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फ्रांस के छात्र आंदोलन के पीछे वैश्विक वामपंथी नेटवर्क? भारत तक कनेक्शन का दावा

Published: Mon, 19 Oct 2026 10:36 PM (IST)Updated: Tue, 20 Oct 2026 02:15 AM (IST)

फ्रांस में छात्र विरोध प्रदर्शनों को वैश्विक वामपंथी नेटवर्क द्वारा व्यापक राजनीतिक एजेंडे के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है, जिसमें भारत तक के संगठन शामिल हैं।

फ्रांस के छात्र आंदोलन के पीछे वैश्विक वामपंथी नेटवर्क। (रॉयटर्स)

फ्रांस के छात्र आंदोलन के पीछे वैश्विक वामपंथी नेटवर्क। (रॉयटर्स)

HighLights

  1. फ्रांस छात्र प्रदर्शनों के पीछे वैश्विक वामपंथी नेटवर्क का आरोप।

  2. रिपोर्ट में भारत सहित 50 संगठनों के कनेक्शन का दावा।

  3. अति-वामपंथी राजनीतिक आतंकवाद पर अमेरिकी अधिकारी की चेतावनी।

डिजिटल डेस्क, वाशिंगटन। फ्रांस में छात्र विरोध प्रदर्शनों को लेकर एक रिपोर्ट में वैश्विक वामपंथी संगठनों के नेटवर्क पर सवाल उठाए गए हैं। फाक्स न्यूज डिजिटल की नौ अक्टूबर को प्रकाशित रिपोर्ट का दावा है कि शिक्षा से जुड़ी शिकायतों के साथ शुरू हुए प्रदर्शनों को कम्युनिस्ट, समाजवादी और अति-वामपंथी समूह व्यापक राजनीतिक एजेंडे के लिए इस्तेमाल कर रहे हैं।

रिपोर्ट में 50 संगठनों की पहचान करने और उनके नेटवर्क के अमेरिका, ब्रिटेन, ग्रीस, ब्राजील तथा भारत तक फैले होने की बात कही गई है।

रिपोर्ट के मुताबिक, पहचाने गए 50 संगठनों में 15 छात्र या युवा समूह हैं, जबकि बाकी में श्रमिक संघ, राजनीतिक दल, कम्युनिस्ट और समाजवादी संगठन तथा नागरिक अधिकार समूह शामिल हैं। रिपोर्ट का आरोप है कि ये संगठन प्रदर्शनों को समर्थन देने, हड़तालों का आह्वान करने और अंतरराष्ट्रीय मीडिया के जरिये आंदोलन को प्रमुखता देने में सक्रिय हैं।

भारत से जुड़े संगठनों का भी जिक्र

रिपोर्ट में फ्रांस स्थित इंडियन एलायंस पेरिस का उल्लेख किया गया है, जो छात्रों, शोधकर्ताओं और पेशेवरों का संगठन है। फाक्स न्यूज डिजिटल के अनुसार, इस समूह ने इंटरनेट मीडिया मंच एक्स पर फ्रांस और भारत के युवा प्रदर्शनकारियों के समर्थन में पोस्ट साझा कीं। एक संदेश में लिखा गया, “फ्रांस में। भारत में। आज के लिए शाबाश।”

रिपोर्ट में राहुल गांधी को हिरासत में लिए जाने और भारत में मुस्लिम मतदाताओं को मतदान से रोकने के दावों से जुड़ी पोस्ट का भी हवाला दिया गया है। न्यूयार्क स्थित मीडिया संस्थान ब्रेकथ्रू न्यूज का नाम भी रिपोर्ट में आया है। आरोप है कि उसने फ्रांस के प्रदर्शनों और छात्रों-पुलिस के बीच झड़पों को प्रमुखता दी।

अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने भी फ्रांस के प्रदर्शनों पर टिप्पणी करते हुए उदारवादी नीतियों और विविधता की अवधारणा की आलोचना की। उन्होंने अमेरिकी नागरिकों को इन प्रकरणों से सीख लेने की भी अपील की।

सिर उठा रहा अति-वामपंथी राजनीतिक आतंकवाद

अमेरिका के उप विदेश मंत्री जैकब एस. हेलबर्ग ने "अति-वामपंथी राजनीतिक आतंकवाद" के फिर से सिर उठाने को लेकर चेतावनी दी है। उन्होंने आरोप लगाया है कि अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क सीमाओं के पार हिंसा को अंजाम देने में समन्वय कर रहे हैं, और उन्होंने इन नेटवर्कों की फंडिंग और गतिविधियों के खिलाफ कार्रवाई करने की मांग की है।

एक्स पर एक पोस्ट में हेलबर्ग ने कहा कि जो लोग इसे उचित ठहराते हैं, सामान्य मानते हैं या इसे जायज बताते हैं, वे कड़ी निंदा के पात्र हैं। उन्होंने कहा कि तबाही और अराजकता राजनीतिक अभिव्यक्ति के वैध तरीके नहीं हैं। आगजनी कोई तर्क नहीं है। डराना-धमकाना कोई बहस नहीं है। आतंक न्याय नहीं है। जलाया गया हर कारोबार किसी की जीवन भर की मेहनत की बर्बादी है।

फ्रांस में हिंसा के पीछे एक दशक का राजनीतिक बदलाव

फ्रांस में विरोध प्रदर्शनों के दौरान भड़की हिंसा को पिछले एक दशक में देश की राजनीति में आए बदलावों का नतीजा माना जा रहा है। फ्रांसीसी अखबार 'ली मोंड' के एक लेख के मुताबिक, राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों के कार्यकाल में राजनीतिक व्यवस्था में हुए बदलावों और कट्टरपंथी दलों के उभार ने समाज में टकराव की प्रवृत्ति को बढ़ावा दिया है।

लेख में कहा गया है कि शनिवार को देशभर में प्रदर्शनों के दौरान हुई हिंसा केवल कानून-व्यवस्था की समस्या नहीं है, बल्कि इसके पीछे राजनीतिक माहौल में आया व्यापक बदलाव भी है।

कट्टरपंथी दलों की ऐसी राजनीति, जिसमें विरोध और संघर्ष को प्रमुखता दी जाती है, सामाजिक तनाव बढ़ाने में भूमिका निभा सकती है। हालांकि, उपलब्ध अंश में हिंसा के लिए किसी एक दल या समूह को सीधे जिम्मेदार नहीं ठहराया गया है।

(समाचार एजेंसी एएनआई के इनपुट के साथ)