क्या आप जानते हैं, किसने शुरू की थी कांवड़ यात्रा की परंपरा और कहां चढ़ा था पहला जल?
कांवड़ यात्रा भगवान शिव के प्रति अटूट आस्था का प्रतीक है और हर साल लाखों भक्त सावन में गंगाजल लेकर शिवालयों में चढ़ाते हैं। ...और पढ़ें
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किसने की थी कांवड़ यात्रा की शुरुआत (Picture Credit- AI Generated)
धर्म डेस्क, नई दिल्ली। हिंदू कैलेंडर के अनुसार, सावन साल का पांचवा और सबसे पवित्र महीना माना जाता है। इस वर्ष सावन की शुरुआत 30 जुलाई से हो रही है। शिव भक्तों के लिए यह समय आस्था और कठिन तपस्या का होता है, जिसका मुख्य आकर्षण 'कांवड़ यात्रा' है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि दुनिया के सबसे पहले कांवड़िए कौन थे और उन्होंने किस मंदिर में अभिषेक किया था? अगर नहीं, तो चलिए जानते हैं इस बारे में।
भगवान परशुराम से जुड़ी है यह कथा
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, भगवान विष्णु के छठे अवतार अर्थात परशुराम जी वह पहले व्यक्ति थे, जिन्होंने कांवड़ यात्रा की शुरुआत की थी। शास्त्रों में उल्लेख है कि उन्होंने ही सबसे पहले गंगाजल लाकर शिवलिंग का अभिषेक किया था, जिसके बाद से कांवड़ यात्रा की परंपरा शुरू हुई।
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(Picture Credit: Freepik)
यहां चढ़ी थी पहली कांवड़
उत्तर प्रदेश के बागपत जिले में स्थित 'पुरा महादेव' मंदिर का इतिहास बेहद प्राचीन और गौरवशाली है। माना जाता है कि इस मंदिर की स्थापना स्वयं भगवान परशुराम ने हिंडन नदी के तट पर की थी और कांवड़ में गढ़मुक्तेश्वर (वर्तमान नाम ब्रजघाट) से गंगाजल लाकर इस मंदिर के शिवलिंग पर अर्पित किया था।
आज भी सावन के पवित्र माह में लाखों श्रद्धालु हरिद्वार से पैदल जल लाकर यहां महादेव का अभिषेक करने आते हैं। माना जाता है कि कांवड़ में जल लाकर पुरा महादेव पर जल चढ़ाने से भक्त की सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं।
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(Picture Credit- AI Generated)
यह भी हैं मान्यताएं
कांवड़ यात्रा से जुड़ी अन्य मान्यताओं के अनुसार, श्रवण कुमार को भी पहला कावड़िया माना जाता है, जिन्होंने सर्वप्रथम त्रेतायुग में कावड़ यात्रा की थी। अपने माता-पिता को तीर्थ यात्रा कराने के क्रम में श्रवण कुमार ने उन्हें कावड़ में बैठा कर हरिद्वार लाए थे और उन्हें गंगा स्नान कराया। वापसी में वे अपने साथ गंगाजल भी ले गए। इसे भी कावड़ यात्रा की शुरुआत माना जाता है।
वहीं प्रथम कांवड़ यात्रा की पौराणिक कथा रावण से भी जोड़ी जाती है। मान्यता है कि रावण ने समुद्र मंथन के दौरान निकले विष का प्रभाव कम करने के लिए कांवड़ में जल भरकर महादेव का अभिषेक किया था। कुछ मान्यताओं के अनुसार समुद्र मंथन से निकले हलाहल के प्रभावों को दूर करने के लिए देवताओं ने शिव पर पवित्र नदियों का शीतल जल चढ़ाया था।
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