पटाखों से तौबा और 3 दिन का कड़ा उपवास: जैन दीवाली की ये परंपराएं आपको हैरान कर देंगी
जैन धर्म में दीवाली का विशेष महत्व है, यह भगवान महावीर के निर्वाण और अज्ञान पर ज्ञान की जीत का ...और पढ़ें

दिवाली समारोह के दौरान जैन दर्शन (Picture Credits- AI Images)
HighLights
दीवाली भगवान महावीर के निर्वाण का प्रतीक है।
यह अज्ञान पर ज्ञान की जीत दर्शाती है।
जैन नव वर्ष दीवाली के अगले दिन शुरू होता है।
धर्म डेस्क, नई दिल्ली। दीवाली रोशनी का त्योहार जिसे भारतवर्ष में बेहद ही धूमधाम और बड़े पैमाने पर मनाया जाता है जब चारों ओर दीये और लाइटों की रोशनी रात के अंधेरे को मिटाकर रोशन करती है। हिंदू धर्म ही नहीं बल्कि जैन और सिख धर्म में भी इसका गहरा महत्व है।
जैन धर्म में दीवाली 24वें तीर्थंकार भगवान महावीर के निर्वाण (मुक्ति) का प्रतीक माना जाता है, जो आज से करीब 527 BC में कार्तिक मास की अमावस्या को पावापुरी में हुआ था।
जैन धर्म में दीवाली अज्ञान पर ज्ञान की जीत का प्रतीक माना जाता है, क्योंकि भगवान महावीर के मोक्ष पाने के बाद दुनिया अनगिनत दीयों से रोशन हो गई थी। जैन धर्म से जुड़े लोगों के लिए दीवाली भौतिक त्योहारों से ज्यादा आत्मा की शुद्धि, सच्चे ज्ञान की प्राप्ति और जीत के बारे में है।
जैन धर्म में दीवाली का महत्व
जैन धर्म में दीवाली का सबसे बड़ा महत्व भगवान महावीर के मोक्ष प्राप्त करने की याद में मनाया जाता है। उत्तराध्ययन सूत्र में सुरक्षित उनकी आखिरी शिक्षाएं जैन धर्म के लोगों को सत्य, अहिंसा और त्याग के मार्ग पर ले जाती हैं।
दीवाली के मौके पर जलाए जाने वाले दीपक सच्चे ज्ञान की हमेशा जलने वाली ज्योति का प्रतीक होती है, जिसे भगवान महावीर ने दुनिया को दिया था कि अज्ञान के अंधेरे को दूर करके अंदर की आजादी का रास्ता दिखाई देता है।
जैन नए साल की शुरुआत
जैन धर्म में दिवाली के अगले दिन जिसे प्रतिपदा तिथि के नाम से जाना जाता है, नव वर्ष के रूप में मनाया जाता है। यह भगवान महावीर के मुख्य शिष्य गौतम स्वामी के सबकुछ जानने का भी दिन भी है। इस तरह दीवाली एक अंत और शुरुआत दोनों का ही दिन माना जाता है।
जैन दीवाली से जुड़ी प्रथाएं
जैन धर्म में लोग दीवाली को पूरी गंभीरता के साथ मनाते हैं। यहां भोग-विलास के बजाय आत्मा-अनुशासन, अहिंसा और त्याग को प्राथमिकता दी जाती है।
कई लोग दीवाली के तीन दिनों (छोटी दीवाली, दीवाली और उसके अगले दिन) में व्रत रखते हैं। भगवान के भजन गाने के साथ धर्मग्रंथ पढ़ते हैं और भगवान महावीर के आखिरी उपदेशों पर ध्यान देते हैं।
इस ग्रंथ को पढ़ने और सुनने का खास महत्व है, क्योंकि इसमें भगवान महावीर की अंतिम शिक्षाएं भी शामिल हैं।
कई जैन लोग इस पवित्र दिन पर प्रार्थना और सम्मान देने के लिए भगवान महावीर के निर्वाण स्थल पावापुरी की तीर्थ यात्रा करते हैं।
जैन धर्म के मुताबिक, जैन लोग अहिंसा बनाए रखने और जीवों को नुकसान से बचाने के लिए पटाखे भी नहीं जलाते हैं।
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