बालेन शाह का रिपोर्ट कार्ड: 100 रुपये भंसार से रोजगार तक... नेपाल में ‘Gen-Z क्रांति’ के पोस्टर बॉय बने बालेन क्यों घिर गए?
नेपाल में 'जेन-जेड विद्रोह' के प्रतीक बालेन्द्र शाह, जो भ्रष्टाचार और बेरोजगारी के खिलाफ सत्ता में आए थे, अब खुद सवालों के घेरे में हैं। ...और पढ़ें

बालेन शाह सरकार पर उठ रहे सवाल (फोटो-सोशल मीडिया)

समय कम है?
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डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। नेपाल में भ्रष्टाचार, बेरोजगारी और पारंपरिक राजनीति के खिलाफ उभरे 'Gen-Z विद्रोह' के सबसे बड़े चेहरे बने बालेन्द्र शाह उर्फ 'बालेन' अब खुद सवालों के घेरे में हैं।
मंत्रियों के इस्तीफे, कानूनी विवाद, अध्यादेशों के जरिए शासन, बुलडोजर कार्रवाई और संसद से दूरी जैसे मुद्दों ने उनकी सरकार पर दबाव बढ़ा दिया है।
सत्ता संभालने के महज दो महीने बाद ही नेपाल के युवा प्रधानमंत्री को लेकर यह चर्चा शुरू हो गई है कि क्या उनकी सरकार का बहुप्रचारित सुधार एजेंडा पटरी से उतर रहा है?
35 वर्षीय रैपर से राजनेता बने बालेन शाह ने मार्च 2026 में प्रधानमंत्री पद की शपथ लेने के बाद बड़े बदलावों का वादा किया था। लेकिन अब सरकारी प्रगति ट्रैकर पर उनकी कई अहम घोषणाएं 'ओवरड्यू' यानी तय समय से पीछे दिखाई दे रही हैं।
कैसे सत्ता तक पहुंचे बालेन शाह?
नेपाल में पिछले साल युवाओं ने बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन किए थे। प्रदर्शनकारियों ने तत्कालीन प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली की सरकार पर भ्रष्टाचार, भाई-भतीजावाद और बेरोजगारी बढ़ाने के आरोप लगाए।
इन आंदोलनों ने नेपाल की राजनीति को हिला दिया और आखिरकार ओली सरकार को सत्ता छोड़नी पड़ी। इसके बाद हुए चुनावों में युवाओं ने पारंपरिक दलों के बजाय बालेन शाह को बदलाव के प्रतीक के रूप में चुना।
रैपर और सोशल मीडिया आइकन के रूप में लोकप्रिय बालेन शाह ने खुद को पुरानी राजनीति के खिलाफ नई पीढ़ी की आवाज के तौर पर पेश किया।
वादों के दावे हो रहे फेल
प्रधानमंत्री बनने के बाद बालेन शाह ने 100 बिंदुओं वाला बड़ा प्रशासनिक सुधार एजेंडा पेश किया था। प्रधानमंत्री कार्यालय के लॉन्च किए गए ऑनलाइन ट्रैकर के अनुसार, इन वादों में से कई तय समय से पीछे चल रहे हैं।
- संघीय मंत्रालयों की संख्या कम करना
- घाटे वाले बोर्ड और समितियों का विलय
- सरकारी कर्मचारियों और शिक्षकों को राजनीतिक प्रभाव से मुक्त करना
- निवेश और उद्योग सेवाओं का डिजिटलीकरण
- ऊर्जा निर्यात की दीर्घकालिक रणनीति तैयार करना
- रुकी हुई परियोजनाओं को फिर शुरू करना
दो महीने में दो मंत्रियों की छुट्टी
बालेन सरकार को शुरुआती झटके कैबिनेट विवादों से भी लगे। श्रम मंत्री दीपक साह विवाद में दीपक साह को अपनी पत्नी को हेल्थ इंश्योरेंस बोर्ड में नियुक्त करने के विवाद के बाद हटाना पड़ा।
गृह मंत्री सुदन गुरूंग ने एक कारोबारी से कथित संबंधों के आरोपों के बाद इस्तीफा दे दिया। नेपाल के युवाओं में भी सवाल उठने लगे हैं कि क्या बालेन के पास सक्षम टीम की कमी है।
हालांकि बालेन सरकार के पास निचले सदन में दो-तिहाई बहुमत है, लेकिन राष्ट्रीय सभा (ऊपरी सदन) में उसका कोई सदस्य नहीं है। ऐसे में सरकार ने कई फैसले अध्यादेशों के जरिए लागू करने की कोशिश की।
सरकार के अध्यादेश
नेपाल में बालेन शाह की सरकार आठ अध्यादेश लेकर आई, लेकिन नेपाल सुप्रीम कोर्ट ने इन अध्यादेशों पर रोक लगा दी। इन अध्यादेशों में सरकारी कर्मचारी यूनियनों को खत्म करना, विश्वविद्यालयों में छात्र संगठनों पर रोक, शिक्षा और नौकरशाही से राजनीतिक दलों का प्रभाव हटाना शामिल था।
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बालेन शाह ने सोशल मीडिया पर कहा कि स्कूलों और नौकरशाही में 'पार्टी झंडों' पर रोक लगाने का उद्देश्य पेशेवर स्वतंत्रता बढ़ाना है। उनके अनुसार, छात्र और कर्मचारी संगठन राजनीतिक दलों के 'स्लीपर सेल' बन चुके थे।
क्या नेपाल बन रहा है 'बुलडोजर रिपब्लिक'?
