चमोली टनल हादसा: THDC की रिपोर्ट में दर्ज थे चट्टानों की कमजोरी और पानी होने के संकेत, सुरक्षा व्यवस्था पर उठे सवाल
विष्णुगाड-पीपलकोटी जल विद्युत परियोजना की सुरंग में हुए हादसे से पहले ही टीएचडीसी की रिपोर्ट में कमजोर चट्टानों, दरारों और पानी की मौजूदगी के संकेत थे। 13 अगस्त को हुए इस हादसे ने परियोजना की भूगर्भीय सुरक्षा और राहत-बचाव व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
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टीएचडीसी की रिपोर्ट में दर्ज थे चट्टानों की कमजोरी व पानी होने के संकेत।
HighLights
टीएचडीसी रिपोर्ट में सुरंग में कमजोर चट्टानें दर्ज थीं।
पानी की मौजूदगी और भूगर्भीय दरारें भी पहले से ज्ञात थीं।
हादसे ने परियोजना की सुरक्षा व्यवस्था पर सवाल उठाए।
सुमन सेमवाल, देहरादून। विष्णुगाड-पीपलकोटी जल विद्युत परियोजना की निर्माणाधीन सुरंग में 13 अगस्त को हुए हादसे ने सिर्फ राहत-बचाव व्यवस्था ही नहीं, बल्कि परियोजना की भूगर्भीय सुरक्षा पर भी गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
हादसे के बाद सामने आई टीएचडीसी की ही एक विज्ञानी रिपोर्ट में परियोजना की सुरंगों में कमजोर चट्टान, प्राकृतिक दरारें, शियर जोन (भूगर्भीय रूप से कमजोर पट्टियां) और पानी की मौजूदगी जैसी चुनौतियां पहले से दर्ज थीं। रिपोर्ट को टीएचडीसी ने मार्च 2025 तैयार किया था।
कहीं चट्टान कमजोर, कहीं बहता मिला पानी
रिपोर्ट के अनुसार परियोजना की टेल रेस टनल (टीआरटी) करीब 3.04 किलोमीटर (3,040 मीटर) लंबी है। इस सुरंग के अलग-अलग हिस्सों में चट्टानों की गुणवत्ता को आरएमआर यानी राक मास रेटिंग (चट्टान की मजबूती और स्थिरता का विज्ञानी आकलन) के आधार पर दर्ज किया गया है।
रिपोर्ट में कई स्थानों पर आरएमआर 33 से 37 तक दर्ज हुआ है, जिसे क्लास-4 यानी कमजोर चट्टान की श्रेणी में रखा गया। खास बात यह है कि कुछ ऐसे हिस्सों में पानी की स्थिति केवल नम नहीं, बल्कि ड्रिपिंग (टपकता पानी), वेट (गीली चट्टान) और फ्लोइंग (बहता पानी) तक दर्ज की गई।

भूगर्भ विज्ञान की भाषा को आम आदमी के लिए समझें तो आरएमआर का अंक जितना कम होता है, चट्टान उतनी कम स्थिर मानी जाती है। ऐसी चट्टान में सुरंग काटने पर उसके छोटे-बड़े हिस्सों के अलग होने की आशंका बढ़ती है और उसे राक बोल्ट, शाटक्रीट, वायर मेश और अन्य सहारे की जरूरत पड़ती है।
पानी की मौजूदगी इस चुनौती को और बढ़ा सकती है, क्योंकि पानी चट्टानों के प्राकृतिक जोड़ और दरारों के रास्ते भीतर तक पहुंचकर कमजोर हिस्सों को प्रभावित कर सकता है।
33 आरएमआर तक पहुंची चट्टान
टीएचडीसी की रिपोर्ट के अनुसार टीआरटी के डाउनस्ट्रीम हिस्से में आरडी 796-799 मीटर (टनल के संदर्भ बिंदु से 796 से 799 मीटर) पर आरएमआर 33 (कमजोर चट्टान) दर्ज हुआ और वहां पानी की स्थिति फ्लोइंग (बहता पानी) बताई गई।
इसके आगे आरडी 799-811 मीटर (799 से 811 मीटर) में आरएमआर 37 (कमजोर चट्टान) और ड्रिपिंग (टपकता पानी) दर्ज हुआ। आरडी 811-831 मीटर (811 से 831 मीटर) में फिर आरएमआर 33 (कमजोर चट्टान) के साथ फ्लोइंग (बहता पानी) दर्ज किया गया।

इसके बाद आरडी 831-851 मीटर (831 से 851 मीटर) में आरएमआर 37 (कमजोर चट्टान) और ड्रिपिंग की स्थिति रही। आरडी 851-859 मीटर (851 से 859 मीटर) में भी चट्टान की स्थिति क्लास-4 और पानी की स्थिति गीली दर्ज हुई।
