Exclusive: 2025 में चोट के कारण बिस्तर पर थे, 2026 में जीता कॉमनवेल्थ गोल्ड... जूडो चैंपियन Harsh Singh की रोमांचक कहानी
कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 में जूडो में गोल्ड मेडल जीतकर इतिहास रचने वाले हर्ष सिंह ने अपनी जिंदगी से जुड़े कई रोचक किस्से साझा किए। हर्ष सिंह सीडब्ल् ...और पढ़ें

हर्ष सिंह

समय कम है?
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अभिषेक निगम, नई दिल्ली। 'गोल्ड मेडल जीतकर बहुत अच्छा लगा। यह मेरा पहला अंतरराष्ट्रीय मेडल है। फाइनल में जब जीता, तो जश्न मनाने के लिए अपने हाथ उठाए। फिर पोडियम पर चढ़ा और राष्ट्रगान बजा तो शानदार लगा।' कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 में जूडो में गोल्ड मेडल जीतने वाले हर्ष सिंह ने दैनिक जागरण के साथ एक्सक्लूसिव बातचीत में अपनी दिल की बात बयां की।
ग्लास्गो में संपन्न कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 में हर्ष सिंह ने जूडो स्पर्धा के 60 किग्रा वर्ग में गोल्ड मेडल जीतकर इतिहास रचा। हर्ष सीडब्ल्यूजी इतिहास में जूडो में गोल्ड मेडल जीतने वाले पहले भारतीय एथलीट बने। देश की राजधानी में जूडो के गुर सीखने वाले हर्ष ने बताया कि जब इतिहास रचा तो सबसे पहले मन में ख्याल इंडियन आर्मी, कोच और परिवार व दोस्तों का आया, जिनकी मदद से वो इस मुकाम तक पहुंचे।
हर्ष ने बताया कि निशांत सिंह का उनके जीवन में अहम रोल है, जो हमेशा बेहतर करने के लिए उन्हें प्रोत्साहित करते हैं। 23 साल के हर्ष ने बताया कि कॉमनवेल्थ गेम्स में जाने से पहले वो नर्वस थे, लेकिन निशांत ने उनका हौसला बढ़ाया और अपनी तकनीक पर भरोसा रखने की सलाह दी। हर्ष के लिए निशांत की सलाह 'संजीवनी बूटी' की तरह कारगर साबित हुई और वो अपने सपने को साकार करने में कामयाब रहे।
डर पर पाई जीत
हर्ष सिंह ने बताया कि कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 के दौरान उन्हें सबसे ज्यादा डर फाइनल बाउट से पहले लगा था, जहां उनका सामना ऑस्ट्रेलिया के ओलंपियन जोशुआ काट्ज से हुआ। हालांकि, भारतीय एथलीट ने स्वीकार किया कि पहली बार जब विरोधी पर ग्रिप बनाई, तब एहसास हो गया कि जोशुआ को वो कमजोर साबित कर सकते हैं। बस, अपने विश्वास और सही तकनीक के दम पर हर्ष ने जोशुआ को पटखनी देकर इतिहास के पन्नों में अपना नाम दर्ज करा लिया।
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उम्मीद से ज्यादा मिला
हर्ष सिंह ने कॉमनवेल्थ गेम्स के अपने अनुभव साझा करते हुए बताया कि सबसे ज्यादा मजा क्लोजिंग सेरेमनी में आया। उन्होंने कहा, 'हमारे पास मेडल था तो क्लोजिंग सेरेमनी में काफी शानदार लगा। हम झंडा लेकर घूमे। वहां भारतीय गीत सुने और अच्छा समय बिताया। इस पल को भूल पाना मुश्किल है।'
