विज्ञापन हटाएंसिर्फ खबर पढ़ें

काबुल, कश्मीर से मुंबई और पहलगाम तक... हाफिज सईद ने कैसे फैलाया आतंक का खूनी नेटवर्क

Updated: Sun, 30 Aug 2026 10:08 PM (IST)

लश्कर-ए-तैयबा के संस्थापक हाफिज सईद के खिलाफ पहलगाम आतंकी हमले और 26/11 मुंबई हमलों में कानूनी कार्रवाई तेज हो गई है।

आतंकी हाफिज सईद का कैसा रहा है चार दशक का खूनी सफर(फाइल फोटो)

आतंकी हाफिज सईद का कैसा रहा है चार दशक का खूनी सफर(फाइल फोटो)

timer icon

समय कम है?

जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में

संक्षेप में पढ़ें

डिजिटल डेस्क, इस्लामाबाद। लश्कर-ए-तैयबा के संस्थापक हाफिज मुहम्मद सईद के खिलाफ भारत में कानूनी मामले ने एक नया मोड़ ले लिया है। जुलाई 2026 में राष्ट्रीय जांच एजेंसी(एएनआई) ने पहलगाम आतंकी हमले के मामले में सप्लीमेंट्री चार्जशीट में सईद का नाम शामिल किया।

उस पर व्यक्तिगत रूप से और लश्कर-ए-तैयबा एवं उसके प्रॉक्सी संगठन द रेजिस्टेंस फ्रंट (टीआरएफ) के संस्थापक और प्रमुख के रूप में आरोप लगाए गए हैं। NIA ने 22 अप्रैल, 2025 को हुए इस हमले के पीछे सीमा पार की साजिश का जिक्र किया है, जिसमें 26 नागरिकों की जान गई थी। इसके बाद विशेष एनआईए अदालत ने सईद के खिलाफ गैर-जमानती वारंट जारी किया।

मुकदमा चलाने की कार्यवाही शुरू

इसी बीच, मुंबई पुलिस ने 2008 के मुंबई आतंकी हमलों (26/11) में सईद और पाकिस्तान में रह रहे पांच अन्य आरोपियों के खिलाफ इन एब्सेंशिया में मुकदमा चलाने की कार्यवाही शुरू कर दी है। इस सूची में सईद, लश्कर का ऑपरेशंस चीफ जकी-उर-रहमान लखवी, साजिद मीर, अबू अलकामा, असीम उर्फ अबू काहाफा और मेजर अब्दुर रहमान पाशा शामिल हैं।

पुलिस ने इंटरपोल के माध्यम से उद्घोषणा आदेश तामील कराने के लिए केंद्रीय गृह मंत्रालय से भी संपर्क किया है। 17 साल के अंतराल वाले ये दोनों मामले लश्कर के इतिहास के विभिन्न चरणों को एक साथ लाते हैं। लेकिन लश्कर की शुरुआत न तो कश्मीर में हुई थी और न ही हाफिज सईद वहां एक उग्रवादी नेता के रूप में उभरा था।

अफगान जिहाद से पहलगाम तक का सफर

लश्कर-ए-तैयबा के चार दशक के इतिहास को बदलते युद्धक्षेत्रों और संगठनात्मक ढांचे के रूप में देखा जा सकता है। अफगान जिहाद के दौरान पड़ी इसकी नींव, कश्मीर में इसका विस्तार और जमात-उद-दावा के रूप में इसके छद्म अस्तित्व ने इसे लगातार बचाए रखा। मुंबई हमलों ने साबित किया कि यह नेटवर्क कश्मीर से बाहर भी भयंकर तबाही मचा सकता है।

अब पहलगाम जांच ने कहानी को वापस उसी क्षेत्र में ला दिया है जहां लश्कर ने अपनी शुरुआती पहचान बनाई थी। सईद के खिलाफ हालिया कानूनी कार्यवाही उस लंबे इतिहास का परिणाम है, जिसकी शुरुआत मुंबई या पहलगाम से नहीं, बल्कि 1980 के दशक के अफगान जिहाद से हुई थी।

कैसे पड़ा लश्कर-ए-तैयबा की नींव?

