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वंदे मातरम् विवाद पर BJP की चाल में फंस रही कांग्रेस या चल रही है कोई बड़ा दांव?

Updated: Tue, 25 Aug 2026 05:39 PM (IST)

कांग्रेस कार्य समिति द्वारा वंदे मातरम् के केवल पहले दो पद गाने के फैसले पर राजनीतिक घमासान छिड़ गया है।

वंदे मातरम् को लेकर बीजेपी-कांग्रेस में घमासान

वंदे मातरम् को लेकर बीजेपी-कांग्रेस में घमासान

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डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। देश में इस समय वंदे मातरम् के गान को लेकर एक बार फिर राजनीतिक घमासान जारी है। कांग्रेस कार्य समिति (CWC) द्वारा अपने कार्यक्रमों में राष्ट्रीय गीत वंदे मातरम् के केवल पहले दो पद गाने के फैसले ने सियासी पारे को चढ़ा दिया है।

इस फैसले के बाद यह बहस छिड़ गई है कि क्या कांग्रेस राष्ट्रवाद के मुद्दे पर भारतीय जनता पार्टी (BJP) के बिछाए राजनीतिक जाल में फंस गई है या फिर यह उसकी कोई सोची-समझी चुनावी रणनीति का हिस्सा है?

राष्ट्रगीत पर बीजेपी का हमला और घेराबंदी

कांग्रेस के इस कदम के तुरंत बाद बीजेपी ने आक्रामक रुख अपनाते हुए चौतरफा हमला बोल दिया। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह और केंद्रीय मंत्री जेपी नड्डा ने कांग्रेस पर तुष्टिकरण की राजनीति का आरोप लगाया।

जेपी नड्डा ने 1937 के कांग्रेस प्रस्ताव का जिक्र करते हुए कहा कि राष्ट्रीय गीत को दो हिस्सों में बांटने के फैसले ने ही देश में दो राष्ट्र सिद्धांत को हवा दी थी। वहीं, केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह और सांसद दिनेश शर्मा ने कांग्रेस की तुलना मुस्लिम लीग और जिन्ना की सोच से कर डाली।

राष्ट्रगान के बराबर मिला दर्जा

बीजेपी ने हाल ही में राष्ट्रीय सम्मान के अपमान की रोकथाम अधिनियम में संशोधन कर वंदे मातरम् को जन-गण-मन के बराबर दर्जा दिया है।

सरकार इस गीत की 150वीं वर्षगांठ के उपलक्ष्य में देशव्यापी अभियान भी चला रही है। ऐसे समय में कांग्रेस द्वारा केवल दो पदों के उपयोग पर जोर देना, बीजेपी के लिए कांग्रेस को अल्पसंख्यक तुष्टिकरण के मुद्दे पर घेरने का एक बड़ा हथियार बन गया है।

क्या BJP के जाल में फंसी कांग्रेस?

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि बीजेपी लंबे समय से राष्ट्रवाद और तुष्टिकरण के मुद्दे पर कांग्रेस को घेरती रही है। अगर इतिहास में जाए तो 1980 के दशक का शाह बानो मामला इसका बड़ा उदाहरण है। पिछले दशकों से लेकर हाल के वर्षों तक बीजेपी ने इस तरह के मुद्दों का राजनीतिक फायदा उठाया है।

सरकार द्वारा वंदे मातरम् को दिए गए नए कानूनी दर्जे और 6 पदों के गान के प्रोटोकॉल के बीच, कांग्रेस का 1937 के ऐतिहासिक प्रस्ताव का हवाला देना उसे एक रक्षात्मक स्थिति में खड़ा करता है।

इससे BJP को कांग्रेस पर राष्ट्रवाद से समझौता करने और अपने कोर वोटर को साधने के लिए पुरानी राजनीति दोहराने का सीधा मौका मिल गया है।

कांग्रेस का सोचा-समझा दांव?

दूसरी तरफ, कांग्रेस का तर्क है कि यह कोई नया फैसला नहीं है, बल्कि 90 साल पुरानी ऐतिहासिक परंपरा है। पार्टी महासचिव के.सी. वेणुगोपाल के अनुसार, 1937 में रवींद्रनाथ टैगोर की सलाह पर सर्वसम्मति से गीत के पहले दो पदों को स्वीकार किया गया था ताकि सभी समुदायों को साथ जोड़ा जा सके।

कांग्रेस की नजर अपने उस पारंपरिक अल्पसंख्यक और वंचित वोट बैंक पर है, जो पिछले कुछ सालों में उनसे छिटक गया है। कांग्रेस का पारंपरिक अल्पसंख्यक वोट क्षेत्रीय दलों की ओर खिसक गया है।

राहुल गांधी जहां एक तरफ जाति जनगणना की मांग उठाकर SC, ST और OBC वर्गों को जोड़ने की कोशिश कर रहे हैं, वहीं वंदे मातरम् के मुद्दे पर 1937 के रुख पर कायम रहकर वे यह संदेश देने की कोशिश में हैं कि पार्टी अपने धर्मनिरपेक्ष सिद्धांतों से पीछे नहीं हटेगी।

ऐसे में सवाल अब भी उठता है कि क्या कांग्रेस बीजेपी के राष्ट्रवाद बनाम तुष्टिकरण के नैरेटिव के चक्रव्यूह में उलझ गई है या उसने अपने पारंपरिक वोट आधार को एकजुट करने के लिए यह जोखिम उठाया है।