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    दिया एक कंटाप... गुरु काम 35 हुइगा, पढ़ें कुछ ऐसे ही कनपुरियां Viral देसी डायलाग

    By Shiva AwasthiEdited By: Anurag Shukla
    Updated: Sun, 05 Apr 2026 03:19 PM (IST)

    कानपुर अपनी ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत के साथ-साथ अपनी अनूठी कनपुरिया भाषा के लिए भी प्रसिद्ध है। यह बोली दिल्ली-मुंबई तक छाई रही, जिससे राजू श्रीव ...और पढ़ें

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    सेंट्रल मेट्रो स्टेशन में लिखा कानपुरिया भाषा में लिखा स्लोगन। जागरण आर्काइव

    शिवा अवस्थी, कानपुर। ऐतिहासिक, सांस्कृतिक विरासतों को सहेजे, प्राचीन धरोहरों, राजनीतिक दिशा व दशा तय करने में बड़ी पहचान रखने के साथ ही देश की स्वाधीनता के लिए 1857 की क्रांति में महत्वपूर्ण योगदान देने वाला अपना कंपू भाषा के मामले में भी खूब धनी है। यहां की भाषा दिल्ली, मुंबई तक छाई रही। कई हास्य-व्यंग्य के कलाकारों को इससे मुकाम मिला।

    कभी हास्य कलाकार राजू श्रीवास्तव इसी भाषा के दम पर देश-विदेश तक लोगों को लोटपोट करते रहे। उनकी भाषा का अब भी कई हास्य कलाकार मंचों पर प्रयोग करते हैं। बीते महीने ही 24 मार्च को कानपुर का स्थापना दिवस था, तब भी कनपुरिया भाषा को लेकर यादें ताजा हो गई। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी भी कानपुर में रैली के दौरान कहा था कि दुश्मन कहीं भी हौंक दिया जाएगा। इसी तरह, कानपुर मेट्रो में भी कनपुरिया भाषा के शब्द आकर्षण का केंद्र बने हुए हैं।

    सरेआम सुनने को मिल जाती कनपुरिया बोली

    अपने कंपू के मोहल्लों पुराना कानपुर, पटकापुर, फीलखाना, कलक्टरगंज, बिरहाना रोड, नवाबगंज, रावतपुर गांव, हटिया, नयागंज, मूलगंज से घंटाघर तक जब भी कभी आप गए होंगे तो ऐसी भाषा से अवश्य रूबरू होंगे। कभी जब आटो-टेंपो वालों से बाइक या कार में टक्कर के बाद लड़ाई शुरू हुई होगी तो कनपुरिया कंटाप सरेआम हुआ होगा। कंटाप यानी कनपटी पर थप्पड़ जड़ने की बात झगड़े में अक्सर ही कही जाती है।

    जानें क्या होता है इन शब्दों का मतलब

    भइया का भौंकाल यानी जलवा या प्रतिष्ठा की बात तो रोज ही कहीं न कहीं सामने आई होगी। चौकस अर्थात बेहतरीन भी इसी भाषा का प्यारा शब्द है। बकैत यानी अधिक बोलने वाले की बातें भी आपके कानों में जरूर पड़ती ही रहती होंगी। ऐसे ही खलीफा यानी सर्वश्रेष्ठ, बकलोली-फिजूल की बातचीत, लभेड़-अप्रिय परिस्थिति, पौवा-जुगाड़ या पैठ जैसे शब्द रोज ही बोले जाते हैं। चिकाई का तात्पर्य किसी से मजाक करना तो फिर चिरांद यानी उलझन पैदा करना या करने वाले के लिए इस्तेमाल होता है। भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त कर्मचारी केशव नगर निवासी राजेंद्र अवस्थी कहते हैं कि कानपुर की भाषा-बोली में मिठास है और अपने तरह का अलग अंदाज है। इसीलिए मुंबई-दिल्ली से लेकर विदेश तक यहां की भाषा के लोग कायल हैं।

    हर दिन जुबां पर रहते ये बोल

    विधिवत मारेंगे और कौनौ मुरौवत न करेंगे, ज्यादा बकैती न करो, अबहिं मार मार के हनुमान बना देबे, टोपा हौ का, दीहिस कंटाप, हपक के एक कंटाप धरा तो सारी रंगबाजी धरी रहि जई, ये मठाधीसी अपने पास ही धरो, भाई जी, अगले का भौकाल एकदम टाइट है, अबहीं झपड़िया दीन्ह जइहौ तब पता चली कि पंजीरी कहां बटत रहे, अरे सरऊ काहे पचड़े में पड़त हौ अबहिं लभेड़ हुई जइहै, कुछ पल्ले पड़ रहा है कि ऐसे ही औरंगजेब बने हो, ज्यादा बड़ी अम्मा न बनौ, गुरु व्यवस्था तो फुल टन्न रही, हर जगह चिकाई न लिया करो, मार कंटाप शंट कर देंगे जैसे शब्दों से भी आपका पाला पड़ा ही होगा।

    इनको भी देखिए

    पूरा होना : हुई गा, पूरा न होना : नाई भा, क्यों : काहे, यहां आओ : हियां आव, पिटाई करना : हउंक दीहिस, काम पूरा होना : गुरु काम 35 होइगा.., सुनो जरा : सुनो बे, क्या हुआ : का हुआ बे, जबरदस्त : धांसू

    दरवाजन ते हटि कै ठाड़ होएओ...

    दिवंगत राजू श्रीवास्तव की एक हास्य की चुटकी देखिए, जब वह मेट्रो ट्रेन के स्टेशन पर आने का अनाउंसमेंट करते हैं। इससे हंस-हंस कर लोग पेट पकड़ लेते थे। वह कहते हैं- "भईया हाथ जोड़ि कै बिनती है कि दरवाजन ते हटि कै ठाड़ होएओ, नहीं तौ कूचे जइहौ, पीली लाइन के पिछेहे ठाड़ रहेओ, गाड़ी केर पहिलै डिब्बा मेहेरियन खातिर है, ओके भीतर जउन चढ़ी ओका कायदे मां हउंका जाई और जुर्मानौ कीन जाई, दरवज्जा दाईं तरफ खुलत है। ओके ऊपर हाथ धरि कै न ठाड़ होएओ सरऊ, गाड़ी मां मसाला, चाय, बीड़ी, पान सब बर्जित हैं। कउनौ यो सब खात मिला तो वहिका पेल दीन जाई।' इसके आगे वो कहते हैं-' आगे आवै वाला सटेसन कानपुर सेंट्रल है, हिंयां ते उत्तर प्रदेश बस सेवा के सिटी सटेसन खातिर उतर लीन्हेओ और सरऊ कायदे मां उतरेओ नाहीं तौ आगे बड़े-बड़े गड़हा हैं, घुसमुड़ा जहिऔ ओहमां। बुजुर्ग चच्चा लोगन और मेहेरियन खातिर चुप्पे ते जगह दई दीन्हेओ वरना लपेटे मां आ जहियओ, गाड़ी मां च्वारन ते सावधान रहेओ। ससुर बहुत बढ़िगे हैं।