15 अगस्त 1947 और बांकेबिहारी का अनोखा नाता... ₹100 करोड़ के सोने-चांदी के हिंडोले की पूरी कहानी!
Banke Bihari Gold Silver Jhula: बांकेबिहारी मंदिर में हरियाली तीज और 15 अगस्त 1947 का अनूठा संयोग है, जब स्वतंत्रता दिवस पर ठाकुरजी को स्वर्ण-रजत हिंडोला मिला था। यह हिंडोला 25 लाख में बना था और अब इसकी कीमत 100 करोड़ है, जिसमें ठाकुरजी भक्तों को दर्शन देते हैं।

हरियाली तीज पर ठाकुरजी सोने-चांदी के झूले में विराजे।
HighLights
15 अगस्त 1947 को मिला था स्वर्ण-रजत हिंडोला
सेठ हरगुलाल बेरीवाला ने बनवाया था यह दिव्य झूला
आज इसकी कीमत करीब सौ करोड़ रुपये आंकी जाती है
अभिषेक सक्सेना, आगरा। Banke Bihari Hariyali Teej connection बांकेबिहारी मंदिर की अनूठी छटा है। ब्रज में ठाकुरजी की पूजा बाल गोपाल के रूप में की जाती है। देश भर के करोड़ों भक्तों की आस्था का केंद्र ठाकुर बांकेबिहारी मंदिर की हरियाली तीज और 15 अगस्त का एक अनूठा संयोग है। अंग्रेजी शासन से मुक्ति पाकर हिंदुस्तान जब आजादी के पहले दिन आजादी की हवा का अहसास कर रहा था ठीक इसी दिन एक और बड़ा बदलाव वृंदावन में भी देखने को मिला था।
आज से करीब पांच सौ वर्ष पहले से कुंज-लताओं में हिंडोला में विराजित होकर हरियाली तीज पर झूलने वाले ठाकुर बांकेबिहारीजी को नया दिव्य व कलात्मक स्वर्ण-रजत हिंडोला मिला था।
इसी दिन पड़ी हरियाली तीज पर पहली बार ठाकुर बांकेबिहारीजी भी सोने-चांदी के झूले (हिंडोले) में विराजे थे और आज भी इसी दिव्य और भव्य कलात्मक स्वर्ण-रजत हिंडोला में ठाकुर जी विराजते हैं।
15 अगस्त और हरियाली तीज का एक अजब संयोग
15 अगस्त 1947 के दिन ही वृंदावन के ठाकुर बांकेबिहारी मंदिर व बरसाना के लाडलीजी मंदिर में सावन मास में भगवान को झुलाने के लिए सोने-चांदी के झूले (हिंडोले) मंदिर को समर्पित किए गए थे। यह एक संयोग है कि 15 अगस्त के दिन जब सभी देशवासी स्वतंत्रता दिवस मना रहे थे, बांकेबिहारी भी उस दिन सोने व चांदी से बने अनुपम हिंडोला में झूल रहे थे। कोलकाता निवासी ठाकुरजी के भक्त सेठ हरगुलाल बेरीवाला ने ये स्वर्ण-रजत हिंडोला वाराणसी के कारीगरों से बनवाया था।

हरियाली तीज पर ठाकुर बांकेबिहारीजी।
पहले लता-पताओं का था झूला
ठाकुर बांकेबिहारी के प्राकट्यकर्ता स्वामी हरिदासजी अपने लाड़ले ठाकुरजी की भावरूप में सेवा करते थे। ठाकुरजी के हिंडोला उत्सव की शुरुआत उनके प्राकट्यकर्ता संगीत सम्राट स्वामी हरिदास ने साढ़े पांच सौ वर्ष पहले निधिवन राज मंदिर में की थी। ठाकुरजी को लता-पताओं से बने हिंडोला में बैठाकर स्वामी हरिदास लाड़-लड़ाते थे। इसी परंपरा का निर्वहन उनके सेवायतों ने जारी रखा।
नेपाल के टनकपुर के जंगल से आई थी लकड़ियां
लगभग 79 वर्ष पहले जब देश अंग्रेजी शासन से मुक्त हुआ और लाल किले की प्राचीर पर तिरंगा फहराया गया। मंदिर के करीब 164 साल के इतिहास में शुरूआती दौर में साधारण हिंडोले में ठाकुरजी भक्तों को दर्शन देते थे। लेकिन बांकेबिहारी के भक्त सेठ हरगुलाल बेरीवाला ने परिवार के सहयोगियों संग ठाकुरजी का दिव्य स्वर्ण-रजत हिंडोला तैयार करवाया गया। नेपाल के टनकपुर के जंगल से लकड़ियों का इंतजाम करवाया और इसके ऊपर सोने और चांदी की परत से नक्कासी करवाई। जो अद्भुत है।
तब 25 लाख में हुआ तैयार, आज सौ करोड़ पहुंची कीमत
करीब 125 अलग-अलग भागों में तैयार हिंडोला नक्काशी कला का बेजोड़ प्रमाण है। हिंडोला तैयार करने के लिए करीब 25 लाख रुपये खर्च हुए थे, जिसकी वर्तमान कीमत करीब सौ करोड़ रुपये आंकी जाती है। उस जमाने में सोने-चांदी के हिंडोले बनवाने में 20 किलो सोना व करीब एक कुंतल चांदी प्रयोग की गई थी और हिंडोलों के निर्माण में 25 लाख रुपए की लागत आई थी। हिंडोले 1942 से बनना शुरू हुआ और 1947 में तैयार हुआ। पहले ये हिंडोला केवल शाम को सजाया जाता था। लेकिन, वर्ष 2015-16 में प्रयागराज उच्च न्यायालय के आदेश पर सुबह से शाम तक ठाकुरजी स्वर्ण-रजत हिंडोला में भक्तों को दर्शन देते हैं।
इन मंदिरों में 15 दिन झूला में दर्शन
हरियाली तीज पर राधावल्लभ, राधारमण, राधादामोदर, राधाश्यामसुंदर, गोविंददेव, गोपीनाथ, मदनमोहन, गोकुलानंद, सनेहबिहारी मंदिर, वृंदावनचंद्र मंदिर समेत शहर के हर मंदिर और आश्रम में हिंडोला उत्सव शुरू होगा। ठाकुरजी पंद्रह दिन तक हिंडोले में विराजमान होकर भक्तों को दर्शन देंगे।
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इस बार पहनी खास ड्रेस
इस बार ठाकुरजी की हरे रंग की पोशाक तैयार की है, जिसका बॉर्डर लाल रंग का रखा है। यह पोशाक बांकेबिहारीजी के ही सेवायत ने भक्त के जरिए दिल्ली के ड्रेस डिजाइनर रतिराम रामविनोद से तैयार कराई है। इसकी कीमत लगभग दो लाख रुपये है। इस पोशाक को धारण कर जब ठाकुरजी ने भक्तों को स्वर्ण-रजत हिंडोला में दर्शन दिए तो भक्त टकटकी लगाए देखते रह गए। ठाकुरजी के चारों ओर ललिता, विशाखा, रंगदेवी और चित्रलेखा सखी चंवर झूलेंगी। स्वर्ण-रजत हिंडोला के साथ ये चारों सखियां भी चांदी से निर्मित कराई गई थीं।