बालेन सरकार की सबसे विवादित कार्रवाइयों में से एक देशभर में चलाया गया अतिक्रमण हटाओ अभियान है। सरकार ने अवैध बस्तियों और कब्जों को हटाने के लिए बुलडोजर अभियान शुरू किया, जिसके खिलाफ भारी विरोध प्रदर्शन हुए।
बालेन शाह के खिलाफ लोगों ने नारे लगाए-
- 'No Balen government, no bulldozer'
- 'बुलडोजर आतंक बंद करो'
- 'हमें न्याय चाहिए'
अधिकारियों के अनुसार, केवल काठमांडू घाटी में ही करीब 4,000 ढांचे तोड़े गए, जिसमें 15,000 से ज्यादा लोग विस्थापित हुए। मानवाधिकार संगठनों और एमनेस्टी इंटरनेशनल ने आरोप लगाया कि सरकार ने गरीब और भूमिहीन लोगों के पुनर्वास की कोई ठोस योजना नहीं बनाई।
संसद से दूरी पर बढ़ा विवाद
चुनाव प्रचार के दौरान बालेन शाह ने पारदर्शिता और जवाबदेही की बात की थी, लेकिन प्रधानमंत्री बनने के बाद उनका सार्वजनिक संवाद बेहद सीमित रहा है।
रिपोर्ट के मुताबिक उन्होंने अब तक राष्ट्र को संबोधित नहीं किया, कोई प्रेस कॉन्फ्रेंस नहीं की, संसद की कई बैठकों से अनुपस्थित रहे और राष्ट्रपति के अभिभाषण के दौरान बीच में ही बाहर चले गए।
विपक्ष लगातार मांग कर रहा है कि प्रधानमंत्री संसद में आकर सवालों का जवाब दें। यहां तक कि उनकी अपनी पार्टी Rashtriya Swatantra Party के नेताओं ने भी उनकी गैरमौजूदगी पर सवाल उठाए।
एक सांसद ने तो यहां तक कहा कि नेपाल की राजनीति “पाकिस्तान मॉडल” जैसी होती जा रही है, जहां कार्यपालिका संसद के प्रति जवाबदेह नहीं रहती।
बालेन समर्थकों का तर्क है कि पुराने प्रधानमंत्री संसद में लंबे भाषण तो देते थे, लेकिन जमीन पर काम नहीं करते थे। उनके मुताबिक बालेन 'कम बोलो, ज्यादा काम करो' की राजनीति कर रहे हैं।
हालांकि आलोचकों का कहना है कि संसदीय लोकतंत्र में प्रधानमंत्री का संसद में मौजूद रहना संवैधानिक जिम्मेदारी भी है।
भारत-नेपाल सीमा पर भी बढ़ा विवाद
बालेन सरकार का एक और फैसला विवादों में है। भारत से आने वाले सामान पर सख्त कस्टम ड्यूटी लागू करना।
नेपाल ने नियम लागू किया है कि 100 नेपाली रुपये से ज्यादा के भारतीय सामान पर अनिवार्य कस्टम ड्यूटी लगेगी। अलग-अलग उत्पादों पर 5% से 80% तक टैक्स लगाया जाएगा।
नेपाल के सीमावर्ती इलाकों में रहने वाले लोग दशकों से भारत से रोजमर्रा का सामान खरीदते रहे हैं। लेकिन अब सख्त जांच और टैक्स वसूली से लोगों में नाराजगी बढ़ गई है। प्रदर्शनकारियों का कहना है कि यह अनौपचारिक नाकेबंदी जैसा महसूस हो रहा है।
रिपोर्ट्स के अनुसार, बालेन शाह ने फैसला किया है कि वे कम से कम एक साल तक किसी विदेश दौरे पर नहीं जाएंगे। साथ ही वे केवल मंत्री स्तर या उससे ऊपर के विदेशी प्रतिनिधियों से ही मुलाकात करेंगे।
क्या Gen-Z का भरोसा टूटने लगा है?
बालेन शाह की जीत नेपाल में युवा राजनीति के उभार का प्रतीक मानी गई थी। लोगों को उम्मीद थी कि वे पारंपरिक राजनीतिक व्यवस्था को बदल देंगे। लेकिन सत्ता में आने के सिर्फ दो महीने बाद ही सवाल उठने लगे हैं।
- क्या बालेन प्रशासनिक अनुभव की कमी से जूझ रहे हैं?
- क्या उनकी सरकार ज्यादा केंद्रीकृत होती जा रही है?
- क्या तेज फैसलों के बीच कानूनी प्रक्रियाओं की अनदेखी हो रही है?
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