कौन बन सकता है महामंडलेश्वर? नियम-योग्यता और किन चीजों की रहती है पाबंदी? पूरी डिटेल
Mahamandaleshwar Selection Process | सनातन परंपरा में महामंडलेश्वर का पद अत्यंत प्रतिष्ठित है, जिसके लिए कठोर धार्मिक नियमों, शास्त्रों के गहन ज्ञान और त्याग की परीक्षा से गुजरना पड़ता है।


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डिजिटल डेस्क, प्रयागराज। Mahamandaleshwar Akhara Rules | अखाड़ों में महामंडलेश्वर का पद सनातन परंपरा में सर्वोच्च और अत्यंत प्रतिष्ठित माना जाता है, लेकिन इस गरिमामयी पद तक पहुंचना आसान नहीं होता।
इसके लिए कड़े धार्मिक नियमों, शास्त्रों के गहन ज्ञान, निस्वार्थ सेवा और त्याग की कठोर परीक्षा से गुजरना पड़ता है। अखाड़ों द्वारा निर्धारित कड़े अनुशासन का पालन करना हर महामंडलेश्वर के लिए अनिवार्य होता है।
मर्यादा और परंपराओं का उल्लंघन करने पर अखाड़े से निष्कासन जैसी सख्त कार्रवाई की जाती है। आईये, जानते हैं महामंडलेश्वर बनने का नियम क्या है और क्या योग्यता होनी चाहिए?
(Mahamandaleshwar Selection Process) अखाड़ों में महामंडलेश्वर का पद वैभव व प्रभावशाली होता है। छत्र-चंवर लगाकर चांदी के सिंहासन पर आसीन होकर महामंडलेश्वर की सवारी निकलती है।
महामंडलेश्वर का जीवन त्याग से परिपूर्ण होता है। यह पदवी पाने के लिए पांच स्तरीय जांच, ज्ञान-वैराग्य की परीक्षा में खरा उतरना पड़ता है। पदवी मिलने के बाद तमाम प्रतिबंध से जीवनभर बंधकर रहना पड़ता है। उसकी अनदेखी करने पर अखाड़े से निष्कासित हो जाते हैं।
थानापति के जरिए कराई जाती है पड़ताल
अखाड़ों से कोई व्यक्ति संन्यास अथवा महामंडलेश्वर की उपाधि के लिए संपर्क करता है तो उसे अपना नाम, पता, शैक्षिक योग्यता, सगे-संबंधियों का ब्योरा और नौकरी-व्यवसाय की जानकारी देनी होती है। अखाड़े के थानापति के जरिए उसकी पड़ताल कराई जाती है।
थानापति की रिपोर्ट मिलने पर अखाड़े के सचिव व पंच अलग-अलग जांच करते हैं। कुछ लोग संबंधित व्यक्ति के घर जाकर परिवारीजनों व रिश्तेदारों से संपर्क करके सच्चाई का पता करते हैं। जहां से शिक्षा ग्रहण किए होते हैं उस स्कूल-कालेज भी संतों की टीम जाती है।

स्थानीय थाना से जानकारी मांगी जाती है कि कोई आपराधिक संलिप्तता तो नहीं है। इसकी जांच पुलिस से कराई जाती है। समस्त रिपोर्ट अखाड़े के सभापति को दी जाती है। वह अपने स्तर से जांच करवाते हैं। फिर अखाड़े के पंच उनके ज्ञान की परीक्षा लेते हैं। उसमें खरा उतरने पर महामंडलेश्वर की उपाधि देने का निर्णय होता है।
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महामंडलेश्वर बनने के लिए क्या होनी चाहिए योग्यता
महामंडलेश्वर का पद जिम्मेदारी वाला होता है। इसके लिए शास्त्री, आचार्य होना जरूरी है, जिसने वेदांग की शिक्षा हासिल कर रखी हो, अगर ऐसी डिग्री न हो तो व्यक्ति कथावाचक हो, उसके वहां मठ होना आवश्यक है। मठ में जनकल्याण के लिए सुविधाओं का अवलोकन किया जाता है।
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देखा जाता है कि वहां पर सनातन धर्मावलंबियों के लिए विद्यालय, मंदिर, गोशाला आदि का संचालन कर रहे हैं अथवा नहीं? अगर अपेक्षा के अनुरूप काम होता है तो पदवी मिल जाती है।
वहीं, तमाम डॉक्टर, पुलिस-प्रशासन के अधिकारी, इंजीनियर, वैज्ञानिक, अधिवक्ता व राजनेता भी सामाजिक जीवन से मोहभंग होने पर संन्यास लेते हैं। ऐसे लोगों को अखाड़े महामंडलेश्वर बनाते हैं। इनके लिए संन्यास में उम्र की छूट रहती है। वह दो-तीन वर्ष तक संन्यास लिए रहते हैं तब भी महामंडलेश्वर बनाए जाते हैं।
अखाड़े को समर्पित करना पड़ता है जीवन
महामंडलेश्वर बनने वाले व्यक्ति का न्यूनतम पांच वर्ष संन्यासी जीवन होना चाहिए। अखाड़े की ओर से उन्हें विधि-विधान से संन्यास दिलाया जाता है। संन्यास लेने पर उन्हें स्वयं का पिंडदान करना पड़ता है। मुंडन करके उनकी शिखा (चोटी) रखी जाती है। जब वह अखाड़े में जाते हैं वह शिखा काट दी जाती है। इसके जरिए संदेश दिया जाता है कि अखाड़े में वह कुछ लेकर नहीं आए।
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महामंडलेश्वरों के जीवनभर रहती है यह पाबंदी
- घर-परिवार के लोगों से दूरी रखनी पड़ती है। अगर संपर्क सामने आता है तो अखाड़े से निष्कासित हो जाते हैं।
- चारित्रिक दोष नहीं लगना चाहिए।
- आपराधिक छवि के व्यक्ति से संबंध नहीं होना चाहिए।
- भोग-विलासिता युक्त जीवन नहीं होना चाहिए।
- किसी व्यक्ति की जमीन अथवा दूसरी संपत्ति पर कब्जा करने का आरोप नहीं लगना चाहिए।
- मांस-मदिरा के सेवन से दूर रहना होगा।
खान-पान और जीवनशैली के कड़े नियम
उनके भोजन, विचारों और दिनचर्या में पूर्ण सात्विकता अनिवार्य है। वे किसी भी परिस्थिति में तामसिक भोजन या अभक्ष्य पदार्थों का सेवन नहीं कर सकते।
भले ही वे अपने आश्रमों का संचालन करते हों, लेकिन वे व्यक्तिगत रूप से सुख-सुविधाओं और धन-दौलत के प्रति आसक्ति (attachment) नहीं रख सकते। सारा धन और संपत्ति अखाड़े या ट्रस्ट की मानी जाती है।
