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    छात्र नेता से ब्रिटेन के पीएम तक... दो बड़ी हार के बाद एंडी बर्नहम ने कैसे पलटी अपनी किस्मत? बढ़ी रोचक है इनकी कहानी

    By Shubham KumarEdited By: Shubham Kumar
    Updated: Fri, 17 Jul 2026 08:31 PM (IST)

    एंडी बर्नहम ब्रिटेन के अगले प्रधानमंत्री बनने जा रहे हैं, जो पिछले एक दशक में सातवें पीएम होंगे और बिना आम चुनाव के सत्ता संभालेंगे। 'किंग ऑफ द नॉर्थ' ...और पढ़ें

    'किंग ऑफ द नॉर्थ' के नाम से मशहूर एंडी बर्नहम।

    'किंग ऑफ द नॉर्थ' के नाम से मशहूर एंडी बर्नहम।

    HighLights

    1. एंडी बर्नहम ब्रिटेन के सातवें प्रधानमंत्री बने, 10 साल में।

    2. बिना आम चुनाव के पीएम बने, वैधता साबित करने की चुनौती।

    3. 'किंग ऑफ द नॉर्थ' नाम से मशहूर, मैनचेस्टर मॉडल के जनक।

    डिजिटल डेस्क, लंदन। ब्रिटेन की सियासत में सोमवार को एक नया इतिहास दर्ज होने जा रहा है। 'किंग ऑफ द नॉर्थ' के नाम से मशहूर एंडी बर्नहम यूनाइटेड किंगडम के अगले प्रधानमंत्री के रूप में देश की कमान संभालेंगे। बीते एक दशक से राजनीतिक अस्थिरता और अंदरूनी कलह से जूझ रहे ब्रिटेन के लिए यह नेतृत्व परिवर्तन बेहद असाधारण है।

    बीते दस सालों में ब्रिटिश जनता छह प्रधानमंत्रियों का कार्यकाल देख चुकी है, और अब सोमवार को बर्नहम इस कुर्सी पर बैठने वाले सातवें राष्ट्रप्रमुख होंगे। ऐसे में लगातार बदलते चेहरों और टूटते जनादेशों के बीच, बिना किसी बड़े अंदरूनी विरोध के एंडी बर्नहम का इस तरह सत्ता के शीर्ष पर पहुंचना किसी बड़े राजनीतिक चमत्कार से कम नहीं माना जा रहा है।

    जानकारों का मानना है कि जनता के अविश्वास से घिरे ब्रिटेन को इस समय एक स्थिर विजन की जरूरत है। ऐसे में यह देखना दिलचस्प होगा कि मैनचेस्टर की जमीन से उठकर लंदन के 10 डाउनिंग स्ट्रीट तक का सफर तय करने वाले बर्नहम इस कांटों भरे ताज को कैसे संभालते हैं।

    Andy Burnham

    पहले जानते हैं कौन हैं एंडी बर्नहम?

    56 वर्षीय एंडी बर्नहम का जन्म इंग्लैंड के मर्सीसाइड क्षेत्र में हुआ। उन्होंने कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी से शिक्षा हासिल की। छात्र जीवन के दौरान उन्हें अक्सर लगता था कि वे प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय की संस्कृति में खुद को फिट नहीं कर पा रहे हैं। बाद में यही अनुभव उनकी राजनीति का आधार बना, जिसमें उन्होंने आम और कामकाजी वर्ग की आवाज बनने की कोशिश की।

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    'विवाद' और 'बेईमानी' के साथ राजनीति में रखा कदम

    साल था 1987 की गर्मियों का, ब्रिटेन में मार्गरेट थैचर की आंधी थी। इसी दौरान मर्सीसाइड के एक स्कूल में छात्रों का 'मॉक इलेक्शन' चल रहा था। 17 साल के एंडी बर्नहम लेबर पार्टी के कैंडिडेट थे। उनके पूर्व इंग्लिश टीचर स्टीव हैरिंगटन ने सालों बाद एक बड़ा राज खोला कि बर्नहम के सामने कंजर्वेटिव पार्टी का एक बेहद शरीफ लड़का चुनाव लड़ रहा था।

