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अंधेरी रात, जलती कार और 3 लाशें... क्या 27 साल बाद रिहा होगा 1999 के ग्राहम स्टेंस हत्याकांड का मास्टरमाइंड दारा सिंह?

Updated: Tue, 18 Aug 2026 06:51 PM (IST)

ओडिशा के क्योंझर जिले के मनोहरपुर गांव में हुआ ग्राहम स्टेन्स हत्याकांड 27 साल बाद भी भुलाया नहीं जा सका है।

1999 का ग्राहम स्टेंस हत्याकांड (फोटो- जागरण ग्राफिक्स)

1999 का ग्राहम स्टेंस हत्याकांड (फोटो- जागरण ग्राफिक्स)

HighLights

  1. 1999 में ग्राहम स्टेंस और दो बेटों की हत्या

  2. 19 अगस्त को होगी मामले की सुनवाई

गुरप्रीत चीमा, नई दिल्ली। 10 साल और 6 साल… दो बच्चों की उम्र। इतनी कम कि दुनिया अभी उनके लिए स्कूल, खेल और छुट्टियों के बीच सिमटी थी। लेकिन 22 जनवरी1999 की रात इन्हीं दो बच्चों की मौत ने देश को झकझोर दिया, जिसे 27 साल बाद भी भुलाया नहीं जा सका है।

रात गहरी थी। ओडिशा के क्योंझर जिले के मनोहरपुर गांव में एक स्टेशन वैगन अंधेरे में खड़ी थी। अंदर 10 साल का फिलिप, 6 साल का टिमोथी और उनके पिता ऑस्ट्रेलियाई मिशनरी ग्राहम स्टेन्स सो रहे थे।

बाहर अचानक हलचल बढ़ी। कुछ लोग गाड़ी के आसपास जमा हो गए। नींद में डूबे तीन लोगों को शायद अंदाजा भी नहीं था कि कुछ ही पलों में उनके चारों तरफ सिर्फ अंधेरा नहीं, आग का घेरा होगा। गाड़ी को घेरा गया। फिर उसमें आग लगा दी गई। अंदर से निकलने का रास्ता बंद था और बाहर आग फैलती जा रही थी।

कुछ ही देर में स्टेशन वैगन, जिसमें कुछ घंटे पहले एक पिता अपने दो बेटों के साथ सोया था, तीन जिंदगियों की आखिरी जगह बन चुकी थी।

लेकिन आखिर उस रात ऐसा क्या हुआ था कि एक पिता और उसके दो मासूम बेटों को जिंदा जला दिया गया? क्या वजह सिर्फ धर्मांतरण का विवाद थी या इसके पीछे ओडिशा के आदिवासी इलाकों में लंबे समय से पनप रहा कोई और तनाव भी था? दारा सिंह इस हिंसा तक कैसे पहुंचा? समझिए, दैनिक जागरण के इस खास एक्सप्लेनर में इस पूरे हत्याकांड की कहानी।

कौन थे ग्राहम स्टेंस जेम्स?

इस पूरे हत्याकांड को समझने के लिए सबसे पहले बात ऑस्ट्रेलिया के क्वींसलैंड में जन्मे ग्राहम स्टेंस जेम्स की। 1941 में इनका जन्म हुआ। 1965 में वे भारत आए और ओडिशा आने के बाद उन्होंने अपना अधिकांश जीवन आदिवासी और गरीब समुदायों के बीच बिताया।

वे खास तौर पर कुष्ठ रोगियों की सेवा के लिए जाने जाते थे। मयूरभंज और आसपास के इलाकों में उन्होंने लंबे समय तक इलाज और सामाजिक सेवा का काम किया।

1982 में उन्होंने ‘मयूरभंज लेप्रसी होम’ की स्थापना की। वर्ष 1983 में उन्होंने ग्लैडिस से शादी की। बेटी एस्थर और दो बेटे फिलिप और टिमोथी मतलब उनके तीन बच्चे थे। स्थानीय लोगों के बीच उनकी पहचान एक ऐसे व्यक्ति के तौर पर बन चुकी थी, जो लंबे समय से बीमारी और गरीबी से जूझ रहे लोगों की मदद कर रहा था।

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ग्राहम स्टेंस हत्याकांड क्या है?

ग्राहम स्टेंस के दोनों बेटे ऊटी के एक स्कूल में पढ़ते थे। विंटर वैकेशन का टाइम था। बेटे पिता से कहीं घुमाने की जिद्द करते हैं। पिता मान जाते हैं और प्लान बनता है घर के बाहर खड़ी स्टेशन बैगन में घूमने का।

मिशनरी स्टेंस का शहर मयूरभंज में ईसाइयों के एक प्रोग्राम में जाने का भी प्लान था। शाम में घर लौटते समय रास्ते में एक मनोहरपुर नाम का गांव पड़ता है। रात काफी थी तो यह लोग गांव के बाहर कैंप लगा लेते हैं। खाने-पीने के बाद तीनों अपनी गाड़ी में जाकर सो जाते हैं।

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50 से 60 लोगों की भीड़ ने किया हमला

रात के 12 बजे की बात है। अभियोजन के मुताबिक, दारा सिंह की अगुआई में 50 से 60 लोग लोग इकट्ठा होते हैं और गाड़ी को घेर लेते हैं। घेराबंदी के बाद यह भीड़ कुल्हाड़ी और फरसे से गाड़ी पर हमला कर देते हैं। तोड़फोड़ की जाती है, स्टेंस जेम्स और उनके दोनों बेटे दहशत में आ जाते हैं। फिर कार पर पेट्रोल छिड़का जाता है और कार धीरे-धीरे जलकर खाक हो जाती है।

Dara Singh

लेकिन सवाल यह कि आखिर जब कोई व्यक्ति भारत आकर बीमार और गरीब लोगों की मदद कर रहा था तो फिर उसे और उसके बच्चों को क्यों मौत के घाट उतार दिया गया?

