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    सस्ते एआई के सहारे अमेरिकी कंपनियों को चुनौती देने में जुटा चीन, वैश्विक बाजार में तेजी से पैठ बना सकता है

    Updated: Sat, 28 Feb 2026 07:07 AM (IST)

    आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) के क्षेत्र में चीन तेजी से ऐसी रणनीति पर काम कर रहा है, जो अमेरिकी तकनीकी कंपनियों के प्रभुत्व को चुनौती दे सकती है। ...और पढ़ें

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    सस्ते एआई के सहारे अमेरिकी कंपनियों को चुनौती देने में जुटा चीन (सांकेतिक तस्वीर)

    द कन्वर्सेशन, एंसिडनी। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) के क्षेत्र में चीन तेजी से ऐसी रणनीति पर काम कर रहा है, जो अमेरिकी तकनीकी कंपनियों के प्रभुत्व को चुनौती दे सकती है।

    विशेषज्ञों के अनुसार चीन महंगे और अत्याधुनिक मॉडल बनाने की बजाय सस्ते, व्यापक रूप से उपयोग होने वाले एआई टूल्स विकसित कर वैश्विक तकनीकी निर्भरता बनाने की दिशा में आगे बढ़ रहा है।

    हाल ही में टिकटॉक की मूल कंपनी बाइटडांस द्वारा पेश किया गया वीडियो जनरेटिंग एआइ टूल ‘सीडांस 2.0’ इस रणनीति का उदाहरण माना जा रहा है। यह टेक्स्ट निर्देशों से फिल्म जैसी वीडियो तैयार कर सकता है।

    वहीं अमेरिकी कंपनी एंथ्रोपिक ने आरोप लगाया है कि कुछ चीनी एआई प्रयोगशालाओं ने मॉडल सुधारने के लिए बड़े पैमाने पर डाटा संग्रह की विवादित तकनीक अपनाई।

    विश्लेषकों का कहना है कि जहां उन्नत एआई अनुसंधान में अभी अमेरिकी कंपनियां आगे हैं, वहीं चीन लागत कम करके वैश्विक बाजार में तेजी से पैठ बना सकता है। कम कीमत वाले एआइ टूल विकासशील देशों और छोटे कारोबारों के लिए आकर्षक बन रहे हैं, जिससे भविष्य में सॉफ्टवेयर और डिजिटल सेवाएं चीनी प्लेटफार्म पर निर्भर हो सकती हैं।

    चीन की आधिकारिक एआइ नीति 2030 तक देश को विश्व का प्रमुख एआइ नवाचार केंद्र बनाने का लक्ष्य रखती है। इसके साथ ही बीजिंग एआइ को मानव सभ्यता की प्रगति से जोड़कर पेश कर रहा है, जिसे विशेषज्ञ तकनीकी साफ्ट पावर की रणनीति मानते हैं।

    हालांकि पश्चिमी लोकतंत्रों में इसके साथ सुरक्षा और सूचना नियंत्रण को लेकर चिंताएं भी बढ़ रही हैं। रिपोर्टों के अनुसार चीन में एल्गोरिदम और डिजिटल प्लेटफार्म को मुख्यधारा मूल्यों को बढ़ावा देने और सामग्री नियंत्रण के नियमों का पालन करना होता है, जिससे आशंका है कि एआई के वैश्विक प्रसार के साथ सेंसरशिप और निगरानी मॉडल भी फैल सकते हैं।

    विशेषज्ञों का मानना है कि यदि चीनी एआइ वैश्विक मानक बन गया, तो कई देशों के सामने सस्ती तकनीक अपनाने और राजनीतिक-तकनीकी निर्भरता से बचने के बीच कठिन संतुलन की चुनौती खड़ी हो सकती है।