जूडो चैंपियन ने बताया कि भारत लौटने पर जिस तरह का भव्य स्वागत हुआ, उसकी उन्होंने जरा भी उम्मीद नहीं की थी। हर्ष ने कहा, 'जब भारत लौटे तो एयरपोर्ट पर काफी भीड़ थी। हमें पहले ही बता दिया गया कि बहुत लोग स्वागत करने आए हैं। यह देखकर बहुत खुशी हुई। मैंने उम्मीद नहीं की थी कि इस तरह का स्वागत होगा। गोल्ड मेडल जीतने के साथ देश लौटने पर स्वागत ने मजा दोगुना कर दिया।'
अगला मिशन एशियन गेम्स
हर्ष सिंह ने बताया कि उनका अगला लक्ष्य एशियन गेम्स 2026 में गोल्ड मेडल जीतना है। उन्होंने कहा, 'पूरा ध्यान आगामी एशियन गेम्स पर है। वहां भी गोल्ड मेडल जीतने की कोशिश रहेगी। कोच और सीनियर के साथ मिलकर ट्रेनिंग पर जोर देना है क्योंकि अगर कोरिया या जापान के खिलाफ बाउट हुई तो ग्रिप को बदलना जरूरी होगा। ऐसे में ट्रेनिंग बहुत काम आएगी।'
जूडो से जुड़ने की दिलचस्प कहानी
कामयाबी की राह पर आगे बढ़ रहे हर्ष ने बताया कि जूडो को अपनाने की उनकी कहानी बेहद दिलचस्प है। केवल 8 साल की उम्र से उन्होंने खेलना शुरू कर दिया था। हर्ष ने बताया कि मेरे स्कूल में 3 गेम थे, जूडो, कबड्डी और कुश्ती। मैंने जिला स्तर पर तीनों खेल खेले। मगर सबसे ज्यादा लगाव जूडो से हुआ। इसका कारण थोड़ा अलग है - ड्रेस और बेल्ट के प्रति आकर्षण।
उन्होंने कहा, 'जूडो की ड्रेस देखी और बचपन से ही ब्लैक बेल्ट के बारे में सुना तो यह देखकर इस खेल में दिलचस्पी बढ़ी। फिर इसमें विरोधी को उठाकर पटकना होता है, तो उसमें भी मजा आता था। बस, इस खेल से लगाव हो गया और फिर कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा।'
परिवार के कारण सबकुछ हूं: हर्ष
हर्ष ने बताया कि जूडो में आज जो कुछ भी हैं, वो परिवार के कारण हैं। उन्होंने कहा, 'मैं आज अपने परिवार के कारण यहां तक पहुंच पाया। मेरा बड़ा भाई मुझे बहुत समझाता है और हौसलाअफजाई करता है। मैं ट्रेनिंग में थोड़ा देरी से जाता हूं तो मुझे समय पर जाने के लिए जोर देता है।'
हर्ष ने बताया, 'मेरे माता-पिता भी कहते हैं कि पूरा ध्यान खेल पर लगा। मुझे अपने बड़े भाई की तुलना में सभी चीजें मिल जाती हैं। मैं घर का लाडला हूं। मुझे मेरी मां के हाथ का बना हलवा बहुत पसंद है। परिवार के समर्थन का नतीजा है कि मैं पूरा ध्यान खेल पर लगा पाता हूं और गोल्ड मेडल जीत पाया।'
करियर तबाह होते हुए बचा
हर्ष ने अपने करियर के सबसे भयावह समय के बारे में भी बताया। उन्होंने कहा, '2025 में मुझे एसीएल चोट लगी थी। मैं एक साल तक बिस्तर पर रहा। छह-सात महीने मैं घर पर रहा, ट्रेनिंग से दूर। फिर मैंने समझा की ट्रेनिंग भी अच्छी तरह करनी है और चोट से मुक्त भी रहना है। वापसी करके मेडल जीतना सुखद अनुभव रहा।'
हर्ष ने भारत में जूडो के बेहतर भविष्य की उम्मीद जताई। उन्होंने कहा, 'इस खेल की लोकप्रियता में इजाफा हो रहा है। पहले लोग सिर्फ सुरक्षा कारणों से जूडो सीखते थे, लेकिन अब इस खेल में पदक जीतने की आस बढ़ गई है। मेरा एक दोस्त कोच है, उसने कॉल करके बताया कि मेरे मेडल जीतने के अगले दिन छह बच्चों के माता-पिता एडमिशन कराने आए थे। इससे मुझे बहुत खुशी मिली। उम्मीद है कि देश में इस खेल की लोकप्रियता बढ़ेगी।'