1979 में अफगानिस्तान पर सोवियत संघ के आक्रमण ने ऐसा माहौल बनाया जिसमें पाकिस्तान और मुस्लिम दुनिया के अन्य हिस्सों से इस्लामी नेटवर्क तेजी से फले-फूले। फिलिस्तीनी विद्वान अब्दुल्ला आजम ने विदेशी स्वयंसेवकों को अफगान जिहाद के लिए एकजुट किया। इसी दौरान, आजम ने सऊदी अरब में पढ़े पाकिस्तानी सुन्नी विद्वान हाफिज सईद के साथ काम किया।

दोनों ने मिलकर मरकज-उद-दावा-वल-इरशाद (एमडीआई) की स्थापना की, जो जिहाद के समर्थन के साथ-साथ धार्मिक प्रचार का काम करता था। MDI ने अफगानिस्तान में अपने प्रशिक्षण ढांचे विकसित किए और 1980 के दशक के अंत में लश्कर-ए-तैयबा इसी नेटवर्क की सैन्य शाखा के रूप में उभरा।

अफगान जिहाद ने ही इस संगठन को शुरुआती वैचारिक, मानव संसाधन और प्रशिक्षण का बुनियादी ढांचा प्रदान किया।

लश्कर-ए-तैयबा की स्थापना क्यों की गई?

लश्कर का शुरुआती उद्देश्य अफगान जिहाद में भाग लेना और कश्मीर और भारत में जिहाद के लिए तैयारी करना था। इसका लक्ष्य अफगान युद्ध के अनुभव को कश्मीर और भारत में लागू करना था, जिसमें अफगान मुजाहिदीन के साथ कश्मीरियों को प्रशिक्षित करना भी शामिल था। जब सोवियत सेनाओं ने अफगानिस्तान से वापसी की, तो परिस्थितियां बदल गईं।

हजारों उग्रवादियों को एक साथ लाने वाला युद्धक्षेत्र अब पहले जैसा नहीं रहा था। वहीं दूसरी तरफ, जम्मू-कश्मीर में हिंसा तेजी से बढ़ रही थी। इसलिए, सोवियत वापसी के बाद कश्मीर वह अगला बड़ा क्षेत्र बन गया जहां संगठन अपने लड़ाकों, प्रशिक्षण और नेटवर्क का इस्तेमाल कर सकता था।

कुनार से कश्मीर तक का सफर

कश्मीर की ओर यह बदलाव वहां तेजी से बढ़ रहे उग्रवाद के साथ मेल खाता था। 1988 से 1990 के बीच कश्मीर में हिंसा की घटनाएं कई गुना बढ़ गईं। इस पृष्ठभूमि में, सईद के संगठन ने कश्मीर और उसके आसपास अपना बुनियादी ढांचा स्थापित करना शुरू कर दिया, जबकि पाकिस्तान और अफगानिस्तान में इसके प्रशिक्षण केंद्र मौजूद थे।

1990 के दशक तक, कश्मीर लश्कर का मुख्य ऑपरेशनल थियेटर बन चुका था। संगठन ने भर्ती नेटवर्क विकसित किया और भारतीय सुरक्षा बलों पर हमलों को तेज कर दिया। लश्कर के अल कायदा और अन्य जिहादी समूहों के साथ संबंध विकसित हुए, लेकिन उसका मुख्य फोकस भारत और कश्मीर ही रहा।

हाफिज सईद का एक मौलवी से आतंकी बनने तक

MDI और लश्कर के संस्थागत विकास के साथ-साथ हाफिज सईद का प्रभाव भी बढ़ता गया। वह केवल एक सशस्त्र संगठन का नेता नहीं था। उसके नेटवर्क ने धार्मिक प्रचार, शिक्षा, धर्मार्थ कार्यों और आतंकी गतिविधियों को एक साथ जोड़ दिया था। लश्कर का भर्ती आधार पाकिस्तानी समाज से गहराई से जुड़ा था।

इसके लड़ाके मुख्य रूप से पंजाब प्रांत से आते थे और कई भर्ती केंद्र पाकिस्तानी सेना और आईएसआई के समान समुदायों से जुड़े थे। हालांकि लश्कर को सरकारी समर्थन मिलने के मुद्दे पर विवाद रहा है, लेकिन पाकिस्तान के सुरक्षा प्रतिष्ठान के साथ इसके संबंध इसके इतिहास का एक अहम हिस्सा बन गए।

