देहरादून में ड्राइवर की बेटी अमीशा बनेगी डाक्टर: पहले प्रयास में 300, दूसरे प्रयास में हासिल किए 463 अंक
देहरादून की अमीशा ने दूसरे प्रयास में नीट-यूजी में 463 अंक और अंशुल ने चौथे प्रयास में 476 अंक हासिल कर डॉक्टर बनने की दिशा में कदम बढ़ाया है। ...और पढ़ें

अमीशा।
HighLights
अमीशा ने दूसरे प्रयास में नीट-यूजी में 463 अंक प्राप्त किए
अंशुल ने चौथे प्रयास में नीट-यूजी में 476 अंक हासिल किए
सीमित संसाधनों के बावजूद दोनों ने दृढ़ संकल्प से सफलता पाई
जागरण संवाददाता, देहरादून। पहला प्रयास उम्मीद के मुताबिक नहीं रहा, लेकिन अमीशा ने हार नहीं मानी।
ड्राइवर सुमेर लाल की बेटी अमीशा ने नीट-यूजी में 463 अंक (एससी) हासिल कर डाक्टर बनने की दिशा में मजबूत कदम बढ़ाया है। उनकी सफलता संघर्ष, धैर्य और लगातार मेहनत की मिसाल है।
कारगी चौक निवासी सुमेर ड्राइवर हैं। सीमित आय में परिवार चलाते हुए उन्होंने हमेशा बेटी की पढ़ाई को प्राथमिकता दी।
अमीशा ने वर्ष 2024 में एसजीआरआर पटेलनगर से 89.5 प्रतिशत अंक के साथ इंटर किया। उसी वर्ष पहली बार नीट दिया, लेकिन 300 अंक मिलने से सीट नहीं मिली।
अमीशा ने असफलता को अपनी कमजोरी नहीं बनने दिया। उन्होंने दोबारा तैयारी का फैसला किया। दूसरे प्रयास में उनका स्कोर 300 से बढ़कर 463 अंक पहुंच गया।
अमीशा कहती हैं कि सफलता के लिए परिस्थितियां नहीं, बल्कि दृढ़ संकल्प मायने रखता है। उनकी उपलब्धि उन छात्रों के लिए प्रेरणा है, जो संसाधनों की कमी के बावजूद बड़े सपने देखने और उन्हें पूरा करने का साहस रखते हैं।
चौथे प्रयास में अंशुल ने जीती नीट की जंग
दून के अंशुल ने लगातार तीन बार असफल होने के बाद भी हार नहीं मानी। चौथे प्रयास में उन्होंने नीट-यूजी में अनुसूचित जाति (एससी) वर्ग से 476 अंक हासिल कर डाक्टर बनने की दिशा में मजबूत कदम बढ़ाया है।
बल्लूपुर निवासी अंशुल के पिता कृष्ण कुमार कास्मेटिक की दुकान चलाते हैं। सीमित आय के बावजूद उन्होंने बेटे की पढ़ाई में कोई कमी नहीं आने दी।
अंशुल ने वर्ष 2023 में केंद्रीय विद्यालय, एफआरआइ से 12वीं 77 प्रतिशत अंकों के साथ पास की। इसके बाद उन्होंने नीट की तैयारी शुरू की, लेकिन शुरुआती तीन प्रयासों में सफलता नहीं मिली। अंशुल ने असफलताओं से सीख लेकर अपनी तैयारी को और बेहतर बनाया।
शिक्षकों के मार्गदर्शन और नियमित अभ्यास के दम पर उन्होंने चौथे प्रयास में 476 अंक हासिल कर सफलता प्राप्त की। अंशुल की कहानी बताती है कि लगातार प्रयास, धैर्य और आत्मविश्वास के साथ बड़ी से बड़ी मंजिल भी हासिल की जा सकती है।