हर बुखार एक जैसा नहीं, बच्चों के इलाज में बीमारी की सही पहचान जरूरी... अपनाए ये तरीका
बच्चों के बुखार को सामान्य न समझें, क्योंकि समान लक्षण अलग-अलग बीमारियों के संकेत हो सकते हैं।

प्रतीकात्मक तस्वीर।

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जागरण संवाददाता, देहरादून। बच्चे को बुखार आया और घर में रखी दवा दे दी, यह तरीका हर बार सही नहीं हो सकता। बच्चों में समान लक्षण अलग-अलग बीमारियों के संकेत हो सकते हैं। उम्र, वजन और स्वास्थ्य की स्थिति के अनुसार जांच और उपचार भी बदलता है। बच्चों की बीमारी की सही पहचान और उपचार के बदलते तरीकों पर देहरादून में देशभर के बाल रोग विशेषज्ञों ने चर्चा की।
इंडियन एकेडमी आफ पीडियाट्रिक्स (आइएपी) की देहरादून शाखा की ओर से आयोजित राष्ट्रीय स्तर के शैक्षणिक कार्यक्रम में वरिष्ठ बाल रोग विशेषज्ञों और आइएपी के राष्ट्रीय व राज्य स्तर के पदाधिकारियों ने हिस्सा लिया। विशेषज्ञों ने बाल चिकित्सा से जुड़े समसामयिक विषयों पर प्रस्तुतियां दीं और अपने चिकित्सकीय अनुभव साझा किए।
उपचार से जुड़े अनुभव भी साझा किए
राजकीय दून मेडिकल कालेज में आयोजित कार्यक्रम में आइएपी की राष्ट्रीय अध्यक्ष डा. नीलम मोहन, केंद्रीय सचिव डा. रुचिरा, डा. आलोक भंडारी और कार्यकारिणी सदस्य डा. राजीव श्रीवास्तव मौजूद रहे। राज्य इकाई की ओर से डा. रवि सहोता, डॉ. अशोक और डा. राकेश ने प्रतिभाग किया।
विशेषज्ञ सत्रों में हिमालयन इंस्टीट्यूट आफ मेडिकल साइंसेज जौलीग्रांट की डा. अल्पा गुप्ता, एसजीआरआर मेडिकल कालेज के बाल रोग विभागाध्यक्ष डा. विशाल, आइएपी कार्यकारिणी सदस्य डा. रश्मा दास हजारिका और वरिष्ठ बाल रोग विशेषज्ञ डा. रमाकांत पाटिल ने व्याख्यान दिए। सत्रों में चिकित्सकों ने सवाल-जवाब के साथ उपचार से जुड़े अनुभव भी साझा किए।
विशेषज्ञों ने बताया कि छोटे बच्चे कई बार अपनी तकलीफ स्पष्ट रूप से नहीं बता पाते। ऐसे में बच्चे के व्यवहार, खान-पान और सामान्य गतिविधियों में बदलाव पर ध्यान देना जरूरी है। लगातार बुखार, सांस लेने में दिक्कत, असामान्य सुस्ती या तेजी से बिगड़ती हालत को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। इस मौके पर आइएपी देहरादून शाखा के डा. जीडीएस बजाज, डा. संजीव कुमार झा, डा. मुदित कुमार अग्रवाल, शाखा के सचिव डा. संजीव कुमार झा आदि मौजूद रहे।
नए तरीकों और अनुभवों से अपडेट जरूरी
चिकित्सकों ने कहा कि बिना चिकित्सकीय सलाह दवा देने और पुराने पर्चे के आधार पर उपचार दोहराने से भी बचना चाहिए। बाल चिकित्सा में नई जानकारियां लगातार सामने आ रही हैं। ऐसे शैक्षणिक संवादों से विशेषज्ञों को उपचार के नए तरीकों और अनुभवों से अपडेट रहने का अवसर मिलता है, जिसका सीधा लाभ बच्चों को बेहतर और सुरक्षित इलाज के रूप में मिल सकता है।
