यूपी में भी बिहार का फॉर्मूला दोहराएंगे विनोद तावड़े? 2027 में हैट्रिक लगाने को सरकार का मास्टरप्लान
क्या विनोद तावड़े बिहार की सफल चुनावी रणनीति को उत्तर प्रदेश में दोहरा पाएंगे, जहां उन्होंने संगठन और सामाजिक समीकरणों को साधा था।

विनोद तावड़े।

समय कम है?
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डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली/लखनऊ। Vinod Tawde | उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव के लिए भारतीय जनता पार्टी द्वारा राष्ट्रीय महासचिव विनोद तावड़े को राज्य का नया चुनाव प्रभारी नियुक्त किए जाने के बाद यह सवाल बेहद अहम हो गया है कि क्या यूपी में बिहार का फॉर्मूला दोहरा पाएंगे विनोद तावड़े?
गौरतलब है कि बिहार चुनावों में NDA के चुनावी प्रबंधन और तालमेल में उनकी निभाई गई सफल भूमिका को देखते हुए माना जा रहा है कि बीजेपी यूपी में भी उसी रणनीतिक फॉर्मूले को लागू कर सकती है।
साल भर से यूपी को मथ रहे राष्ट्रीय महामंत्री विनोद तावड़े भाजपाई रणनीति में बड़े बदलाव के सूत्रधार बन सकते हैं। प्रदेश इकाई में दो तिहाई चेहरे व सभी छह क्षेत्रीय अध्यक्षों को बदलकर इसका संकेत भी दे चुके हैं। चर्चा है कि हरियाणा व बिहार में प्रभारी के रूप में सफल पारी खेलने वाले तावड़े यूपी में दो सौ टिकट बदलने की रणनीति को जमीन पर उतारने की कसरत में जुटेंगे।
पार्टी जानती है कि जनप्रतिनिधियों के प्रति जनता में नाराजगी बढ़ी है, जिसका असर चुनाव पर पड़ सकता है। वहीं, गुजरात के रहने वाले राष्ट्रीय मंत्री जगदीश ईश्वर भाई पटेल सह-प्रभारी के रूप में पार्टी की रणनीति को नई धार देंगे। माना जा रहा है कि दोनों चेहरे 2027 विधानसभा चुनाव में गुजरात की तर्ज पर बड़े प्रयोग करेंगे।
पहले से बन गई थी रणनीति
राज्यसभा सदस्य विनोद तावड़े ने योगी सरकार के मंत्रिमंडल विस्तार से पहले 12 और 13 अप्रैल को लखनऊ में रुककर मंत्रियों, विधायकों व संगठन के पदाधिकारियों से मुलाकात की थी। बाद में वह मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से भी मिलकर दिल्ली गए।
10 मई को मंत्रिमंडल विस्तार में कृष्णा पासवान, हंसराज विश्वकर्मा, कैलाश राजपूत और सुरेंद्र दिलेर जैसे नए चेहरों को शामिल करने का धरातल बनाया। इसके बाद प्रदेश इकाई के गठन को लेकर दिल्ली में राष्ट्रीय व प्रदेश नेतृत्व के साथ तावड़े भी बैठे, जिससे साफ संदेश उभरा कि वह उत्तर प्रदेश के अगले प्रभारी हो सकते हैं।
विनोद तावड़े की राजनीतिक खासियत, रणनीति और सियासी व्यवहार पर एक न...
बिहार में गठबंधन सहयोगियों के साथ बनाया कुशल समन्वय
प्रभारी के रूप में विनोद तावड़े बिहार भाजपा के लिए शुभंकर साबित हुए। राज्य में भाजपा निरंतर बढ़ रही है, लेकिन उसे जब सरकार बनाने का अवसर मिला, संयोग से तावड़े ही भाजपा के प्रभारी थे। वे सितंबर, 2022 में प्रभारी बनकर गए। भाजपा के लिए वह प्रतिकूल समय था।
एक महीने पहले अगस्त में एनडीए की सरकार का अवसान हो गया था। नीतीश कुमार एनडीए से अलग होकर महागठबंधन की साझेदारी में मुख्यमंत्री बन गए थे। भाजपा की अगली चिंता 2024 के लोकसभा चुनाव को लेकर थी।
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केंद्र और राज्य नेतृत्व ने अगली चुनौतियों से निपटने की जो रणनीति बनाई, उसमें तावड़े की भी भूमिका थी। उनके साथ बिहार में काम करने वाले लोगों का अनुभव यह है कि तावड़े छोटे से छोटे कार्यकर्ताओं से मिलने और उनसे विमर्श करने में संकोच नहीं करते हैं। उनकी राय को नोट भी करते हैं।
संगठन और सरकार के बीच बेहतर तालमेल
जब लोकसभा चुनाव में बिहार विधानसभा की 243 में से 175 सीटों पर एनडीए के घटक दलों को बढ़त मिली तो उन्होंने बढ़त वाली सीटों पर अधिक मेहनत की रणनीति बनाई। जीतने वाले उम्मीदवारों की खोज शुरू हो गई। 2025 का विधानसभा चुनाव एनडीए के पक्ष में आया। 202 विधानसभा सीटों पर उसकी जीत हुई। इसी चुनाव में 89 सीट लेकर भाजपा बिहार विधानसभा में पहली बार सबसे बड़ी पार्टी बनी।
सामाजिक और जातीय संतुलन में तावड़े को महारथ हासिल
बिहार में अपनी कुशल कार्यशैली से जातीय समीकरणों को साधकर प्रचंड जीत दिलाने वाले तावड़े की सबसे बड़ी खूबी विभिन्न वर्गों के स्थानीय नेताओं के बीच गुटबाजी खत्म कर संवाद स्थापित करना मानी जाती है।
उत्तर प्रदेश में जहां समाजवादी पार्टी 'पीडीए' (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक व पंडित) के जरिए सामाजिक गोलबंदी में जुटी है, वहीं तावड़े की मुख्य चुनौती भाजपा के परंपरागत सवर्ण वोट बैंक (विशेषकर ब्राह्मणों) को एकजुट रखने के साथ-साथ गैर-यादव अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) और अति-दलित समुदायों को पार्टी से जोड़े रखना होगी।

