ब्रज की सदियों पुरानी सांस्कृतिक परंपरा: पितृपक्ष में फूलों और रंगों से सजेगी सांझी कला, राधा-कृष्ण की प्रेमलीला होगी साकार
पितृपक्ष के दौरान वृंदावन के मंदिरों में सदियों पुरानी सांझी कला फूलों और रंगों से सजेगी, जो राधा-कृष्ण की प्रेमलीला ...और पढ़ें

पितृपक्ष में फूलों और रंगों से सजेगी सांझी कला।
HighLights
पितृपक्ष में वृंदावन के मंदिरों में सजेगी फूलों की सांझी।
राधा-कृष्ण की प्रेमलीला को दर्शाती है यह प्राचीन कला।
ब्रज की सांस्कृतिक विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा है सांझी।
संवाद सहयोगी, जागरण, वृंदावन। पितरों के स्मरण के लिए समर्पित पितृपक्ष में वृंदावन के मंदिरों में भक्ति के साथ कला और उत्सव के रंग भी बिखरेंगे। मंदिरों के आंगन एक बार फिर फूलों की खुशबू और रंगों से सजी सांझी के मनोहारी स्वरूप के साक्षी बनेंगे। देश-दुनिया से आने वाले श्रद्धालुओं के लिए यह केवल कलात्मक आकर्षण नहीं, बल्कि ब्रज की उस प्राचीन परंपरा के दर्शन का अवसर होगा, जिसमें राधा-कृष्ण की प्रेमलीला रंगों और फूलों के माध्यम से आकार लेती है।
पितृपक्ष में ब्रज के मंदिरों में सांझी सजाने की परंपरा सदियों पुरानी है। मान्यता है कि द्वापर में जब श्रीकृष्ण गोचारण से लौटते थे, तब श्रीराधा अपनी सखी परिकर के साथ मार्ग में तरह-तरह के फूलों से सांझी सजाती थीं।
इसे देखकर कृष्ण और ग्वालबाल आनंदित होते थे। कालांतर में यही परंपरा मंदिरों की सेवा-पद्धति और ब्रज संस्कृति का हिस्सा बन गई।
फूल, रंग और जल से बनती है अद्भुत सांझी
मंदिरों में सांझी को तैयार करना आसान नहीं होता। फूलों के साथ विभिन्न रंगों और जल के ऊपर तथा नीचे कलात्मक आकृतियां बनाई जाती हैं। महीन काम और कल्पनाशीलता से तैयार सांझी जब आकार लेती है, तो श्रद्धालु देर तक उसे निहारते रह जाते हैं। पितृपक्ष के दौरान राधावल्लभ मंदिर, भट्टजी की हवेली, राधारमण मंदिर, शाहजहांपुर मंदिर और यशोदानंद मंदिर में सांझी कला का आकर्षण देखने को मिलेगा।
समय के साथ यह परंपरा कई स्थानों पर मंदिरों तक सीमित होती गई, लेकिन संस्कृति के संवाहकों और कुछ परिवारों ने इसे सहेजने का प्रयास जारी रखा। अब सांझी को मंदिरों से बाहर निकालकर कुंज-निकुंजों तक विस्तार देने की पहल भी हो रही है।
राजे-रजवाड़े भी थे सांझी कला के मुरीद
सांझी की कला ने राजघरानों को भी प्रभावित किया। दतिया के राजा राव परीक्षित सिंह देव जू ने वृंदावन निवासी हित परमानंद से सांझी की कोठी तैयार करवाई थी। इसकी सांझी पोथी आज भी दतिया एस्टेट की राजकीय लाइब्रेरी में संरक्षित बताई जाती है। किशनगढ़ के राजा सावंत सिंह स्वयं सांझी के पदों की रचना किया करते थे। ब्रज के ग्रामीण अंचल में कभी युवतियां गोबर से सांझी बनाया करती थीं। यह लोक परंपरा गांवों में सांझी को घर-घर तक पहुंचाती थी, लेकिन आधुनिकता और बदलती जीवनशैली के कारण गोबर की सांझी बनाने की परंपरा अब लगभग समाप्त हो चुकी है।
सांझी केवल कला नहीं ब्रज के साहित्य, संगीत और संस्कृति का अभिन्न हिस्सा रही है। मुद्रण तकनीक के आने से पहले ही सांझी से जुड़े पद और साहित्य हस्तलिखित ग्रंथों के माध्यम से देश के विभिन्न हिस्सों तक पहुंच चुके थे। बुंदेलखंड और राजस्थान के हस्तलिखित ग्रंथागारों में आज भी सांझी साहित्य मौजूद है।
