माफी मांगने का मनोविज्ञान: अंग्रेजी में 'सॉरी' कहना आसान है, फिर अपनी मातृभाषा में कहना क्यों मुश्किल?
अंग्रेजी में 'सॉरी' कहना हिंदी में माफी मांगने से आसान क्यों लगता है? इसका कारण मातृभाषा से गहरा भावनात्मक जुड़ाव ...और पढ़ें
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एआई से बनाई गई सांकेतिक तस्वीर।
HighLights
अंग्रेजी में 'सॉरी' कहना हिंदी में माफी से आसान।
मातृभाषा से गहरा भावनात्मक जुड़ाव अपराधबोध बढ़ाता है।
दूसरी भाषा भावनात्मक दूरी बनाकर सहजता महसूस कराती है।
डिजिटल डेस्क, लंदन। आपने गौर किया होगा कि कोई गलती हो जाने पर हम अंग्रेजी में बड़ी आसानी से सॉरी कहकर मामले को हल्का कर लेते हैं, लेकिन हिंदी में क्षमाप्रार्थी या माफी मांगना हमें भारी लगता है। इसके पीछे भाषा का मनोविज्ञान होता है, जो हमें अपनी मातृभाषा की बजाय अन्य भाषा में ज्यादा सहज महसूस कराता है।
कई बार गलती बड़ी हो, तब भी अंग्रेजी का यह छोटा-सा वाक्य बोलना हमें सहज लगता है। क्या यह सिर्फ भाषा और उसके इस्तेमाल का फर्क है, या इसके पीछे हमारे दिमाग और भावनाओं का भी कोई खेल है?
भाषा केवल शब्दों का संग्रह नहीं
दरअसल, भाषा केवल शब्दों का संग्रह नहीं होती। जिस भाषा में हम बड़े होते हैं, उसके शब्द हमारे बचपन, परिवार, रिश्तों, सामाजिक अनुभवों और नैतिक समझ से गहराई से जुड़े होते हैं।
इसलिए अपनी पहली भाषा में किसी गलती को स्वीकार करना कई बार सिर्फ एक वाक्य बोलना नहीं रह जाता। उसके साथ अपराधबोध, शर्म, जिम्मेदारी और सामने वाले के साथ रिश्ते का पूरा भाव जुड़ जाता है।
भावनात्मक दूरी कैसे बनती है?
इसके उलट दूसरी भाषा में वही बात कहने पर कुछ भावनात्मक दूरी बन सकती है। खासकर वह भाषा जिसे हमने बाद में स्कूल, कालेज या कामकाज के दौरान सीखा हो, उसके शब्द हमारे शुरुआती जीवन के भावनात्मक अनुभवों से उतने गहरे जुड़े नहीं होते। इसलिए “आई एम सॉरी” कई बार “मुझे माफ कर दीजिए” की तुलना में हल्का, सहज और कम बोझिल महसूस हो सकता है।
हालांकि, इसका मतलब यह नहीं कि विदेशी भाषा में हमें अपराधबोध या शर्म कम महसूस होती है। शोध में सामान्य तौर पर लोगों ने दूसरी भाषा में भी मजबूत नैतिक भावनाएं महसूस कीं। फर्क खास तौर पर उन परिस्थितियों में दिखाई देता है, जहां सामने वाला व्यक्ति सामाजिक रूप से ऊंचे पद पर हो, जैसे प्रोफेसर। ऐसे मामलों में अंग्रेजी भाषा में अपराधबोध और शर्म ज्यादा तीव्रता से व्यक्त होती है।
यानी मामला सिर्फ इतना नहीं कि अंग्रेजी में ‘सॉरी’ आसान है और हिंदी में माफी मुश्किल। असली सवाल यह है कि हमारी मातृभाषा के शब्द हमारे भीतर कितनी गहरी सामाजिक और भावनात्मक प्रतिक्रियाएं पैदा करते हैं।‘सारी’ कहने से हम कभी-कभी गलती को स्वीकार तो करते हैं, लेकिन उससे पैदा हुए भावनात्मक बोझ से थोड़ा दूर भी रह पाते हैं।
भाषा सीखने के मायने क्या?
वहीं अपनी भाषा में “मैंने गलती की, मुझे माफ कर दीजिए” कहना उस गलती को ज्यादा सीधे अपने सामने खड़ा कर देता है। इसीलिए भाषा सीखना केवल नए शब्द और व्याकरण सीखना नहीं है। दूसरी भाषा में यह भी सीखना पड़ता है कि माफी किससे, कब और किस भाव के साथ मांगनी है।
क्योंकि एक ही वाक्य अलग भाषाओं में अलग भावनात्मक वजन रख सकता है। शायद यही वजह है कि कभी-कभी अंग्रेजी का “सारी” सिर्फ माफी नहीं, भावनात्मक दूरी का एक छोटा-सा रास्ता भी बन जाता है।
