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    बदरीनाथ और भविष्य बदरी धाम के कपाट कब खुलेंगे? चारधाम यात्रा पर आ रहे तो मौका है सप्त बदरी दर्शन का

    Updated: Fri, 17 Apr 2026 08:24 PM (IST)

    उत्तराखंड की चारधाम यात्रा पर आने वाले श्रद्धालु सप्त बदरी दर्शन का लाभ उठा सकते हैं। चमोली जिले में स्थित इन सात धामों में से अधिकांश मंदिर साल भर खु ...और पढ़ें

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    दिनेश कुकरेती, देहरादून। आप उत्तराखंड की चारधाम यात्रा पर आ रहे हैं तो मौका है सप्त बदरी दर्शन का। भगवान बदरी विशाल के ये सातों धाम चमोली जिले में स्थित हैं और थोड़ा समय निकालकर आप इन सभी तीर्थों में दर्शन कर सकते हैं। इनमें बदरीनाथ, भविष्य बदरी व आदि बदरी धाम को छोड़कर शेष सभी मंदिर बारहों महीने श्रद्धालुओं के लिए खुले रहते हैं।

    इनमें आदि बदरी धाम सिर्फ पौष मास में बंद रहता है। इस दौरान आप प्रकृति के खूबसूरत नजारों, गहरी घाटियों में अथाह जलराशि लिए सर्पाकार बहती बारहमासी नदियों, ऊंचे-ऊंचे झरनों, हिमाच्छादित चोटियों और चांदपुरगढ़ी जैसे कई ऐतिहासिक स्थलों का दीदार भी कर सकते हैं। बदरीनाथ और भविष्य बदरी धाम के कपाट 23 अप्रैल को खोले जाएंगे। 

    नृसिंह बदरी
    इस यात्रा की शुरुआत ज्योतिर्मठ स्थित नृसिंह बदरी धाम से होती है, जोकि बदरीनाथ धाम का शीतकालीन प्रवास स्थल भी है। मंदिर में भगवान नृसिंह का लगभग 10 इंच ऊंचा शालिग्राम विग्रह स्थापित है।

    मान्यता है कि भगवान नृसिंह के बायें हाथ की कलाई निरंतर कमजोर हो रही है और जिस दिन यह टूट जाएगी, उसी दिन जोशीमठ के पास जय-विजय पर्वत के आपस में मिलने से बदरीनाथ की राह सदा के लिए अवरुद्ध हो जाएगी। तब भगवान बदरी नारायण भविष्य बदरी धाम में दर्शन देंगे।

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    योग-ध्यान बदरी
    जोशीमठ से 18.5 किमी दूर पांडुकेश्वर स्थित योग-ध्यान बदरी मंदिर में भगवान नारायण तपस्वी स्वरूप में विराजमान हैं। प्राचीन काल में रावल भी शीतकाल में इसी स्थान पर रहकर भगवान नारायण की पूजा किया करते थे, इसलिए यहां भगवान नारायण का नाम योग-ध्यान बदरी हो गया।

    शीतकाल में बदरीनाथ धाम के पट बंद होने पर भगवान के उत्सव विग्रह की पूजा यहीं होती है। इसलिए इसे ‘शीत बदरी’ भी कहा जाता है। पांडुकेश्वर में देवताओं के खजांची कुबेरजी का भी भव्य मंदिर है।

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    बदरीनाथ धाम
    नर-नारायण पर्वत और नीलकंठ पर्वत शृंखलाओं के आंचल में आदि शंकराचार्य ने आठवीं सदी में बदरीनाथ मंदिर का निर्माण कराया था। मंदिर के गर्भगृह में भगवान नारायण की चतुर्भुज मूर्ति विराजमान है।

    शालिग्राम शिला से बनी यह मूर्ति ध्यानावस्था में है। मंदिर में नर-नारायण के विग्रह की पूजा होती है और अखंड दीप प्रज्वलित रहता है, जो अचल ज्ञान-ज्योति का प्रतीक है। मंदिर के पश्चिम में 27 किमी की दूरी पर बदरीनाथ शिखर के दर्शन होते हैं।

