नारद मुनि का वानर मुख और उनका वो श्राप, जो बना भगवान विष्णु के राम अवतार का सबसे बड़ा कारण
नारद मुनि को अपनी तपस्या पर घमंड हो गया था, जिसे तोड़ने के लिए भगवान विष्णु ने माया रची और ...और पढ़ें

रामचरितमानस में है इस कथा का सुंदर वर्णन

समय कम है?
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धर्म डेस्क, नई दिल्ली। देवर्षि नारद भगवान विष्णु के सबसे बड़े भक्तों में से एक माने जाते हैं। लेकिन, पुराणों में एक ऐसा भी किस्सा है जब खुद नारद मुनि ने क्रोध में आकर अपने ही आराध्य भगवान विष्णु को श्राप दे दिया था।
तपस्या और कामदेव की हार
पौराणिक कथा एक बार नारद मुनि हिमालय की एक गुफा में कठोर तपस्या कर रहे थे। देवराज इंद्र को हमेशा की तरह डर सताने लगा कि कहीं नारद मुनि स्वर्ग का सिंहासन न मांग लें। इंद्र ने उनकी तपस्या तोड़ने के लिए कामदेव को भेजा। कामदेव ने बहुत कोशिश की, लेकिन नारद मुनि का ध्यान नहीं टूटा।
इस घटना के बाद नारद मुनि के मन में घमंड आ गया कि उन्होंने वासना और कामदेव को जीत लिया है। उन्होंने यह बात भगवान शिव को बताई। शिवजी ने उन्हें समझाया कि अपनी इस जीत का बखान विष्णु जी के सामने न करें, लेकिन अहंकार में डूबे नारद मुनि सीधे वैकुंठ पहुंचे और विष्णु जी को पूरी कहानी सुना डाली।
विष्णु जी की माया और वानर मुख
भगवान विष्णु समझ गए कि उनके भक्त में अहंकार आ गया है। इसे तोड़ने के लिए उन्होंने एक मायावी नगरी रची। वहां के राजा की एक बेहद खूबसूरत बेटी थी विश्वमोहिनी, जिसका स्वयंवर होने वाला था। नारद मुनि जैसे ही उस नगर से गुजरे और राजकुमारी को देखा, वो उस पर मोहित हो गए।
उन्होंने राजकुमारी से विवाह करने की ठान ली। दौड़े-दौड़े विष्णु जी के पास आए और उनसे उनका सबसे सुंदर रूप मांगा ताकि राजकुमारी सिर्फ उन्हें ही चुने। विष्णु जी ने कहा, "मैं वही करूंगा जिसमें तुम्हारा भला हो।" भगवान ने उनका शरीर तो सुंदर बना दिया, लेकिन चेहरा एक वानर (बंदर) का कर दिया। नारद मुनि को इस बात का बिल्कुल पता नहीं था।
स्वयंवर में उपहास और श्राप
स्वयंवर सभा में नारद मुनि बड़े आत्मविश्वास से बैठे थे, लेकिन वहां मौजूद लोग और शिवजी के गण उन्हें देखकर हंस रहे थे। तभी भगवान विष्णु एक सुंदर राजकुमार के रूप में वहां आए और विश्वमोहिनी ने उनके गले में वरमाला डाल दी।
जब शिवजी के गणों ने नारद जी से कहा कि जरा पानी में अपना मुंह तो देखिए, तब उन्हें असलियत पता चली। अपना वानर रूप देखकर और खुद को छला हुआ महसूस करके नारद जी भयंकर क्रोधित हो उठे।
उन्होंने भगवान विष्णु को श्राप दिया कि "जिस तरह तुमने छल से मुझे स्त्री-वियोग का दुख दिया है, वैसे ही तुम्हें भी धरती पर मनुष्य रूप में जन्म लेकर पत्नी का वियोग सहना होगा। और, जिन वानरों का मुख देकर तुमने मेरा मजाक उड़ाया है, वही वानर उस समय तुम्हारी मदद करेंगे।" 'रामचरितमानस' के बालकांड और शिव पुराण' में रुद्र संहिता/सती खंड में इस कथा का वर्णन बड़े ही विस्तार से मिल जाएगा।
रामचरितमानस में नारद मुनि द्वारा भगवान विष्णु को दिए गए श्राप का वर्णन इस प्रसिद्ध चौपाई में बहुत सटीक ढंग से किया गया है:
रामचरितमानस के बालकाण्ड (छंद/दोहा संख्या 137)
कपि आकृति तुम्ह कीन्हि हमारी। करिहहिं कीस सहाय तुम्हारी॥
मम अपकार कीन्ह तुम्ह भारी। नारि बिरहँ तुम्ह होब दुखारी॥
अर्थ: आपने मुझे वानर का रूप दिया है, इसलिए वानर ही आपकी मदद करेंगे। आपने मेरा बड़ा अहित किया है, इसलिए आपको भी मेरी तरह स्त्री-वियोग का भारी दुख सहना पड़ेगा।
श्राप बना रामावतार की वजह
श्राप देते ही भगवान ने अपनी माया समेट ली। वहां न कोई नगर था, न राजकुमारी। तब विष्णु जी ने बताया कि यह सब उनका घमंड तोड़ने के लिए रची गई एक लीला थी। सच्चाई जानकर नारद जी ने क्षमा मांगी। आगे चलकर इसी श्राप के कारण भगवान विष्णु ने श्रीराम के रूप में अवतार लिया, माता सीता का वियोग झेला और रावण को हराने के लिए सुग्रीव, हनुमान जैसी वानर सेना की मदद ली।
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