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    पूर्वी चंपारण में दिव्य दृश्य: विराट रामायण मंदिर में विराजेंगे महादेव, रचेगा आस्था का नया अध्याय

    By Sanjay K Upadhyay Edited By: Dharmendra Singh
    Updated: Fri, 16 Jan 2026 04:03 PM (IST)

    Virat Ramayan Temple: पूर्वी चंपारण के कैथवलिया में विराट रामायण मंदिर परिसर में विश्व के सबसे बड़े 33 फीट ऊंचे सहस्त्रलिंगम की स्थापना पूजा नरक निवार ...और पढ़ें

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    विराट रामायण मंदिर का प्रारूप। 

    स्मार्ट व्यू- पूरी खबर, कम शब्दों में

    संजय कुमार उपाध्याय, मोतिहारी (पूर्वी चंपारण) । Janaki Nagar Motihari : हर घर मंगल है। हर आंगन में मंगल गीत है। हर मन आदि अनंत शिव के मंत्र संग आस्था के सागर में डूबा है।

    जन मन इस सत्य से आह्लादित है कि जिस तिथि को स्वयंभू महादेव के शिवलिंग की उत्पति हुई मानी जाती है, उसी तिथि नरक निवारण चतुर्दशी यानी शनिवार को पूर्वी चंपारण के कल्याणपुर प्रखंड के कैथवलिया स्थित जानकी नगर में सहस्त्रलिंगम की स्थापना पूजा होगी। देवाधिदेव स्वयं के लिए बने आधार पीठ पर विराजेंगे।

    यह वह अवसर है जब संसार के धार्मिक उत्थान के इतिहास में एक नए अध्याय का सृजन नारायणी तट के समीप बसे जानकी नगर में संसार के सबसे बड़े शिवलिंग की स्थापना के प्रथम चरण के पूर्ण होने के साथ होगा।

    महादेव की जटा से निकली गंगा (गंगोत्री), नारायण की नगरी अयोध्या में प्रवाहित होनेवाली माता सरयू, नारायण के रूप शालीग्राम को धारण करनेवाली नारायणी सहित मानसरोवर, रामेश्वरम, सिंधु, कावेरी, यमुनोत्री, गंगा-सागर, गंगा-यमुना व सरस्वती के संगम स्थान प्रयागराज के जल से सहस्त्रलिंगम का अभिषेक व पूजा होगी।

    एक यज्ञ का भी आयोजन किया जाएगा, जिसमें चारों वेदों तथा आगम की पद्धति के विद्वान रहेंगे। पूजा पं. भवनाथ झा की देखरेख में होगी। अयोध्या से भी पंडित भी बुलाए गए हैं।

    चौदह साल किए गए तप की ज्योति का प्रकाश देवाधिदेव की पूजा का अवसर

    भोलेनाथ की पूजा का यह अवसर 14 साल किए गए तप से निकली ज्योति का प्रकाश है। संसार के सबसे दिव्य व भव्य विराट रामायण मंदिर के प्रथम चरण के आकार लेने के बाद अब भोले भंडारी को बुलाने की तैयारी है।

    यहां बता दें कि वर्ष 2012 में बिहार धार्मिक न्यास पर्षद के तत्कालीन अध्यक्ष आचार्य किशोर कुणाल ने कैथवलिया में विराट रामायण मंदिर निर्माण का सपना देखा। लंबी कवायद के बाद इसे 20 जून 2023 को तब आकार मिलना शुरू हुआ, जब आचार्य के नेतृत्व में शिला पूजा संग निर्माण कार्य शुरू हुआ। चौदहवें साल में पहले देव के रूप में इस परिसर में देवाधिदेव पधार रहे हैं।

    कंबोडिया सरकार की आपत्ति का किशोर ने किया था निराकरण

    मंदिर निर्माण की परिकल्पना के बीच कंबोडिया की सरकार ने आपत्ति दर्ज करा दी थी कि विराट रामायण मंदिर का जो स्वरूप है, वह वहां के अंकोरवाट मंदिर से मिलता है।

    इसके बाद मंदिर के स्वरूप की समीक्षा की गई और कंबोडिया सरकार को आचार्य किशोर कुणाल ने संतुष्ट करा दिया। इसी के साथ पूर्वी चंपारण संग पूरे बिहार को इस बात का गौरव हासिल हुआ कि विश्व का सबसे भव्य, दिव्य व रम्य मंदिर का निर्माण यहां हो रहा। राजधानी पटना से विराट रामायण मंदिर की दूरी करीब 120 किलोमीटर है।

    चोल वंश व राजा भोज के बनवाए मंदिरों से ज्यादा है सहस्त्रलिंगम की ऊंचाई 

    धर्म के जानकार बताते हैं कि तमिलनाडु के तंजाउर में चोल वंश द्वारा बनवाए गए मंदिर में स्थापित शिवलिंग की ऊंचाई 27 फीट है। भोपाल के भोजपुर में राजा भोज द्वारा बनवाए गए मंदिर में स्थापित शिवलिंग की ऊंचाई 20 फीट है।

    विराट रामायण मंदिर में स्थापित हो रहे शिवलिंग की ऊंचाई 33 फीट है। शिवलिंग निर्माण का काम तमिलनाडु के महाबलीपुरम के पट्टीकाडू गांव में 10 साल तक चला था।

    शिवलिंग निर्माण में ब्लैक ग्रेनाइट मोनोलिथ पत्थर का उपयोग किया गया है। वजन 210 टन है। इसे 1008 सहस्त्रलिंगम के रूप में तैयार किया गया है।

    पीठ पूजा संग शुरू हो गई नंदी की प्रतिमा निर्माण की प्रक्रिया 

    विराट रामायण मंदिर के प्रवेश द्वार, गणेश स्थल, सिंह द्वार, नंदी, शिवलिंग, गर्भ गृह की नींव का काम पूरा हो गया है। पीठ पूजा के पहले से ही अब महादेव के अनन्य भक्त नंदी की प्रतिमा निर्माण की प्रक्रिया शुरू की गई है।

    मंदिर के आकार की बात करें तो यह 1080 फीट लंबा और 540 फीट चौड़ा होगा। इसमें कुल 18 शिखर और 22 मंदिर होंगे। मुख्य शिखर की ऊंचाई 270 फीट, चार शिखर की ऊंचाई 180 फीट, एक शिखर की ऊंचाई 135 फीट, आठ शिखर की ऊंचाई 108 फीट और एक शिखर की ऊंचाई 90 फीट होगी। मंदिर परिसर 120 एकड़ में फैला है।

    नरक निवारण चतुर्दशी को हुई थी शिवलिंग की उत्पति, उसी तिथि पर पीठ पूजा 

    सहस्रशिवलिंग की पीठ स्थापना पूजा माघ कृष्ण चतुर्दशी तिथि को यानी नरक निवारण चतुर्दशी की पुण्य तिथि यानी 17 जनवरी शनिवार को हो रही। यह दिन शिवरात्रि के समान ही शिवपूजा के लिए मान्य है।

    ईशान संहिता के अनुसार नरक निवारण चतुर्दशी के दिन शिवलिंग की उत्पत्ति हुई थी। पहली बार श्रद्धालुओं ने भगवान शिव की पूजा शिवलिंग के रूप में की थी। इस दिन परंपरा से लोग व्रत भी रखते हैं।