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    भविष्य बदरी
    भविष्य बदरी धाम जोशीमठ-मलारी मार्ग पर तपोवन से आगे सुभांई गांव के पास है। यहां पहुंचने के लिए जोशीमठ से तपोवन तक 15 किमी की दूरी सड़क मार्ग से तय करनी पड़ती है। वर्तमान में तपोवन मार्ग पर सलधार से भी भविष्य बदरी के लिए मार्ग जाता है। इस मंदिर के कपाट बदरीनाथ के साथ ही खोलने व बंद करने की परंपरा है।

    वृद्ध बदरी धाम
    ज्योतिर्मठ से सात किलोमीटर पहले हेलंग की ओर अणिमठ गांव में भगवान नारायण का प्राचीन मंदिर है, जिसमें वह ‘वृद्ध बदरी’ के रूप में प्रतिष्ठित हैं। जनश्रुति है कि एक बार देवर्षि नारद मृत्युलोक में विचरण करते हुए बदरीधाम की ओर जाने लगे।

    मार्ग की विकटता देखकर थकान मिटाने को वह अणिमठ नाम स्थान पर रुके और कुछ समय भगवान विष्णु की तपस्या कर उनसे दर्शन की अभिलाषा की। भगवान विष्णु ने वृद्ध के रूप में नारदजी को दर्शन दिए, इसलिए भगवान को यहां ‘वृद्ध बदरी’ नाम मिला।

    ध्यान बदरी धाम
    उर्गम घाटी में पंचम केदार कल्पेश्वर धाम के पास कल्प गंगा नदी के तट पर स्थित इस मंदिर का निर्माण 12वीं सदी में आदि शंकराचार्य के मार्गदर्शन में हुआ।

    मान्यता है कि प्राचीन काल में सर्दियों के दौरान जब बदरीनाथ धाम पहुंचना दुर्गम हो जाता था, तब भक्त ध्यान बदरी मंदिर में ही भगवान विष्णु की पूजा करते थे। ध्यान बदरी मंदिर पश्चिम में काशी विश्वनाथ, पूरब में कुबेर धारा, उत्तर में घंटाकर्ण और दक्षिण में चंडिका मंदिर से घिरा है। यहां कल्पवास की परंपरा है, इसलिए भगवान का विग्रह भी यहां आत्मलीन अवस्था में है।

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    आदि बदरी धाम
    गढ़वाल राजवंश की राजधानी रही चांदपुरगढ़ी से तीन किमी आगे रानीखेत मार्ग पर दायीं ओर प्राचीन मंदिरों का समूह को आदि बदरी धाम कहा जाता है। इनका निर्माण आठवीं से 11वीं सदी के बीच कत्यूरी राजाओं ने किया।

    आदि बदरी मंदिर समूह कर्णप्रयाग से 11 किमी की दूरी पर है। मूलरूप से इस समूह में 16 मंदिर थे, जिनमें अब 14 ही बचे हैं। इस मंदिर के कपाट साल में सिर्फ पौष मास में बंद रहते हैं और मकर संक्रांति पर्व पर श्रद्धालुओं दर्शनार्थ खोल दिए जाते हैं।

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    स्नान-दर्शन और सैर-सपाटा
    यात्रा के दौरान श्रद्धालु देश के प्रथम गांव माणा में केशव प्रयाग, ज्योतिर्मठ में विष्णु प्रयाग, नंदप्रयाग व कर्णप्रयाग में स्नान व दर्शन का पुण्य भी अर्जित कर सकते हैं। ज्योतिर्मठ में त्रोटकाचार्य की गुफा, आदि शंकराचार्य का गद्दीस्थल व  22 मीटर व्यास का 170 फीट ऊंचा कल्प वृक्ष भी दर्शनीय है। सैर-सपाटे के शौकीन हैं तो कर्णप्रयाग से 31 किमी दूर प्रसिद्ध पर्यटन स्थल बेनीताल भी आपके स्वागत को तैयार है।

    होम स्टे में पहाड़ी व्यंजनों का जायका
    सभी धामों में होटल, होम स्टे व धर्मशालाएं उपलब्ध हैं। होम स्टे में श्रद्धालु पहाड़ी व्यंजनों का जायका भी ले सकते हैं। सभी होम स्टे में पहाड़ी किचन उपलब्ध हैं। हां! यात्रा के दौरान गर्म कपड़े व जरूरी दवाइयां जरूर साथ रखें और कम से कम 10 दिन का समय निकालकर यात्रा पर आएं। सभी धामों के लिए ऋषिकेश से सार्वजनिक व निजी वाहन सुविधा उपलब्ध है।