माइक्रो-लेवल बूथ मैनेजमेंट से साधेंगे धार
इसके अलावा, अपना दल (एस), निषाद पार्टी, रालोद और सुभासपा जैसे एनडीए के सहयोगी दलों के साथ सटीक सीट बंटवारा और बूथ स्तर तक सूक्ष्म माइक्रो-मैनेजमेंट के जरिए वे यूपी में बिहार जैसी सामाजिक इंजीनियरिंग को दोहराने का प्रयास करेंगे, माना जा रहा है कि बिहार की तर्ज पर ही उत्तर प्रदेश में भी पन्ना प्रमुखों को सक्रिय करने, मतदाता सूचियों के सत्यापन और कैडर को चुनावी मोड में लाने पर विनोद तावड़े का विशेष फोकस रहेगा।
तावड़े की सफल संगठनात्मक यात्रा
तावड़े की संगठनात्मक यात्रा काफी सफल रही है। वह 2020 में हरियाणा के प्रभारी बनाए गए। 2022 में बिहार का प्रभार संभाला, जहां 2024 लोकसभा चुनाव में पार्टी का प्रदर्शन अन्य राज्यों से बेहतर रहा।
2025 में एक बार फिर तावड़े के नेतृत्व में बिहार में बीजेपी और जदयू की सरकार बनी। पड़ोसी राज्यों हरियाणा एवं बिहार का जातीय गणित समझने का फायदा तावड़े को यूपी में भी मिलेगा।
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कौन हैं विनोद तावड़े?
विनोद तावड़े का जन्म 20 जुलाई 1964 मुंबई के गिरगांव इलाके में एक मराठी परिवार में हुआ था। विनोद तावड़े ने पार्ले कॉलेज से अपनी पढ़ाई पूरी है। विनोद तावड़े त्रिपुरा और राजस्थान में मुख्यमंत्री चुनाव के पर्यवेक्षक के रूप में भी काम कर चुके हैं। 2026 केरल चुनाव में उनको प्रभारी बनाया गया।
विनोद तावड़े का सियासी सफर
विनोद तावड़े फिलहाल भाजपा के राष्ट्रीय महामंत्री हैं। वो बाल स्वयं सेवक भी रहे हैं। कुशल संगठनकर्ता के साथ कुशल प्रशासक भी माने जाते हैं। साल 1995 में उन्हें पहली बार बीजेपी की तरफ से महाराष्ट्र महासचिव बनाया गया था। उनके सांगठनिक क्षमता को देखते हुए नेतृत्व ने उन्हें 2002 में ये जिम्मेदारी फिर से सौंपी।

तावड़े का सियासी सफर आगे बढ़ता गया और 1999 में उन्हें मुंबई महानगर इकाई के अध्यक्ष पद की जिम्मेदारी बीजेपी ने दी। बताया जाता है कि इस पद के लिए चुने गए सबसे कम उम्र के उम्मीदवार होने का रिकॉर्ड उनके नाम है।
2014 में चुने गए पहली बार विधायक
विनोद तावड़े अपनी काबिलियत के बल पर सियासी सिढ़ी चढ़ते गए और 2014 के महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में पार्टी ने उन्हें बोरीवली विधानसभा से प्रत्याशी बनाया। तावड़े ने जीत दर्ज की और महाराष्ट्र विधानसभा के सदस्य बने।
देवेन्द्र फडणवीस की सरकार में उन्हें शिक्षा विभाग समेत उच्च और तकनीकी शिक्षा, चिकित्सा शिक्षा, मराठी भाषा और सांस्कृतिक मामलों का मंत्री बनाया गया।
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