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    बर्नहम ने स्टेज पर आकर बेहद दमदार भाषण दिया। लेकिन जैसे ही उस दूसरे शरीफ लड़के की बारी आई, बर्नहम के कट्टर समर्थकों ने बर्नहम को कानों-कान खबर दिए बिना माइक का प्लग ही उखाड़ दिया। विपक्षी चिल्लाता रहा, पर उसकी आवाज किसी तक नहीं पहुंची।

    नतीजा? बर्नहम 'लैंडस्लाइड' बहुमत से जीत गए। हालांकि वो इलाका लेबर पार्टी का गढ़ था, बर्नहम वैसे भी जीतते, लेकिन उनकी सियासी जिंदगी का पहला चुनाव ही एक 'विवाद' और 'बेईमानी' के साए में हुआ था। ऐसे में ये कहना गलत नहीं होगा कि आज इतिहास खुद को दोहरा रहा है, आज भी बर्नहम बिना किसी आम चुनाव के सीधे पीएम की कुर्सी पर बैठ गए हैं।

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    हमेशा सवालों में रहा बर्नहम का असली चेहरा?

    लंदन के राजनीतिक गलियारों में बर्नहम की छवि एक ऐसे नेता की रही है जो हवा का रुख देखकर बदल जाता है। कुल मिलाकर उनको लेकर दो विचार खूब सुने जाते हैं। बर्नहम के विरोधी अक्सर उन्हें 'बिना सिद्धांतों का नेता' या 'कैप्टन फ्लिप-फ्लॉप' होने का आरोप लगाते रहे हैं। इसके इतर उनके करीबियों का मानना है कि 56 वर्षीय बर्नहम के विचारों में हमेशा एक निरंतरता रही है।

    कितना मुश्किल रहा पीएम तक का सफर?

    अच्छा, इस बात में भी कोई दोहराई नहीं है कि बर्नहम का प्रधानमंत्री की कुर्सी तक पहुंचने का सफर आसान नहीं रहा है। वे दो बार लेबर पार्टी के नेतृत्व का चुनाव बुरी तरह हारे। पहली बार 2010 में। एड और डेविड मिलिबैंड के बीच की लड़ाई में बर्नहम भी कूद पड़े थे। ग्लासगो के एक कार पार्क में उनके कैंपेन के लिए एक बस लाई गई।

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    ऐन वक्त पर पता चला कि बस पर जो स्टिकर चिपका है, उसमें बर्नहम के नाम से 'N' गायब है (Burham)। कार्यकर्ता उस गलती को छिपाने के लिए बस के आगे खड़े हो गए, लेकिन हड़बड़ी में वे यह देखना भूल गए कि बर्नहम जिस 'Defend the NHS' के नारे के आगे खड़े थे, उनके शरीर की वजह से वो नारा कटकर 'End the NHS' (NHS को खत्म करो) दिखने लगा था।

    दूसरी बार जब 2015 में मिली थी हार 

    इस बात में कोई दोहराई नहीं है कि 2015 में बर्नहम जीत के सबसे बड़े दावेदार थे, लेकिन वामपंथी जेरेमी कॉर्बिन ने आकर पूरी बाजी पलट दी। जानकार बताते हैं कि हार के बाद बर्नहम लंदन के एक मामूली से पब में उदास बैठे सूखा खाना चबा रहे थे। तब लेबर पीयर चार्ली फाल्कनर ने उनके कंधे पर हाथ रखकर कहा था कि चिंता मत करो एंडी, हमेशा तीसरा मौका होता है और शायग अब वो 'तीसरा मौका' आ गया है।

    क्या बर्नहम खेलेंगे 'अर्ली इलेक्शन' का दांव?

