'सोनिया की अगुआई वाली एनएसी थी दिमागी नक्सल के शासन का बेहतरीन उदाहरण', चलाए जाते थे गुप्त एजेंडे
पीएम मोदी द्वारा स्वतंत्रता दिवस पर देश के नाम संबोधन में इस्तेमाल किए गए 'दिमागी नक्सल' शब्द का अर्थ स्पष्ट ...और पढ़ें

आरएसएस से जुड़ी पत्रिका 'ऑर्गनाइजर' ने संपादकीय में कांग्रेस पर साधा निशाना (फोटो- रॉयटर)
HighLights
आरएसएस से जुड़ी पत्रिका 'ऑर्गनाइजर' ने संपादकीय में कांग्रेस पर साधा निशाना
'दिमागी नक्सल' शहरों में गुप्त रूप से काम करते हैं और मुखौटा संगठन बनाते हैं
पीटीआई, नई दिल्ली। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा स्वतंत्रता दिवस पर देश के नाम संबोधन में इस्तेमाल किए गए 'दिमागी नक्सल' शब्द का अर्थ स्पष्ट करते हुए आरएसएस से जुड़ी पत्रिका 'ऑर्गनाइजर' ने अपने संपादकीय में कांग्रेस पर निशाना साधा है।
इसमें आरोप लगाया गया है कि पिछली संप्रग सरकार के दौरान सोनिया गांधी के नेतृत्व वाली राष्ट्रीय सलाहकार परिषद (एनएसी) शासन व्यवस्था पर 'दिमागी नक्सल' के कब्जे का एक बेहतरीन उदाहरण थी।
'ऑर्गनाइजर' पत्रिका के नवीनतम अंक में प्रकाशित संपादकीय में माओवादी दस्तावेज का हवाला देते हुए दावा किया गया है कि 'दिमागी नक्सल' वे लोग हैं, जो शहरों में गुप्त रूप से काम करते हैं और छात्रों, महिलाओं, मजदूर वर्ग, किसानों, अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों और तथाकथित अल्पसंख्यकों के नाम पर कई मुखौटा संगठन बनाते हैं।
जहां उन्हें अपने मंच के जरिये गतिविधियों को अंजाम देने की जगह नहीं मिलती, वहां वे दूसरे संगठनों में घुसपैठ करते हैं और सर्वाधिक गुप्त तरीकों से उनके एजेंडे को प्रभावित करते हैं।
पत्रिका के संपादक प्रफुल्ल केतकर ने अपने लेख में कहा-संप्रग सरकार के दौरान सोनिया गांधी के नेतृत्व वाली तत्कालीन राष्ट्रीय सलाहकार परिषद, शासन व्यवस्था पर दिमागी नक्सलियों के कब्जे का एक शानदार उदाहरण थी।
नौकरशाही, नीति-निर्माण तंत्र, कानूनी प्रणाली, अकादमिक जगत, मीडिया और गैर-सरकारी संगठनों में घुसपैठ करने का विचार उनकी क्रांतिकारी रणनीति का हिस्सा है।
वे बंदूकें नहीं उठाते, बल्कि प्रख्यात इतिहासकार या बुद्धिजीवी, पुरस्कार प्राप्त साहित्यकार, कानून के दिग्गज, मानवाधिकार कार्यकर्ता, स्वतंत्र पत्रकार, चर्चित अभिनेता या अभिनेत्री और पर्यावरणविद जैसे तमगे इस्तेमाल करते हैं।
नागरिक समाज उनके लिए संवैधानिक लोकतंत्र के खिलाफ प्रतिरोध का साधन है। उन्होंने कहा, दिमागी नक्सल की पहचान करें, उनकी असलियत समझें और उन्हें बेनकाब करें, जो लोगों की भावनाओं और उनकी वास्तविक चिंताओं का फायदा उठाकर उन्हें गुमराह करना चाहते हैं।
वे वास्तविक बदलाव लाने वाले नहीं हो सकते, बल्कि हिंसक अधिनायकवाद के खतरनाक एजेंट हैं, जहां लोकतांत्रिक भागीदारी के बिना सड़कों पर और विरोध के जरिये फैसले लिए जाएंगे। चूंकि सशस्त्र विद्रोह बुरी तरह विफल हो चुका है, इसलिए अब दिमागी स्वरूप ने जिम्मेदारी संभाल ली है।
