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    फीचर नहीं फोन की मजबूती देखना भी है बेहद जरूरी, कैसे चुने अपने लिए टिकाऊ स्मार्टफोन?

    By Santosh AnandEdited By: Subhash Gariya
    Updated: Wed, 15 Jul 2026 02:30 PM (IST)

    अगर आप नया स्मार्टफोन खरीदने जा रहे हैं, तो कैमरा, प्रोसेसर और बैटरी के साथ-साथ स्क्रीन प्रोटेक्शन, फ्रेम मैटीरियल, वाटर रेजिस्टेंस, रिपेयर कॉस्ट और स ...और पढ़ें

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    समय कम है?

    जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में

    संक्षेप में पढ़ें

    टेक्नोलॉजी डेस्क, नई दिल्ली। आज के समय में नया स्मार्टफोन खरीदते समय ज्यादातर लोग कैमरा, प्रोसेसर, बैटरी और एआई फीचर्स पर ज्यादा ध्यान देते हैं, लेकिन एक ऐसी चीज है, जिसे अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है और वह है फोन की ड्यूरेबिलिटी यानी उसकी मजबूती। सोचिए, आपने 40,000 या 80,000 रुपये का नया स्मार्टफोन खरीदा और कुछ ही महीनों बाद वह हाथ से गिरकर टूट गया। इसके बाद न सिर्फ स्क्रीन बदलवाने में हजारों रुपये खर्च होंगे, बल्कि कई बार तो लोग मजबूरी में नया फोन खरीदने तक का फैसला कर लेते हैं।

    डिस्प्ले ग्लास बनाने वाली एक कंपनी की स्टडी में भी यह बात सामने आई है कि भारत में 53 प्रतिशत लोगों ने सिर्फ इसलिए तय समय से पहले नया स्मार्टफोन खरीदा, क्योंकि उनके पुराने फोन का ग्लास टूट गया था। रिपोर्ट बताती है कि आज यूजर्स सिर्फ शानदार कैमरा या तेज प्रोसेसर ही नहीं, बल्कि ऐसा फोन चाहते हैं जो डेली के उपयोग में आसानी से खराब न हो। इसलिए अब ड्यूरेबिलिटी भी स्मार्टफोन खरीदने का एक पैमाना बन चुका है।

    डिस्प्ले की सुरक्षा क्यों जरूरी?

    आधे से अधिक लोग नया स्मार्टफोन पुराने फोन का स्क्रीन ग्लास टूटने के कारण खरीदते हैं। यूजर्स हमेशा इस डर में रहते हैं कि कहीं फोन गिरकर उसकी स्क्रीन न टूट जाए। जिन लोगों का फोन टूट गया, उनमें हर पांच में से एक को अधिकृत सर्विस सेंटर से स्क्रीन रिप्लेसमेंट या रिपेयर करानी पड़ी। प्रीमियम स्मार्टफोन की ओएलइडी या फोल्डेबल स्क्रीन बदलवाने का खर्च 15,000 से 35,000 रुपये तक पहुंच जाता है।

    फोन की मजबूती

    कई लोग मानते हैं कि अगर फोन में गोरिल्ला ग्लास है, तो वह पूरी तरह सुरक्षित है, जबकि वास्तविकता इससे अलग है। किसी भी स्मार्टफोन की मजबूती कई तकनीकों के मेल से तय होती है। सबसे पहले फ्रेम मैटीरियल आता है। प्रीमियम स्मार्टफोन में अब टाइटेनियम या एयरोस्पेस ग्रेड एल्यूमिनियम फ्रेम का उपयोग किया जा रहा है। टाइटेनियम डेंट और मुड़ने से बेहतर सुरक्षा देता है, जबकि एल्यूमिनियम गिरने पर लगने वाले झटके को बेहतर तरीके से सोख लेता है और हीट भी तेजी से बाहर निकालता है।

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    दूसरी ओर बजट स्मार्टफोन में प्लास्टिक फ्रेम मिलता है, जो हल्का तो होता है, लेकिन यह उतना मजबूत नहीं माना जाता है। इसके अलावा, फोन का डिजाइन भी काफी मायने रखता है। मजबूत यूनिबॉडी डिजाइन, बेहतर इंटरनल फ्रेम, शॉक एब्जॉर्बिंग लेयर और मजबूत कॉर्नर वाले फोन को गिरने पर कम नुकसान होता है।

    सिर्फ गोरिल्ला ग्लास ही काफी नहीं

    आजकल स्मार्टफोन बड़ी डिस्प्ले के साथ आने लगे हैं और यही वह हिस्सा है, जो सबसे ज्यादा जोखिम में रहता है। इसलिए कंपनियां अलग-अलग तरह की प्रोटेक्टिव ग्लास टेक्नोलॉजी का उपयोग करती हैं। आज बाजार में गोरिल्ला ग्लास विक्टस, गोरिल्ला ग्लास विक्टस 2, गोरिल्ला ग्लास 7आइ, ड्रैगनट्रेल ग्लास, एलुमिनोसिलिकेट ग्लास और सैफायर ग्लास जैसे विकल्प मौजूद हैं।

