अशुभ नहीं, फलदायी है मलमास! इन नियमों के साथ करेंगे पूजा, तो मिलेगा दोगुना फल, पढ़ें दान का महत्व
आइए मलमास से जुड़े प्रमुख नियमों को जानते हैं। ताकि पूजा में किसी भी तरह की गलती न हो। ...और पढ़ें

मलमास 2026: पुण्य कमाने का सबसे बड़ा अवसर। Ai Generated Image

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धर्म डेस्क, नई दिल्ली। मलमास, जिसे अधिक मास या पुरुषोत्तम मास के नाम से जाना जाता है। अक्सर लोग इसे 'अशुभ' मानकर केवल वर्जित कामों पर ध्यान देते हैं, लेकिन असल में यह महीना श्रीहरि की कृपा पाने का शुभ अवसर होता है।
शास्त्रों के अनुसार, इस महीने में किए गए जप, तप और दान का फल अन्य महीनों की तुलना में दस गुना अधिक मिलता है। भगवान विष्णु ने खुद इस मास को अपना नाम 'पुरुषोत्तम' दिया है, इसलिए इस दौरान की गई साधना कभी निष्फल नहीं जाती, तो आइए इस महीने से जुड़ी प्रमुख बातों को जानते हैं।
मलमास में पूजा के जरूरी नियम
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ब्रह्म मुहूर्त में स्नान और संध्या पूजन
मलमास के दौरान सूर्योदय से पूर्व उठकर पवित्र नदियों में स्नान करने का बहुत महत्व है। अगर नदी में स्नान संभव न हो, तो घर पर ही जल में थोड़ा गंगाजल मिलाकर स्नान करें। इसके बाद गायत्री मंत्र या भगवान विष्णु के मंत्रों का जाप करें।
दीपदान की महिमा
इस पूरे माह में शाम के समय तुलसी के पौधे के पास और घर के मुख्य द्वार पर घी का दीपक जलाना बेहद शुभ माना जाता है। दीपदान से घर की नकारात्मक ऊर्जा दूर होती है और लक्ष्मी का स्थायी वास होता है।
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सात्विकता का पालन
मलमास में तामसिक भोजन का पूरी तरह त्याग करना चाहिए। इस दौरान जमीन पर सोना और ब्रह्मचर्य का पालन करना इस माह की साधना के महत्व को बढ़ाता है।
दान का महत्व
मलमास में दान को 'अश्वमेध यज्ञ' के समान पुण्यकारी माना गया है। इस दौरान पीली वस्तुओं का दान करना सबसे शुभ होता है।
- अन्न दान - इस दौरान भूखे व्यक्ति को भोजन कराना या चने की दाल और केसरिया चावल का दान करना कुंडली में गुरु ग्रह को मजबूत करता है।
- मालपुआ दान - धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, मलमास में कांसे के बर्तन में मालपुआ रखकर दान करने से संतान सुख और पारिवारिक समृद्धि प्राप्त होती है।
- वस्त्र दान - इस माह में किसी ब्राह्मण या जरूरतमंद को पीले वस्त्र दान करने से भगवान पुरुषोत्तम यानी श्री हरि खुश होते हैं।
पूजन मंत्र
1. ॐ नमो भगवते वासुदेवाय।।
2. शांताकारं भुजंगशयनं पद्मनाभं सुरेशम् विश्वाधारं गगनसदृशं मेघवर्णं शुभांगम्।
लक्ष्मीकांतं कमलनयनं योगिभिर्ध्यानगम्यम् वन्दे विष्णुं भवभयहरं सर्वलोकैकनाथम्॥
3. सर्वधर्मान् परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज। अहं त्वां सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः॥
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