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    पश्चिम एशिया युद्ध की आंच गाजियाबाद तक... 195 सड़कों का काम प्रभावित, अब निगम कैसे करेगा वर्क?

    Updated: Fri, 17 Apr 2026 05:26 AM (IST)

    पश्चिम एशिया युद्ध के कारण गाजियाबाद में 195 सड़कों का निर्माण प्रभावित हुआ है, क्योंकि तारकोल महंगा और दुर्लभ हो गया है। नगर निगम अब जब्त पॉलीथीन का ...और पढ़ें

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    पश्चिम एशिया युद्ध के कारण गाजियाबाद में 195 सड़कों का निर्माण प्रभावित हुआ है। इमेज एआई

    हसीन शाह, गाजियाबाद। पश्चिम एशिया युद्ध की आंच में नगर निगम और लोक निर्माण विभाग (पीडब्ल्यूडी) की 195 सड़कों का काम प्रभावित हुआ है। नगर निगम का कहना है कि तारकोल (बिटुमेन) मिलना मुश्किल हो गया है। जो मिल रहा है वह महंगा है।

    कई सड़कों पर गड्ढों की वजह से परेशानी हो रही है। नगर निगम ने जब्त की गई पालिथीन से सड़कों पर पेंच वर्क करने की योजना बना रहा है। जिससे लोगों गड्ढामुक्त सड़कें मिल सकें। हालांकि इससे अभी सड़कों को बनाना संभव नहीं है।

    नगर निगम ने 85 सड़कों पर काम कराने के लिए टेंडर जारी कर दिया है। इन सड़कों की लंबाई लगभग 112 किलोमीटर है। इनमें सड़कों को गड्ढामुक्त, चौड़ीकरण और नये सिरे से बनाने का काम शामिल है। ठेकेदारों को पता नहीं था कि युद्ध की आंच सड़कों के निर्माण कार्य पर भी आ जाएगी।

    ऐसे में युद्ध शुरू होने के दौरान भी कई ठेकेदारों ने निगम से टेंडर ले लिए थे। ऐसे में अब ठेकेदार निगम से टेंडर वापस करने की गुहार लगा रहे हैं। अधिकारियों का कहना है कि एक वर्ग मीटर सड़क बनाने में 2.41 किलोग्राम तारकोल लगता है। जबकि ग्रामीण क्षेत्र में तीन मीटर चौड़ी एक किलोमीटर लंबी सड़क सड़क बनाने में 7.25 टन तारकोल लगता है।

    ऐसे ही 5.5 मीटर चौड़ी सड़क में 15 टन तारकोल और सात मीटर चौड़ी सड़क में 19 टन तारकोल लगता है। फरवरी में युद्ध शुरू होने से पहले तारकोल लगभग 46800 रुपये प्रति मीट्रिक टन में मिल रहा था। युद्ध शुरू होने के एक सप्ताह बाद दो हजार रुपये बढ़कर लगभग 49 हजार रुपये प्रति टन हो गया था।

    तारकोल पर्याप्त मात्रा मिल भी नहीं रहा है। ऐसे में सड़कों को गड्ढामुक्त करने में भी मुश्किल आ रही है। निगम ने जब्त की गई पालिथीन से सड़क पर पेंच वर्क करने निर्णय लिया है। हालांकि निगम के पास इतनी प्लास्टिक नहीं है कि सभी सड़कों का निर्माण किया जा सके। लेकिन पेंच वर्क का काम किया जा सकता है।

    प्लास्टिक का प्रयोग करने से सड़क बनाने में तारकोल की मात्रा कम हो जाती है। युद्ध में कम तारकोल लगाना पड़ेगा। निगम के मुख्य अभियंता एनके चौधरी ने बताया कि युद्ध में तारकोल की कीमत बढ़ गई है। तारकोल पर्याप्त मात्रा में मिल नहीं रहा है। नगर निगम ने प्लास्टिक से सड़क की योजना बना रहा है। पूर्व में भी निगम ने प्लास्टिक से दो सड़कें बनाई थी।

    प्लास्टिक की सड़क से यह होगा फायदा 

    प्लास्टिक की सड़क बनाने में कचरे की पतली प्लास्टिक यानी पालीथिन व रैपर आदि को साफ करके छोटे टुकड़ों में काटा जाता है। फिर गर्म एग्रीगेट (पत्थर) पर इसे मिलाया जाता है। जिससे प्लास्टिक पिघलकर पत्थरों पर कोटिंग बना लेती है। इसके बाद इसमें तारकोल मिलाकर सड़क बनाई जाती है।

    यह सड़क ज्यादा मजबूत, टिकाऊ और पानी से कम खराब होती है। इसमें गड्ढे कम बनते हैं और रखरखाव खर्च भी घटता है। साथ ही प्लास्टिक कचरे का सही उपयोग होता है। जिससे पर्यावरण प्रदूषण कम होता है। प्लास्टिक से बनी सड़क आमतौर पर 10 साल तक आराम से चल जाती। जबकि सामान्य तारकोल की सड़क की उम्र लगभग पांच साल होती है। हालांकि सड़क पर पानी न भरे और भारी वाहन न चले तो यह सड़क इससे ज्यादा भी चल जाती है।

    नंबर गेम

    • 58,890 से 66,300 रुपये प्रति प्रति मीट्रिक टन हुई तारकोल की कीमत
    • 46800 रुपये प्रति मीट्रिक टन थी युद्ध से पहले तारकाेल की कीमत
    • 195 कुल सड़कों का काम युद्ध की वजह हो रहा प्रभावित

    युद्ध की वजह से तारकोल महंगा हुआ है। नगर निगम ने पहले भी प्लास्टिक से सड़कें बनाई है। नगर निगम ने जो भी पालिथीन जब्त की है उसका इस्तेमाल सड़क बनाने में होगा।
    - विक्रमादित्य सिंह मलिक, नगर आयुक्त।

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