उत्तराखंड में सिख आंदोलनों का 'एंट्री पॉइंट' बना कुल्हाल बॉर्डर, हमेशा रही पुलिस की परीक्षा
उत्तराखंड की कुल्हाल-पांवटा सीमा सिख आंदोलनों का केंद्र बन गई है, जिससे कानून-व्यवस्था की बड़ी चुनौती सामने आती है। ...और पढ़ें

HighLights
कुल्हाल-पांवटा सीमा सिख आंदोलनों का प्रमुख केंद्र बनी।
निहंगों के उत्तराखंड प्रवेश से देहरादून में हाई अलर्ट।
ज्ञान गोदड़ी से कर्णप्रयाग विवाद तक, सीमा पर पुलिस की परीक्षा।
अंकुर अग्रवाल, देहरादून। गुरुवार रात निहंगों के उत्तराखंड की ओर बढ़ने से कुल्हाल-पांवटा सीमा एक बार फिर सुर्खियों में आ गई। यह पहला अवसर नहीं है जब हिमाचल से सटा यह बार्डर सिख समुदाय के आंदोलन का केंद्र बना हो।
पिछले डेढ़-दो दशक में हरिद्वार के ज्ञान गोदड़ी गुरुद्वारा आंदोलन से लेकर अब कर्णप्रयाग विवाद तक, जब भी सिख संगठनों ने उत्तराखंड कूच का एलान किया, सबसे पहले पुलिस की परीक्षा इसी सीमा पर हुई है।
हरिद्वार के ज्ञान गोदड़ी गुरुद्वारा विवाद को लेकर पंजाब, हरियाणा, दिल्ली और अन्य राज्यों से हर वर्ष जत्थे उत्तराखंड आने का प्रयास करते रहे हैं। शासन लंबे समय से इन जत्थों के हरिद्वार कूच पर प्रतिबंध लगाता रहा है।
ऐसे में कुल्हाल बैरियर और पांवटा-दून मार्ग पर उत्तराखंड पुलिस को भारी सुरक्षा व्यवस्था करनी पड़ती है। अधिकांश मामलों में जत्थों को सीमा पर रोककर वार्ता की गई और कई बार हिरासत में लेकर वापस भेजा गया।
वर्ष 2017 में ज्ञान गोदड़ी आंदोलन के दौरान भी पांवटा साहिब से हरिद्वार की ओर बढ़ रहे जत्थों को कुल्हाल सीमा पर रोकना पड़ा था। उस समय प्रदर्शन, नारेबाजी और हिरासत की कार्रवाई हुई थी। इसके बाद भी कई वर्षों तक गुरुनानक देव जयंती और अन्य अवसरों पर पुलिस को सीमा पर विशेष बंदोबस्त करना पड़ा।
गुरुवार रात की घटना ने एक बार फिर यही सवाल खड़ा कर दिया कि पांवटा-दून कारिडोर केवल अंतरराज्यीय सीमा नहीं, बल्कि संवेदनशील धार्मिक और कानून-व्यवस्था के मामलों का सबसे अहम प्रवेश द्वार बन चुका है।
इस बार भी पुलिस ने सुबह से कुल्हाल बार्डर पर मोर्चा संभाल रखा था, लेकिन देर रात निहंगों की रणनीति बदलने से राजधानी तक हाई अलर्ट करना पड़ा।
पुलिस अधिकारियों का मानना है कि कुल्हाल बैरियर पर निगरानी भर काफी नहीं है। पांवटा से देहरादून को जोड़ने वाले फोरलेन, शिमला बाईपास और अन्य वैकल्पिक मार्ग भी किसी भी बड़े आंदोलन के दौरान सुरक्षा एजेंसियों के लिए चुनौती बन जाते हैं।
यही कारण है कि अब हर संवेदनशील घटनाक्रम में केवल बार्डर ही नहीं, बल्कि पूरी दून घाटी को सुरक्षा घेरे में लेना पड़ता है।
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