मुनि समत्व सागर: गूगल इंजीनियर से दिगंबर जैन मुनि बनने का प्रेरणादायक सफर, पेरेंट्स को दी सीख
पूर्व सॉफ्टवेयर इंजीनियर अंकुर जैन, अब मुनि समत्व सागर, ने लाखों के पैकेज वाली नौकरी छोड़ अध्यात्म का मार्ग चुना ...और पढ़ें

आगरा में प्रवचन करते जैन मुनि समत्व सागर महाराज।
HighLights
पूर्व गूगल इंजीनियर ने एआई छोड़ आरआई की राह चुनी।
नैतिक शिक्षा और जड़ों से जुड़ना युवाओं के लिए आवश्यक।
जागरण संवाददाता, आगरा। लाखों रुपये के पैकेज वाली कारपोरेट नौकरी, साफ्टवेयर इंजीनियर की पहचान और आधुनिक सुख-सुविधाओं से भरा जीवन। दूसरी ओर संयम, त्याग और आत्मसाधना की कठिन राह।
जबलपुर में जन्मे और ग्यारसपुर में प्रारंभिक शिक्षा पाने वाले पूर्व इंजीनियर अंकुर जैन ने जीवन की दिशा बदलते हुए अध्यात्म का मार्ग चुना। एसएटीआइ विदिशा से इलेक्ट्रानिक्स इंजीनियरिंग और बिट्स पिलानी से एमटेक करने के बाद अमेरिका में गूगल की प्रतिष्ठित नौकरी भी की।
17 जनवरी 2013 को विदिशा में आचार्य विशुद्ध सागर के सानिध्य में ब्रह्मचर्य व्रत ग्रहण करने के बाद 29 अगस्त 2015 को रक्षाबंधन के पावन अवसर पर भीलवाड़ा में श्रमणाचार्य विशुद्ध सागर से दिगंबर दीक्षा लेकर मुनि समत्व सागर बने।
वर्तमान में छीपीटोला स्थित निर्मल सेवा सदन में चातुर्मास कर रहे मुनिश्री से दैनिक जागरण ने जीवन, धर्म, युवा, परिवार, इंटरनेट संस्कृति और सामाजिक मूल्यों पर विस्तृत बातचीत की।
प्रश्न : सामान्य व्यक्ति से मुनि समत्व सागर बनने तक का सफर कैसा रहा?
उत्तर: मैंने जीवन त्यागा नहीं है। यह पलायन नहीं, सत्य को समझकर लिया गया निर्णय है। जब निर्णय अच्छे हो जाते हैं और यह समझ आने लगती है कि दुनिया एक अंधी दौड़ में भाग रही है, तब व्यक्ति को तय करना होता है कि उसे भी उसी दौड़ में भागना है या अपने लक्ष्य की ओर बढ़ना है।
मैंने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआइ) की जगह रियल लाइफ (आरआइ) चुनी। एआइ में सबकुछ था, लेकिन समझ आया कि सबकुछ होकर भी कुछ छूटा है। जैसे हिरण की नाभि में कस्तूरी होती है, फिर भी वह उसकी तलाश में दौड़ता रहता है। सत्य समझ में आया तो संयम का मार्ग चुन लिया।
प्रश्न : आत्म-परिवर्तन इतना कठिन क्यों है?
उत्तर: मनुष्य दूसरों को दोष देने में सहज है, स्वयं को देखने में नहीं। सबसे बड़ा काम है अपना चेहरा स्वयं देखना और अपने भीतर झांकना। हम शरीर को जानते हैं, आत्मा को नहीं। शरीर की फिटनेस और सुंदरता पर ध्यान है, लेकिन आत्मा को सशक्त करने का प्रयास नहीं करते।
परिवर्तन छोटे संकल्पों से शुरू होना चाहिए। प्रतिदिन तय करें कि आशक्ति में नहीं रहूंगा, निंदा नहीं करूंगा, प्रसन्न रहूंगा और बनावटी जीवन नहीं जीऊंगा। इसके बाद ही परिवर्तन आएगा।
प्रश्न : धर्म सुनने वालों की संख्या बढ़ रही है, फिर भी क्रोध, अहंकार और असहिष्णुता क्यों नहीं घट रही?
उत्तर: आज हम धर्म की वर्षा में रेनकोट पहनकर खड़े हैं। मोबाइल और रील संस्कृति ने हमारी ग्रहणशीलता कम कर दी है। प्रवचन सुनते हैं, लेकिन घर पहुंचकर फिर वही देखते हैं जो भीतर की शांति को नष्ट करता है। दवा अपना काम कर रही है, लेकिन अभक्ष्य का सेवन अधिक है।
इंटरनेट का सीमित और विवेकपूर्ण उपयोग ठीक है, अनियमित उपयोग नुकसानदायक है। बच्चों को उम्र के अनुरूप सामग्री मिले, इसके लिए समाज और सरकार दोनों को गंभीरता से सोचना होगा। कानून भी बनना ही चाहिए।
इंटरनेट की एल्गोरिदम जैन दिगंबर जैन मुनियों से जुड़े कंटेंट को नग्नता की चेतावनी देकर रोक देता है। धर्म का मार्गदर्शन रोकने के स्थान पर सही और गलत का निर्धारण कर सही को सहज रूप से उपलब्ध कराना चाहिए।
प्रश्न : जब समाज अलग-अलग विचारधाराओं में बंट रहा हो तो दूसरे मत का सम्मान कैसे करें?