    सैफायर ग्लास को सबसे मजबूत माना जाता है और इसकी कठोरता हीरे के बाद सबसे ज्यादा होती है। हालांकि इसकी कीमत अधिक होने के कारण इसका उपयोग केवल महंगे और प्रीमियम डिवाइस में ही किया जाता है। गोरिल्ला ग्लास सबसे ज्यादा उपयोग होने वाला प्रोटेक्टिव ग्लास है, जो गिरने और खरोंच दोनों से अच्छी सुरक्षा देता है। वहीं ड्रैगनट्रेल ग्लास और एलुमिनोसिलिकेट ग्लास भी मजबूती के मामले में अच्छे विकल्प माने जाते हैं। हालांकि यह समझना जरूरी है कि कोई भी ग्लास पूरी तरह अनब्रेकेबल नहीं होता है। मजबूत ग्लास केवल स्क्रीन टूटने की आशंका को कम कर सकता है।

    ड्रॉप प्रोटेक्शन और स्क्रैच रेजिस्टेंस

    रोजमर्रा की जिंदगी में फोन कई बार चाबी, सिक्कों, बैग या टेबल जैसी सतहों के संपर्क में आता है। ऐसे में कमजोर स्क्रीन पर आसानी से स्क्रैच पड़ सकते हैं। 52 प्रतिशत भारतीय यूजर्स ड्राप प्रोटेक्शन को सबसे जरूरी फीचर मानते हैं, जबकि 48 प्रतिशत लोग स्क्रैच रेजिस्टेंस को प्राथमिकता देते हैं। अगर फोन मजबूत फ्रेम और बेहतर ग्लास के साथ आता है, तो गिरने की स्थिति में स्क्रीन के टूटने की आशंका काफी कम हो जाती है।

    अगर स्क्रीन टूट जाए तो क्या करें?

    अगर स्क्रीन पर केवल हल्के स्क्रैच हैं तो अच्छी क्वॉलिटी का टेंपर्ड ग्लास लगाकर उन्हें काफी हद तक छिपाया जा सकता है, लेकिन अगर स्क्रीन में दरार आ गई है, टच सही से काम नहीं कर रहा है या डिस्प्ले ब्लिंक कर रही है, तो लोकल मार्केट की बजाय अधिकृत सर्विस सेंटर से ही स्क्रीन बदलवानी चाहिए। इससे ओरिजिनल पार्ट मिलने की संभावना ज्यादा रहती है और फोन की क्वॉलिटी भी बनी रहती है। अगर आपने मोबाइल इंश्योरेंस, एक्सटेंडेड वारंटी या स्क्रीन प्रोटेक्शन प्लान लिया है, तो रिपेयर का खर्च काफी कम हो सकता है। कई कंपनियां एक बार मुफ्त या कम कीमत में स्क्रीन रिप्लेसमेंट की सुविधा भी देती हैं।

    फोन खरीदते समय इन बातों पर जरूर ध्यान दें

    • नया स्मार्टफोन खरीदते समय केवल कैमरा और प्रोसेसर देखकर फैसला न करें। यह जरूर जांचें कि फोन में कौन-सा स्क्रीन ग्लास दिया गया है।
    • अगर फोन बहुत ज्यादा पतला यानी सात मिमी से कम मोटाई वाला है, तो यह समझ लें कि डिजाइन के लिए मजबूती से कुछ समझौता किया गया हो सकता है।
    • आईपी68 या आईपी69 रेटिंग देखकर ही संतुष्ट न हों। यह भी देखें कि कंपनी ने कितनी गहराई तक पानी में टेस्ट किया है। कुछ फोन 1.5 मीटर तक टेस्ट किए जाते हैं, जबकि कुछ छह मीटर तक।
    • अगर आप फोल्डेबल फोन खरीद रहे हैं, तो यह भी ध्यान रखें कि सामान्य स्मार्टफोन की तुलना में इसकी हिंज और फोल्डिंग स्क्रीन पर ज्यादा दबाव पड़ता है।

    अच्छा स्क्रीन प्रोटेक्टर कौन-सा है?

    • अगर आप स्क्रीन की अतिरिक्त सुरक्षा चाहते हैं, तो टेंपर्ड ग्लास बेहतर विकल्प माना जाता है। यह गिरने और खरोंच दोनों से बेहतर सुरक्षा देता है।
    • टीपीयू फिल्म हल्के स्क्रैच से बचाती है, जबकि पीईटी फिल्म सस्ती जरूर होती है, लेकिन सुरक्षा भी कम देती है। नैनो लिक्विड केवल अतिरिक्त कोटिंग बनाता है और यह मजबूत सुरक्षा नहीं देता है।
    • टेंपर्ड ग्लास खरीदते समय 9एच हार्डनेस, अच्छी ओलियोफोबिक कोटिंग, 99 प्रतिशत पारदर्शिता और 2.5डी, 3डी या 5डी एज डिजाइन वाला मॉडल चुनना बेहतर रहता है।

    सिर्फ स्क्रीन प्रोटेक्टर लगाना ही काफी नहीं है। मजबूत बैक कवर भी फोन की सुरक्षा में अहम भूमिका निभाता है। टीपीयू और सिलिकॉन वाले कवर झटके को बेहतर तरीके से सोख लेते हैं, जबकि हार्ड पालीकार्बोनेट कवर देखने में प्रीमियम जरूर लगते हैं, लेकिन कई बार गिरने पर ज्यादा झटका फोन तक पहुंचा देते हैं। इसलिए ऐसे कवर चुनें जिनके कार्नर मोटे और शॉक एब्जॉर्बिंग हों।

    कुल मिलाकर देखें, तो मजबूत स्मार्टफोन न केवल लंबे समय तक अच्छा चलता है, बल्कि उसकी रीसेल वैल्यू भी बेहतर रहती है। साथ ही, बार-बार रिपेयर कराने की परेशानी और अतिरिक्त खर्च से भी बच जाते हैं।

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