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AI और वेबसाइट के बीच छिड़ा 'डिजिटल युद्ध'... जानकारियों की होने वाली है किल्लत, आप पर कैसे पड़ेगा असर?

Updated: Tue, 01 Sep 2026 10:34 AM (IST)

इंटरनेट पर AI के बढ़ते इस्तेमाल से वेबसाइटों का ट्रैफिक घट रहा है, जिससे विज्ञापन से होने वाली कमाई पर ...और पढ़ें

आने वाले समय में इंटरनेट पर हो सकता है जानकारियों का अभाव। (प्रतीकात्मक तस्वीर।)

आने वाले समय में इंटरनेट पर हो सकता है जानकारियों का अभाव। (प्रतीकात्मक तस्वीर।)

HighLights

  1. AI से सीधे जवाब मिलने से वेबसाइट ट्रैफिक घटा।

  2. वेबसाइटें AI क्रॉलर्स को जानकारी लेने से रोक रही हैं।

  3. "गूगल जीरो" से इंटरनेट व्यवस्था में बदलाव की आशंका।

मेलबर्न, द कन्वर्सेशन। इंटरनेट पर किसी जानकारी की तलाश में अब लोग पहले की तरह वेबसाइटों पर जाने के बजाय आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) से सीधे सवाल पूछ रहे हैं। कुछ सेकंड में जवाब मिल जाता है और कई बार वेबसाइट खोलने की जरूरत भी नहीं पड़ती। लेकिन सुविधा का यह बढ़ता चलन इंटरनेट की उस व्यवस्था के लिए परेशानी पैदा कर रहा है, जिस पर पिछले करीब तीन दशक से वेबसाइटें और सर्च इंजन टिके हुए हैं।

एआई टूल जैसे चैटजीपीटी और गूगल के एआई फीचर बड़ी संख्या में वेबसाइटों से जानकारी लेकर अपने जवाब तैयार करते हैं। समस्या यह है कि जब यूजर को जवाब सीधे एआई से मिल जाता है तो वह मूल वेबसाइट पर क्लिक नहीं करता। इससे वेबसाइटों का ट्रैफिक घटता है और विज्ञापन से होने वाली कमाई पर भी असर पड़ता है।

टूट रहा है इंटरनेट का पुराना समझौता

नतीजा यह है कि कई वेबसाइट संचालक अब एआई कंपनियों के क्रालर को साइट से जानकारी लेने से रोक रहे हैं। यानी जिस वेबसाइट की जानकारी से एआई जवाब देना सीखता है, वही वेबसाइट एआई से दूरी बनाने लगी है।

इंटरनेट के शुरुआती दौर में सर्च इंजन और वेबसाइटों के बीच एक तरह का अनकहा समझौता था। सर्च इंजन वेबसाइटों की जानकारी को खोजकर अपने नतीजों में दिखाते थे और बदले में यूजर को उस वेबसाइट का लिंक देते थे। इससे वेबसाइट को पाठक और विज्ञापन के जरिए कमाई मिलती थी। एआई के आने से यह व्यवस्था बदल रही है।

एआई किसी वेबसाइट की जानकारी पढ़कर उसका सार सीधे यूजर को बता देता है। ऐसे में बसाइट तक पहुंचने की जरूरत कम हो जाती है। वेबसाइट संचालकों के लिए यही सबसे बड़ी चिंता है। उनका तर्क है कि अगर लोग वेबसाइट पर आएंगे ही नहीं तो अच्छी और भरोसेमंद सामग्री तैयार करने का खर्च कैसे निकलेगा।

एआई के बढ़ते इस्तेमाल से बढ़ी चिंता

इंटरनेट पर एआई से जुड़े बाट और क्रालर अब बड़ी मात्रा में वेबसाइटों की जानकारी खंगाल रहे हैं। क्लाउडफ्लेयर के अनुमान के मुताबिक वेब ट्रैफिक में एआई बाट्स की हिस्सेदारी अब काफी बढ़ चुकी है। इसका एक दूसरा असर भी सामने आ रहा है।

जब अच्छी वेबसाइटें एआई क्रालर को रोकेंगी और कम भरोसेमंद वेबसाइटें उन्हें खुला छोड़ देंगी तो एआई को मिलने वाली जानकारी का संतुलन बिगड़ सकता है। ऐसे में एआई के जवाबों में बेहतर स्रोतों की जगह कम गुणवत्ता वाली वेबसाइटों की जानकारी बढ़ने का खतरा है।

"गूगल जीरो" की आशंका

सर्च की दुनिया में अब एक नए खतरे की चर्चा हो रही है, जिसे "गूगल जीरो" कहा जा रहा है। इसका मतलब है ऐसी स्थिति, जब लोग गूगल पर खोज करने के बाद वेबसाइट खोलने के बजाय गूगल के एआई से मिले जवाब को ही पर्याप्त मान लें। एआई से सीधे जवाब मिलना यूजर के लिए सुविधाजनक है। लेकिन इसका दूसरा पहलू यह है कि वेबसाइटों को मिलने वाला ट्रैफिक कम होता जाता है।

विकिपीडिया पर हुए एक अध्ययन में भी एआई आधारित सारांश शुरू होने के बाद कुछ भाषाओं के ट्रैफिक में गिरावट देखी गई। अगर यही रुझान बढ़ता है तो खबरों, शोध, विशेषज्ञों व वेबसाइटों के लिए लोगों तक पहुंचना और उससे कमाई करना मुश्किल हो सकता है।

आम यूजर के लिए क्या बदलेगा?

इस पूरी बहस का महत्वपूर्ण सवाल यही है कि इसका असर आम इंटरनेट यूजर पर क्या पड़ेगा। एआई से मिलने वाले जवाब तेज और सुविधाजनक हैं, लेकिन हर जवाब सही हो, यह जरूरी नहीं।

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