उत्तर: जैन दर्शन ने अनेकांतवाद के माध्यम से सत्य के अनेक पहलुओं को स्वीकार करना सिखाया है। किसी विषय को एक ही दृष्टि से नहीं देखना चाहिए। जहां जो पहलू प्रधान हो, उसे प्रधानता दें और अन्य दृष्टियों को भी समझें।
राष्ट्रवाद, धर्म और परिवार, इन तीनों के महत्व को साथ लेकर चलना होगा। सभी परंपराओं और धर्मों के मूल्य को समझना आवश्यक है।
प्रश्न : आज जेन जी के बीच अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की सीमा को लेकर बहस है। आपकी दृष्टि में समाधान क्या है?
उत्तर: स्वतंत्रता के साथ नैतिकता आवश्यक है। आज सिर्फ सेक्स शिक्षा की नहीं, नैतिक शिक्षा की अधिक आवश्यकता है। बच्चों को धर्म और संस्कृति से जोड़ना होगा।
स्कूलों का समय ऐसा हो कि बच्चे अपनी परंपराओं और त्योहारों से दूर न हों। जेन-जी कहीं बाहर से नहीं आए, वह इसी समाज और संस्कृति का हिस्सा हैं। उन्हें भी अपनी जड़ों से जोड़ना हमारी जिम्मेदारी है।
प्रश्न : युवाओं के पास जानकारी बहुत है, लेकिन धैर्य और एकाग्रता कम होती जा रही है। क्यों?
उत्तर: जानकारी बढ़ रही है, ज्ञान कम हो रहा है। पहले छोटी-छोटी गणनाएं उंगलियों पर कर लेते थे, आज उसके लिए भी एआइ की मदद लेते हैं। हर जानकारी हर उम्र में देना उचित नहीं। कम उम्र में अनुपयुक्त जानकारी नुकसान पहुंचा सकती है। धैर्य और विवेक के लिए बच्चों को धर्म, परिवार और संस्कारों से जोड़ना होगा।
प्रश्न : इंटरनेट मीडिया की तुलना क्या आधुनिक युग का नया परिग्रह है?
उत्तर: बिल्कुल। जब हमारे पास सबकुछ होते हुए भी अपेक्षाएं बढ़ती जाती हैं, तब दुख शुरू होता है। रील की दुनिया हमें वह दिखाती है जो हमारे पास नहीं है। धर्म कहता है कि इच्छाएं जितनी बढ़ेंगी, दुख उतना बढ़ेगा। अपनी सीमाएं तय करनी होंगी। शाखाओं पर झूलने से पहले जड़ों को याद रखना होगा।
प्रश्न : बच्चों में संस्कार की जिम्मेदारी किसकी है?
उत्तर: समस्या बच्चों की नहीं, बड़ों की है। बच्चे गीली मिट्टी की तरह होते हैं। अभिभावक जैसा आचरण करेंगे, बच्चे वैसा ही सीखेंगे। खानपान से लेकर पहनावे और व्यवहार तक वह माता-पिता का अनुसरण करते हैं।
टीनएज से पहले संस्कारों की नींव अभिभावकों को ही मजबूत करनी होगी। सिर्फ बच्चों की पाठशाला नहीं, आज अभिभावकों के लिए भी पाठशाला जरूरी हो गई है।
प्रश्न : क्या हमने सफलता की परिभाषा गलत कर ली है?
उत्तर: आज धन, पद और यश देखकर व्यक्ति को सफल मान लिया जाता है। लेकिन उसके भीतर अहंकार और स्वार्थ है तो वह सफल नहीं है। चकाचौंध के पीछे भागना गलत है। बच्चों को भी रोकना होगा। उन्हें न कहना सिखाना होगा।
समझाना होगा कि कोई गलत काम करने को कहे, तो बोलें कि हमारा स्टैंडर्ड इतना ऊंचा है कि हम गलत चीज को सिर्फ प्रयोग के लिए भी स्वीकार नहीं करेंगे।
प्रश्न : अहंकार और स्वाभिमान में अंतर कैसे समझें?
उत्तर: अच्छी बातों पर दृढ़ रहना स्वाभिमान है, लेकिन दूसरों को नीचा दिखाकर स्वयं को बड़ा समझना अहंकार है। मैं की भावना जब दूसरों के सम्मान को समाप्त करने लगे, तब वह अहंकार है। हमें इसे पीछे छोड़ना होगा।
प्रश्न : व्यक्ति, परिवार और राष्ट्र को बदलने के लिए आपका एक संदेश?
उत्तर: स्वतंत्रता और स्वच्छंदता अलग हैं। आज हम स्वतंत्रता के नाम पर स्वच्छंदता की ओर बढ़ रहे हैं। सीमाएं जीवन को दिशा देती हैं। बच्चों को अंधी दौड़ में लगाने के बजाय परिवार का महत्व समझाना होगा। माता-पिता को भी बच्चों के लिए समय निकालना होगा। अंततः सबकुछ व्यक्ति के व्यक्तित्व पर निर्भर करता है।
व्यक्ति धर्म से जुड़ेगा तो व्यक्ति सुधरेगा, परिवार संभलेगा, समाज सुदृढ़ होगा और राष्ट्र भी मजबूत होगा। पत्तियों को साफ करने से वृक्ष नहीं बचता, जड़ों को सींचना पड़ता है। हमें अपने संस्कारों और धर्म की जड़ों को सींचना होगा।