    अच्छा, इस वक्त डाउनिंग स्ट्रीट में बर्नहम के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपनी लेजिटिमेसी साबित करने की है। इसमें कोई दोहराई नहीं है कि बिना जनता के सीधे वोट के प्रधानमंत्री बनने का ठप्पा उन पर लगा हुआ है।

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    उनके मेंटर और पूर्व गृह मंत्री डेविड ब्लंकेट ने उन्हें सलाह दी है कि जल्दबाजी में कुछ मत करो। अभी शांत रहो, पतझड़ तक का समय लो, अपनी नई कैबिनेट बनाओ और फिर अपना एजेंडा देश के सामने रखो। हालांकि बर्नहम के बेहद करीबी दोस्तों का मानना है कि बर्नहम इस 'बिना जनादेश वाले पीएम' के ताने को लंबे समय तक बर्दाश्त नहीं करेंगे।

    ब्रिटेन में जल्द हो सकता है आम चुनाव

    ऐसे में अंदर की खबर यह है कि बर्नहम बहुत जल्द देश में एक स्नैप जनरल इलेक्शन (समय से पहले आम चुनाव) की घोषणा कर सकते हैं। इसका बड़ा कारण है कि बर्नहम को किंगमेकर्स की बैकिंग नहीं, बल्कि सीधे देश की जनता का 'मैंडेट' चाहिए।

    अब समझिए 'किंग ऑफ द नॉर्थ' कैसे बने?

    बता दें कि 2017 से ग्रेटर मैनचेस्टर के मेयर के रूप में बर्नहम ने परिवहन, आवास, स्वास्थ्य और क्षेत्रीय विकास पर काम किया। कोविड-19 महामारी के दौरान उन्होंने लंदन स्थित केंद्रीय सरकार के खिलाफ उत्तरी इंग्लैंड के हितों की जोरदार वकालत की। इसी दौर में उन्हें 'किंग ऑफ द नॉर्थ' कहा जाने लगा।

    मैनचेस्टर मॉडल की सफलता भी जानिए

    बर्नहम की सबसे बड़ी राजनीतिक उपलब्धि मैनचेस्टर मॉडल को माना जाता है। उनके नेतृत्व में ग्रेटर मैनचेस्टर की अर्थव्यवस्था में उल्लेखनीय वृद्धि हुई। उन्होंने सार्वजनिक और निजी निवेश को जोड़कर शहरी पुनर्विकास, सार्वजनिक परिवहन और किफायती आवास परियोजनाओं को बढ़ावा दिया।

    बर्नहम के सामने सबसे बड़ी चुनौतियां

    प्रधानमंत्री के रूप में एंडी बर्नहम को कई कठिन चुनौतियों का सामना करना होगा। इसमें धीमी आर्थिक वृद्धि, बढ़ता राजनीतिक ध्रुवीकरण, आव्रजन और शरणार्थी संकट, सार्वजनिक सेवाओं पर दबाव, लेबर पार्टी के घटते जनाधार को मजबूत करने जैसी चुनौतियां शामिल है। ऐसे में विशेषज्ञों का मानना है कि उनके पास अगले आम चुनाव से पहले अपनी नीतियों को सफल साबित करने के लिए सीमित समय होगा।

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    ब्रिटेन और बर्नहम का मेल, एक नजर 

    गौरतलब है कि लेबर पार्टी के नवनिर्वाचित नेता बर्नहम का पूरा नाम एंड्रयू मरे बर्नहम है और उनकी उम्र 56 वर्ष है। इंग्लैंड के मर्सीसाइड में जन्मे बर्नहम ने दुनिया की प्रतिष्ठित कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी से अपनी शिक्षा पूरी की है।

    राजनीतिक अनुभव के मामले में बर्नहम का कद बेहद मजबूत रहा है। वे ब्रिटिश सरकार में स्वास्थ्य मंत्री और संस्कृति मंत्री जैसे अहम कैबिनेट पदों पर रह चुके हैं। इसके अलावा, ग्रेटर मैनचेस्टर के मेयर के रूप में उनके काम और उनके कड़े तेवरों ने उन्हें पूरे देश में बेहद लोकप्रिय बनाया।

    इसमें सत्ता का विकेंद्रीकरण, क्षेत्रीय विकास और बिजली-पानी जैसी सार्वजनिक सेवाओं में बड़े सुधार करना उनके प्रमुख एजेंडे में शामिल हैं। वर्तमान में वे लेबर पार्टी के सर्वोच्च नेता हैं और अब ब्रिटेन को इस गहरे राजनीतिक और आर्थिक संकट से बाहर निकालने की जिम्मेदारी उनके कंधों पर है।