9/11 के बाद प्रतिबंध से कैसे बचा लश्कर

11 सितंबर 2001 के हमलों ने पाकिस्तान से संचालित आतंकी संगठनों के लिए माहौल बदल दिया। अमेरिका ने दिसंबर 2001 में लश्कर को विदेशी आतंकी संगठन घोषित किया और जनवरी 2002 में पाकिस्तान ने इस पर प्रतिबंध लगा दिया। हालांकि, इस प्रतिबंध ने नेटवर्क को खत्म नहीं किया।

हाफिज सईद ने संगठन का नाम बदलकर जमात-उद-दावा कर दिया और मानवीय गतिविधियों की आड़ में अपना काम जारी रखा। लाहौर के पास मुरीदके में उनका एक विशाल परिसर चलता रहा, जिसमें स्कूल, कारखाने और मस्जिद शामिल थे। इस ढांचे ने प्रतिबंध के बावजूद संगठन को एक मजबूत आधार प्रदान किया।

कश्मीर उग्रवाद से मुंबई हमलों तक

2001 के बाद के वर्षों में लश्कर की पहुंच पारंपरिक कश्मीर युद्धक्षेत्र से कहीं आगे निकल गई। संगठन ने नई दिल्ली में और 2001 के संसद हमले जैसी घटनाओं को अंजाम दिया। लेकिन 2008 के मुंबई हमले इस विस्तार का सबसे खतरनाक रूप थे।

26 से 29 नवंबर के बीच दस हमलावरों ने मुंबई में समन्वित हमले किए, जिसमें 166 लोग मारे गए। इन हमलों ने साबित किया कि लश्कर अपने पारंपरिक क्षेत्र से बहुत दूर एक जटिल और बड़े हमले की योजना बनाने और उसे अंजाम देने की क्षमता रखता है।

अफगानिस्तान नेटवर्क का हिस्सा क्यों बना रहा?

कश्मीर की ओर रुख करने का मतलब यह नहीं था कि अफगानिस्तान में लश्कर की संलिप्तता खत्म हो गई। ये दोनों क्षेत्र ओवरलैपिंग आतंकी नेटवर्कों के माध्यम से जुड़े रहे। लश्कर अफगानिस्तान में सक्रिय रहा और अफगान तालिबान व हक्कानी नेटवर्क के साथ इसके ऑपरेशनल संबंध बढ़ते गए।

अफगानिस्तान लश्कर के नेटवर्क का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बना रहा। अफगान जिहाद के दौरान बने इसके संबंध, प्रशिक्षण का माहौल और बुनियादी ढांचा अन्य आतंकी संगठनों के साथ इसकी कड़ियां जोड़ता रहा।

हाफिज सईद का कानूनी इतिहास

सईद का कानूनी इतिहास यह दर्शाता है कि लश्कर के खिलाफ पाकिस्तान की औपचारिक कार्रवाई और संगठन के जमीनी अस्तित्व में कितना बड़ा अंतर है। टेरर-फंडिंग के आरोप में पाकिस्तान ने 2019 में सईद को गिरफ्तार किया था और फिलहाल वह 78 साल की कुल सजा काट रहा है। दूसरी ओर, भारत बड़े आतंकी हमलों में उसकी संलिप्तता को लेकर अपनी कानूनी लड़ाई जारी रखे हुए है।

एनआईए की हालिया चार्जशीट में सईद को अप्रैल 2025 में हुए पहलगाम हमले की साजिश का हिस्सा बताया गया है। इसी के चलते उसके खिलाफ गैर-जमानती वारंट जारी हुआ है और मुंबई पुलिस ने 26/11 मामले में उस पर इन-एब्सेंशिया मुकदमा शुरू करने की प्रक्रिया बढ़ा दी है।

यह भी पढ़ें- हाफिज सईद समेत कई आतंकियों के खिलाफ चलेगा मुकदमा, पुलिस ने गृह मंत्रालय से मांगी इजाजत

यह भी पढ़ें- 'हाफिज सईद ने कश्मीर भेजे थे 10 हजार आतंकी', लश्कर के मंच से मौलाना ने उगला भारत के खिलाफ जहर