ही डिजिटल मंच पर खड़े नजर आते हैं।
यह बदलाव सिर्फ टेक्नोलॉजी का नहीं है, यह सोच का भी बड़ा बदलाव है। आज की नई पीढ़ी यानी Gen Z सत्ता के आगे नतमस्तक होने के लिए नहीं, बल्कि उसकी आंखों में आंखें डालकर सवाल पूछने के लिए जानी जाती है। अपनी आवाज को मास तक पहुंचाने और व्यवस्था को बदलने के लिए वे सिर्फ विरासत में मिले पुराने रास्तों पर निर्भर नहीं हैं, इनके हाथों में डिजिटल युग के नए और धारदार औजार हैं।
आज के एक्सप्लेनर में समझेंगे कि दुनिया भर में Gen Z कैसे अपनी आवाज बुलंद कर रही है। इस लेख में 360 डिग्री से जानेंगे कि अलग-अलग देशों में युवाओं के मुद्दे और मांगें किस तरह एक जैसी हैं। किन देशों में Gen Z ने विरोध प्रदर्शनों के जरिए अपनी बात रखी है और किन मुद्दों को लेकर युवा मुखर हो रहे हैं।

कौन हैं जेन ज़ी?
Gen Z या Generation Z उन लोगों की पीढ़ी को कहा जाता है जिनका जन्म 1997 से 2012 के बीच हुआ है। इन्हें 'डिजिटल नेटिव्स' भी कहा जाता है, क्योंकि यह इतिहास की पहली ऐसी पीढ़ी है जो इंटरनेट, स्मार्टफोन और सोशल मीडिया के दौर में ही पैदा हुई और बड़ी हुई है।
ट्रेडिशनल 9 टू 5 की जॉब्स के बजाय यह फ्रीलांसिंग, स्टार्टअप्स और 'वर्क-लाइफ बैलेंस' को तरजीह देती है और किसी बनी-बनाई लकीर पर चलने के बजाय अपनी अलग पहचान बनाने में यकीन रखती है।
-1792069218411.webp)
दुनिया भर में क्यों भड़क रहा जेन ज़ी का गुस्सा?
दुनिया भर में जेन जी आंदोलनों को समझने के लिए सबसे जरूरी सवाल यह है कि आखिर एक ऐसी पीढ़ी, जो मोबाइल स्क्रीन देखकर पली-बढ़ी है, वो सरकारों को चुनौती देने के लिए सड़कों पर क्यों उतर रही है?
केवल भारत ही नहीं… नेपाल से लेकर बांग्लादेश, श्रीलंका, इंडोनेशिया और केन्या तक युवाओं के गुस्से ने राजनीति को झकझोरा है। इन आंदोलनों की एक खास बात यह है कि इनकी शुरुआत अक्सर सोशल मीडिया पर होता है, लेकिन इनकी असली ताकत तब दिखाई देती है, जब डिजिटल नाराजगी सड़कों पर उतर आती है।
-1792069434850.webp)
काउंसिल ऑन फॉरेन रिलेशंस (CFR) के एनालिसिज़ के मुताबिक, GenZ प्रोटेस्ट को केवल सरकार विरोधी ही न माना जाए। इन मूवमेंट्स में करप्शन, रोजगार, शिक्षा और राजनीतिक प्रतिष्ठानों से मोहभंग जैसी शिकायतें बार-बार सामने आई हैं। खास बात ये है कि दुनिया में अब तक जितने भी देशों में जेनजी आंदोलन हुए हैं, उनमें युवाओं की समस्याएं लोकल रही हैं, उनका गुस्सा और विरोध के तरीके लगभग एक जैसे ही रहे हैं।
अगर सवाल यह है कि सबसे पहले Gen Z का ऐसा विरोध कहां हुआ, तो इसका जवाब इस बात पर निर्भर करता है कि हम किस आंदोलन की बात कर रहे हैं। युवा नेतृत्व वाले विरोध प्रदर्शन दुनिया में पहले भी होते रहे हैं। 2020 में थाईलैंड और हांगकांग में छात्र आंदोलनों ने राजनीतिक अधिकारों और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता जैसे मुद्दे उठाए।
-1792069480868.webp)
2022: श्रीलंका
2022 में श्रीलंका के 'अरगलया' आंदोलन ने आर्थिक बदहाली और सरकार की नीतियों के खिलाफ व्यापक जनाक्रोश दिखाया। लेकिन हाल के अंतरराष्ट्रीय Gen Z विरोधों की स्टोरी में बांग्लादेश का 2024 का आंदोलन सबसे बड़ा माना जाता है।
इसके बाद 2024 में केन्या और 2025 में नेपाल सहित कई देशों में युवाओं के नेतृत्व वाले आंदोलनों को नई वैश्विक पहचान मिली। इसलिए किसी एक देश को दुनिया के सभी Gen Z विरोधों का निर्विवाद जन्मस्थान कहना सही नहीं होगा।
-1792069537902.webp)
2024: बांग्लादेश
बांग्लादेश में जुलाई 2024 में सरकारी नौकरियों में आरक्षण के खिलाफ छात्रों का गुस्सा सड़कों पर उतर आया। छात्रों का कहना था कि नौकरियों में सबको बराबर मौका नहीं मिल रहा है। देखते ही देखते यह आंदोलन बेरोजगारी, भ्रष्टाचार और सरकार के खिलाफ बड़े जनआंदोलन में बदल गया।
सरकार की सख्ती ने आग में घी डालने का काम किया और विरोध तेज होता चला गया। आखिरकार, अगस्त 2024 में तत्कालीन प्रधानमंत्री शेख हसीना को सत्ता छोड़कर देश से बाहर जाना पड़ा। इस आंदोलन ने दुनिया को दिखाया कि जब छात्र अपनी मांगों को लेकर सड़कों पर उतरते हैं और उन्हें आम जनता का साथ मिलता है, तो उनकी आवाज सत्ता के शीर्ष तक पहुंच सकती है।
-1792069582913.webp)
2024: केन्या
इसके बाद केन्या, यहां जून 2024 में युवाओं ने सरकार के खिलाफ प्रदर्शन शुरू कर दिया। इसकी वजह सरकार का नया फाइनेंस बिल था, जिसमें कई तरह के टैक्स बढ़ाने का प्रस्ताव था। युवाओं का कहना था कि महंगाई के दौर में नए टैक्स लगाने से आम लोगों की मुश्किलें और बढ़ जाएंगी।
सोशल मीडिया के जरिए शुरू हुआ विरोध धीरे-धीरे सड़कों तक पहुंच गया। प्रदर्शन के दौरान संसद परिसर में भी हिंसा हुई। बढ़ते विरोध को देखते हुए राष्ट्रपति विलियम रूटो को बिल वापस लेना पड़ा। युवाओं की मांग थी कि सरकार टैक्स का बोझ बढ़ाने के बजाय भ्रष्टाचार पर रोक लगाए और जनता के पैसे का सही इस्तेमाल करे।
-1792069641131.webp)
2025: नेपाल
साल 2025 में नेपाल Gen Z आंदोलन का सबसे चर्चित उदाहरण बना। वहां सरकार ने कई सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर प्रतिबंध लगाया, जिसे युवाओं के एक बड़े वर्ग ने फ्रीडम ऑफ एक्सप्रेशन पर हमला माना।
राजनीतिक परिवारों के बच्चों की लग्जरी लाइफस्टाइल वाली सोशल मीडिया पोस्ट ने सवाल खड़े कर दिए थे कि नेताओं के बच्चों को इतनी सुविधाएं कैसे मिलती हैं, जबकि आम युवाओं को मौके पाने के लिए संघर्ष करना पड़ता है। इससे करप्शन और नेपोटिज्म पर बहस तेज हो गई। हिंसक झड़पों और बड़ी संख्या में लोगों की मौतों के बाद प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली ने सितंबर 2025 में इस्तीफा दे दिया।

