'बीमा का पैसा पर्सनल प्रॉपर्टी नहीं', पति के लोन वसूली पर इलाहाबाद हाई कोर्ट की SBI को फटकार
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने भारतीय स्टेट बैंक को एक महिला के बचत खाते से उसके दिवंगत पति के पर्सनल लोन ...और पढ़ें

प्रतीकात्मक तस्वीर।
HighLights
SBI ने विधवा के खाते से पति के लोन की वसूली की।
हाई कोर्ट ने बीमा राशि को निजी संपत्ति नहीं माना।
बैंक को रकम लौटाने या कारण बताने का आदेश दिया।
जागरण संवाददाता, प्रयागराज। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने महिला के खाते से उसके दिवंगत पति के पर्सनल लोन की वसूली के लिए 17.29 लाख रुपये काटने पर भारतीय स्टेट बैंक को कड़ी फटकार लगाई है। कहा है कि जीवन या दुर्घटना बीमा की रकम बीमित व्यक्ति की मृत्यु के बाद देय होती है, वह कभी भी उसकी अपनी संपत्ति नहीं हो सकती।
यह उसकी जायदाद नहीं है जो वारिसों को मिले, बल्कि लाभार्थी यानी पीछे छूटे परिवार की सामाजिक सुरक्षा है। बीमित (मृतक) के जीते जी उसके स्वामित्व वाली संपत्तियों की बात प्रविधान में है, बीमा लाभ की नहीं। इसलिए बैंक का यह कृत्य प्रथम दृष्टया अधिकार क्षेत्र से बाहर है।
इस टिप्पणी के साथ न्यायमूर्ति जेजे मुनीर और न्यायमूर्ति इंद्रजीत शुक्ला की खंडपीठ ने बैंक को अंतरिम आदेश दिया है कि वह याची प्रीति सिंह के बचत खाते में पूरी रकम वापस करे अथवा दो सप्ताह में हलफनामा दाखिल कर कारण बताए कि इस आदेश को अंतिम क्यों न किया जाए। याची के पति अंबेश कुमार सिंह प्राथमिक विद्यालय बालिपुर चायल कौशांबी में प्रधानाध्यापक थे।
उन्होंने सात फरवरी 2025 को एसबीआइ की कर्नलगंज शाखा से पर्सनल लोन लिया था। सात जून 2025 को सड़क हादसे में उनकी मृत्यु हो गई। पति की मृत्यु के बाद याची को जीवन बीमा के 50 लाख रुपये उसके एसबीआई कर्नलगंज शाखा के बचत खाता में प्राप्त हुए। बैंक ने अपने बकाये की वसूली के लिए 30 दिसंबर 2025 के आदेश के अनुपालन में याची के उसी खाते से 17,29,999 रुपये काट लिए।
याची के अधिवक्ता ने तर्क दिया कि वह न तो कर्जदार थी और न ही गारंटर, इसलिए उसके खाते से कटौती अवैध है। शाखा प्रबंधक ने कोर्ट में व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होकर लोन एग्रीमेंट का हवाला दिया, जिसमें बैंक को कर्जदार की सभी जमा, संपत्ति और खातों पर सर्वोपरि लियन (संपत्ति का ग्रहणाधिकार) और सेट-आफ (जमा राशि से कर्ज वसूलना) का अधिकार दिया गया है।
बैंक के अधिवक्ता सतीश चतुर्वेदी ने कहा कि इसी प्रविधान के तहत बीमा की रकम से वसूली की गई है। खंडपीठ ने एग्रीमेंट के प्रविधान पढ़ने के बाद कहा कि यह बहुत व्यापक जरूर है, लेकिन प्रथम दृष्टया यह बैंक को बीमा की रकम से वसूली का हक नहीं देता। कोर्ट ने याचिका स्वीकार करते हुए केंद्र सरकार और बैंक से दो सप्ताह में जवाब मांगा है। मामले में अगली सुनवाई सात अक्टूबर 2026 को होगी।
