हर बच्चे की पढ़ाई पर 3,000 से 5,000 रुपये महंगा बोझ, गाजियाबाद के प्राइवेट स्कूलों ने नियमों को ताक पर रख दिया
निजी स्कूल उत्तर प्रदेश शुल्क विनियमन अधिनियम-2018 का उल्लंघन कर 7.21% की बजाय 10-15% तक फीस बढ़ा रहे हैं। अभिभावक लगातार विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं। ...और पढ़ें

निजी स्कूल उत्तर प्रदेश शुल्क विनियमन अधिनियम-2018 का उल्लंघन कर 7.21% की बजाय 10-15% तक फीस बढ़ा रहे हैं। फाइल फोटो
राहुल कुमार, साहिबाबाद। कोई भी निजी स्कूल उत्तर प्रदेश स्ववित्तपोषित स्वतंत्र विद्यालय शुल्क विनियमन अधिनियम-2018 की धारा 4(1) के नियम के अनुसार ही फीस में बढ़ोतरी कर सकता है, लेकिन बड़ी संख्या में स्कूलों ने 7.21 प्रतिशत के बजाय नियमों को ताक पर रख 10 से 15 प्रतिशत तक फीस में वृद्धि कर दी है।
अभिभावक और शिक्षा से जुड़े संगठन लगातार इसका विरोध करते हुए धरना-प्रदर्शन कर रहे हैं। बावजूद इसके जिम्मेदार अधिकारी निजी स्कूलों पर शिकंजा कसने के बजाय उनके आगे नतमस्तक दिखाई दे रहे हैं।
अधिनियम के अनुसार कोई भी स्कूल कंज्यूमर प्राइस इंडेक्स (सीपीआई) में पांच प्रतिशत जोड़कर, जितना भी होगा उससे अधिक फीस नहीं बढ़ा सकता है। इस वर्ष का सूचकांक 2.21 प्रतिशत है। यानी शैक्षणिक सत्र 2026-27 के लिए कोई भी स्कूल अधिकतम 7.21 प्रतिशत ही फीस बढ़ा सकता है।
बावजूद इसके स्कूलों ने दोगुना तक फीस बढ़ा दी है। हर वर्ष महंगी हो रही शिक्षा से अभिभावकों को बच्चे पढ़ाने मुश्किल हो रहे हैं। एक तरफ महंगी किताबों ने अभिभावकों की कमर तोड़ दी, वहीं दूसरी ओर फीस और ट्रांसपोर्ट शुल्क में बढ़ोतरी होने से पूरा बजट बिगड़ गया।
बड़े स्कूलों के साथ-साथ छोटे स्कूल भी फीस बढ़ाने में पीछे नहीं रहे। जो जिले का जितना नामी स्कूल उसने उतनी ही ज्यादा फीस में बढ़ोतरी कर अभिभावकों का बजट बिगाड़ दिया है। फीस वृद्धि को लेकर अभिभावक भी लगातार आवाज उठा रहे हैं। अभिभावक व शिक्षा के क्षेत्र में कार्य करने वाले संगठन स्कूलों के खिलाफ लगातार धरना-प्रदर्शन भी हो रहे हैं।
तीन से पांच हजार रुपये बढ़ा हर बच्चे की पढ़ाई का खर्च
स्कूल के विभिन्न स्कूलों में वृद्धि से हर बच्चे की पढ़ाई में 3000 से 5000 रुपये प्रतिमाह तक का खर्चा बढ़ गया है। वसुंधरा के राजेश जैन ने बताया कि उन्होंने अपने बेटे का दाखिला एक बड़े निजी स्कूल में नर्सरी में कराया। पिछले साल जब दाखिला कराया तो उसकी फीस 11,700 रुपये प्रतिमाह थी। अब 14,500 रुपये प्रतिमाह मांग रहे है।
स्कूलों में या निर्धारित दुकानों पर ही मिल रहीं किताब और ड्रेस
स्कूलों ने अपने हिसाब से अलग-अलग प्रकाशक और लेखकों की किताब लगवा रखी हैं। ये किताबें स्कूलों में मिल रही हैं या फिर स्कूलों द्वारा जिन्हें ठेका दिया गया है उन दुकानों पर मिल रही हैं। शिक्षा के क्षेत्र में कार्य करने वाले संगठनों का कहना है कि ये दुकानदार स्कूलों को अच्छा खासा कमीशन देते हैं। यहां तक की यूनिफार्म तक कई स्कूल खुद ही बेच रहे हैं।
जिले के 1700 स्कूलों में करीब छह लाख छात्र
जिले में सीबीएसई, आइसीएसई और यूपी बोर्ड के करीब 1700 निजी और मान्यता प्राप्त छोटे-बड़े स्कूल हैं। इनमें करीब छह लाख से अधिक बच्चे शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं। इनमें से लाखों बच्चों के अभिभावकों पर अतिरिक्त फीस का भार पड़ रहा है।
क्या है कार्रवाई का नियम
स्कूलों की मनमानी पर रोक लगाने के लिए जिला शुल्क नियामक समिति (डीएफआरसी) बनाई गई है। समिति के अध्यक्ष जिलाधिकारी हैं। डीआइओएस समेत अन्य अधिकारी सदस्य होते हैं। अभिभावकों की शिकायत सही मिलने पर समिति स्कूल पर पहली बार में एक लाख व दूसरी बार में दो लाख जुर्माना लगा सकती है।
उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा बनाए गए फीस अधिनियम 2018 के अनुसार इस वर्ष अधिकतम 7.21 प्रतिशत फीस की ही वृद्धि कर सकते हैं। इसके बाद भी निजी स्कूल नियम विरुद्ध फीस वृद्धि कर अभिभावकों को मानसिक रूप से प्रताड़ित कर रहे हैं।
-सीमा त्यागी, राष्ट्रीय अध्यक्ष, इंडियन पेरेंट्स एसोसिएशन।स्कूल मनमाने तरीके से फीस वृद्धि कर रहे हैं। इन पर कोई शिकंजा नहीं कसा जा रहा है। जबकि पालन नहीं करने पर कार्रवाई के लिए जिला शुल्क नियामक समिति भी बनी है।
-सौरभ त्यागी, अभिभावक।निजी स्कूलों को फीस में वृद्धि करते हुए उत्तर प्रदेश शुल्क अधिनियम को ध्यान में रखना होगा। नियमों का उल्लंघन कर शुल्क वृद्धि करने पर स्कूल पर पहली बार में एक लाख और दूसरी बार में दो लाख जुर्माना लगाया जाएगा।
-धर्मेंद्र शर्मा, जिला विद्यालय निरीक्षक।
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