2025: इंडोनेशिया
इंडोनेशिया में अगस्त 2025 में युवाओं का गुस्सा सांसदों को मिलने वाली सुविधाओं और भत्तों के खिलाफ भड़का। खास तौर पर सांसदों के हाउस रेंट अलाउंस को लेकर लोगों ने सवाल उठाए कि जब आम जनता महंगाई और आर्थिक दबाव झेल रही है, तब जनप्रतिनिधियों को इतनी सुविधाएं क्यों मिलनी चाहिए। विरोध के बाद सरकार को कुछ फैसले वापस लेने पड़े और मंत्रिमंडल में भी बदलाव हुए।
2025: फिलीपींस
फिलीपींस में सरकारी भ्रष्टाचार और बाढ़ नियंत्रण परियोजनाओं में गड़बड़ी को लेकर मुद्दा बना। युवाओं का सवाल था कि इन्फ्रास्ट्रक्चर पर भारी सरकारी खर्च के बावजूद बाढ़ से बचाव के इंतजाम प्रभावी क्यों नहीं हैं।

2025: मोरक्को
ऐसा ही विरोध अफ्रीका के मोरक्को में हुआ, सितंबर 2025 के लास्ट में शुरू हुए विरोध प्रदर्शनों के पीछे स्वास्थ्य और शिक्षा सेवाओं की खराब स्थिति, बेरोजगारी और असमानता जैसे मुद्दे थे।
अगादिर के एक अस्पताल में प्रसव के दौरान आठ महिलाओं की मौत ने पब्लिक हेल्थ सिस्टम पर गुस्सा बढ़ाया। युवाओं ने सवाल उठाया कि जब अस्पतालों और स्कूलों को बेहतर बनाने की जरूरत है, तब सरकार विश्व कप 2030 से जुड़ी परियोजनाओं पर भारी खर्च क्यों कर रही है।
-1792069806462.webp)
2026: भारत
भारत में भी युवाओं के गुस्से की एक झलक दिल्ली के जंतर-मंतर पर देखने को मिली। पहले जून 2026 में NEET एग्जाम में कथित गड़बड़ियों और पेपर लीक के आरोपों को लेकर छात्र सड़कों पर उतरे।
प्रदर्शनकारियों ने परीक्षा में पारदर्शिता, मामले की निष्पक्ष जांच और दोषियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग की। फिर अब मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार के खिलाफ देश भर में राजनीतिक और छात्र संगठन बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं।
अगर दुनिया में जेनजी प्रोटेस्ट देखें तो आप समझ पाएंगे कि आखिर इन सभी आंदोलनों को जोड़ता क्या है। दुनिया के Gen Z आंदोलनों का सबसे बड़ा संदेश यही है कि आज के युवा केवल बेहतर भविष्य का वादा नहीं चाहते, बल्कि उसके लिए ठोस नतीजे भी चाहते हैं।