धर्मांतरण या सांप्रदायिक तनाव?

दरअसल, मयूरभंज जिले में जब ग्राहम स्टेंस जेम्स कुष्ठ रोगियों के बीच काम कर रहे थे, तब उनपर धर्म परिवर्तन से जुड़े कई मामलों के आरोप लगाए गए थे। बाद में जांच के समय यह बात सामने आई कि दारा सिंह की अगुआई में इस भीड़ ने इसी शक के चलते उनपर हमला किया।

हालांकि, आगे चलकर इस घटना की जांच के लिए कमेटी गठित की गई तो न्यायमूर्ति डी.पी. वाधवा आयोग की रिपोर्ट में इसे लेकर कोई सबूत कोई ठोस सबूत नहीं मिले। इसमें सांप्रदायिक तनाव के कारण हमले की बात सामने आई।

Graham Stains Case

मामले में दारा सिंह उर्फ रवींद्र कुमार पाल को मुख्य आरोपी बनाया गया। जनवरी 2000 में गिरफ्तारी हुई और 2003 में सीबीआई अदालत ने 14 आरोपियों को दोषी ठहराया, दारा सिंह को मौत की सजा सुनाई गई।

हालांकि, बाद में उड़ीसा हाई कोर्ट ने मौत की सजा को उम्रकैद में बदल दिया, जबकि कई अन्य आरोपियों को बरी कर दिया गया। लेकिन इनमें एक और अभियुक्त था जिसकी उम्रकैद की सजा बरकरार रखी गई। वो थे महेंद्र हेम्ब्रम, हालांकि बाद में अच्छे व्यवहार के बाद इन्हें भी बरी कर दिया गया।

2011 में सुप्रीम कोर्ट ने HC के फैसले को बरकरार रखा

सजा के खिलाफ मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, जहां 2011 में शीर्ष अदालत ने हाई कोर्ट के फैसले को बरकरार रखा। सुप्रीम कोर्ट ने माना कि अपराध बेहद गंभीर और निंदनीय था, लेकिन इसे ‘रेयरेस्ट ऑफ रेयर’ की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता, जिसके आधार पर मौत की सजा दी जाए। इस तरह दारा सिंह की मौत की सजा उम्रकैद में तब्दील हो गई और वह जेल में ही रहा।

दारा सिंह ने सजा में छूट के लिए दाखिल की याचिका

दो साल पहले जुलाई में दारा सिंह ने एक याचिका दायर की और दलील दी कि उसने जेल में 25 साल से ज्यादा का समय बिताया और उसे उदार नीति के तहत सजा में छूट दी जानी चाहिए। दरअसल, उदार नीति के तहत एक कैदी 14 साल जेल में बिताने के बाद रिहाई के लिए अपील कर सकता है। दारा सिंह का तर्क है कि जो गलती हुई वो जोश में हुई और उसे इसका पछतावा है।

James Family

ग्राहम स्टेंस ने सभी दोषियों को माफ करने का किया एलान

वहीं ग्राहम स्टेंस की पत्नी ग्लैडिस स्टेंस पहले ही सार्वजनिक रूप से हत्यारों को माफ करने का एलान कर चुकी हैं। वह पति और दोनों बेटों की मौत के बाद भी ओडिशा में ही काम करती रहीं। 2005 में उन्हें उनके काम के लिए पद्माश्री से भी सम्मानित किया गया।

19 अगस्त की सुनवाई पर टिकी सभी की निगाहें

मार्च 2026 में हुई सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने ओडिशा सरकार से दारा सिंह की अपील पर छह सप्ताह में विचार करने का अनुरोध किया। अब इस मामले में 19 अगस्त को अगली सुनवाई होनी है।

वामपंथी दल दारा सिंह की रिहाई के खिलाफ

हालांकि, अब दारा सिंह की रिहाई को लेकर भी एक पेच फंसा हुआ है। ओडिशा के दो वामपंथी दल हैं, पहला सीपीआई और दूसरा सीपीएम जो कि इसका पुरजोर विरोध कर रहे हैं, साथ ही सुप्रीम कोर्ट से माफी याचिका को खारिज करने की भी अपील की गई है।

दोनों दलों की तरफ से एक साझा बयान भी सामने आया, ‘किसी जघन्य सांप्रदायिक अपराध के दोषी की रिहाई से न्याय व्यवस्था पर जनता का भरोसा कम होगा और संविधान में निहित धर्मनिरपेक्ष मूल्यों को नुकसान पहुंचेगा। ऐसी कोई भी पहल राज्य में सांप्रदायिक सद्भाव और कानून व्यवस्था की स्थिति के लिए गंभीर खतरा पैदा कर सकती है।’

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