शियर जोन और दरारों ने बढ़ाई चुनौती
रिपोर्ट में सुरंग के भीतर शियर जोन (भूगर्भीय दबाव और हलचल से बनी कमजोर पट्टी) भी दर्ज किए गए हैं। टीआरटी के डाउनस्ट्रीम हिस्से में आरडी 504-535 मीटर (504 से 535 मीटर) के बीच करीब 31 मीटर (31 मीटर लंबा) क्षेत्र तथा आरडी 642-662 मीटर (642 से 662 मीटर) के बीच करीब 20 मीटर (20 मीटर लंबा) क्षेत्र में शियर जोन दर्ज हुआ।
इन क्षेत्रों में क्ले फिलिंग (दरारों में मिट्टी जैसा कमजोर पदार्थ भरना) का भी उल्लेख है। टीआरटी आउटलेट में आरडी 90-102 मीटर (90 से 102 मीटर) के बीच भी शियर जोन दर्ज किया गया है।
सुरंग निर्माण के लिहाज से इसका अर्थ महत्वपूर्ण है। चट्टान यदि एक ठोस ब्लाक के बजाय कई दरारों और कमजोर पट्टियों में बंटी हो तो खुदाई के दौरान उसका व्यवहार बदल सकता है। दरारों में पानी पहुंचने पर स्थिति और जटिल हो सकती है।
यही कारण है कि सुरंग निर्माण में केवल मशीन से चट्टान काटना पर्याप्त नहीं होता, बल्कि हर खुदाई के बाद चट्टान की गुणवत्ता देखकर तत्काल सपोर्ट सिस्टम तय करना पड़ता है।
फाल्ट की संभावना भी पहले से थी
परियोजना क्षेत्र का भूगर्भीय ढांचा भी जटिल है। तकनीकी अध्ययन में बताया गया है कि परियोजना क्षेत्र पीपलकोटी विंडो (विशेष भूगर्भीय संरचना) में आता है, जहां स्लेट, डोलोमाइटिक चूना पत्थर और अन्य रूपांतरित चट्टानों के साथ कई फाल्ट और थ्रस्ट संरचनाएं मौजूद हैं।
अध्ययन में जैसल फाल्ट, टापोन थ्रस्ट, बेमरू और हाट फाल्ट जैसी संरचनाओं का उल्लेख किया गया है। यानी यहां जमीन के भीतर चट्टानों की परतें सीधी और एक जैसी नहीं हैं।
हिमालय स्वयं भूगर्भीय रूप से युवा और सक्रिय पर्वत तंत्र है। ऐसे क्षेत्र में सुरंग खोदते समय कुछ मीटर आगे बढ़ने पर भी चट्टान की गुणवत्ता बदल सकती है। इसलिए फेस मैपिंग (हर नई खुदाई वाली चट्टान की तत्काल जांच) और लगातार भू-तकनीकी निगरानी सुरक्षा की बुनियादी जरूरत बन जाती है।
पानी की मौजूदगी भी नई बात नहीं थी
परियोजना से जुड़े पुराने तकनीकी अध्ययन भी भूमिगत पानी की चुनौती की ओर इशारा करते हैं। मार्च 2025 के अध्ययन में बताया गया है कि वर्ष 2021 में कराए तकनीकी अध्ययन में टीबीएम एडिट के शुरुआती हिस्से में मलबे और ढलान की सामग्री के बीच भूजल की स्थिति नम से संतृप्त तक मिलने और मानसून में करीब 200 लीटर प्रति मिनट (हर मिनट लगभग 200 लीटर) तक पानी रिसने का उल्लेख किया गया था। अध्ययन में परियोजना क्षेत्र को कई भूगर्भीय संरचनाओं से प्रभावित बताया गया है।
कमजोर चट्टान के लिए सपोर्ट का प्राविधान था, फिर भी हादसा हुआ
टीएचडीसी की भू-तकनीकी रिपोर्ट में चट्टान की श्रेणी के अनुसार सपोर्ट सिस्टम का प्राविधान बताया गया है। क्लास-4 की कमजोर चट्टान के लिए रॉक बोल्ट (चट्टान को अंदर से बांधने वाले एंकर), करीब 300 मिलीमीटर (लगभग 30 सेंटीमीटर) शॉटक्रीट, दो परत वायर मेश और लैटिस गर्डर (धातु का सहारा ढांचा) जैसे उपाय निर्धारित किए गए।
इसका अर्थ यह भी है कि परियोजना के डिजाइन में कमजोर भूभाग की संभावना को नजरअंदाज नहीं किया गया था। हालांकि, इसके बाद भी इतना बड़ा हादसा होना कई सवाल खड़े करता है।
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