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    Bihar Election: सीट शेयरिंग से खुश नहीं हैं चिराग पासवान, बहनोई के जरिए NDA पर बना रहे दबाव

    Updated: Sat, 30 Aug 2025 02:32 PM (IST)

    बिहार विधानसभा चुनाव में एनडीए के सीट बंटवारे पर अभी भी सहमति नहीं बन पाई है। जदयू भाजपा और अन्य सहयोगी दलों के बीच सीटों का बंटवारा लगभग तय है लेकिन चिराग पासवान की लोक जनशक्ति पार्टी 40 से ज्यादा सीटें मांग रही है जिससे मामला उलझ गया है। चिराग के इस रुख से एनडीए में असमंजस की स्थिति है।

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    सीट शेयरिंग में एनडीए पर दबाव बना रहे चिराग

    दीनानाथ साहनी, पटना। बिहार विधानसभा चुनाव में एनडीए की सीट शेयरिंग का फार्मूला तो लगभग तैयार है, लेकिन आखिरी फैसले के लिए एक बार फिर बड़े नेताओं की बैठक होनी है।

    एनडीए कोआर्डिनेशन कमेटी के एक सदस्य के मुताबिक सीट शेयरिंग में जदयू 102, भाजपा 101, हिंदुस्तानी अवाम मोर्चा (10) और राष्ट्रीय लोक मोर्चा की 10 सीटों पर करीब-करीब सहमति बन चुकी है, लेकिन लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) को मिले 20 सीटों से उसके प्रमुख चिराग पासवान संतुष्ट नहीं हैं। उन्हें संतुष्ट करने के लिए भाजपा के आलाकमान को लगाया गया है।

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    चिराग अपनी पार्टी के लिए 40 से ज्यादा सीटों पर दावेदारी पेश कर रहे हैं और एनडीए पर दबाव बना रहे हैं। इसके लिए चिराग ने अपने बहनोई और जमुई के सांसद अरुण भारती को आगे कर दिया है। अरुण भारती ने 43 से 103 सीटें मांग कर चिराग के गेंद को एनडीए के घटक दलों के पाले में डाल दिया है।

    40 से ज्यादा सीटों की मांग से एनडीए में असमंजस

    मौजूदा बिहार विधानसभा का कार्यकाल 22 नवंबर को समाप्त हो रहा है। ऐसे में चुनाव की तारीखों की घोषणा जल्द होनी है। इससे पहले एनडीए में सीट बंटवारे को लेकर चिराग का

    प्रेशर पालिटिक्स से एनडीए में माहौल गरमा गया है। इस संबंध में भाजपा के एक वरिष्ठ नेता ने बताया कि जदयू को गठबंधन का ''बड़ा भाई'' मानते हुए उसे ज्यादा सीटें देने पर सहमति बन चुकी है।

    हालांकि, चिराग पासवान की लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) ने 40 सीटों से ज्यादा की मांग कर सबको असमंजस में डाल दिया है। यूं कहें कि चिराग की मांग ने एनडीए के समीकरण को पेचीदा बना दिया है।

    राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि चिराग पासवान का दबाव उनकी पार्टी के कार्यकर्ताओं का मनोबल ऊंचा रखने के लिए है, लेकिन जदयू किसी भी कीमत पर उन्हें बड़ा हिस्सा देने को तैयार नहीं। हालांकि सीट शेयरिंग पर चिराग पासवान को थोड़ा समझौता करना होगा।

    2020 में लक्ष्य से दूर रहे चिराग

    अक्टूबर 2020 में रामविलास पासवान का निधन हो गया। उस साल नवंबर में हुए विधानसभा चुनाव में चिराग ने खुद को आजमाया। लोजपा के उम्मीदवार 145 सीटों पर लड़े। एक पर जीत हुई।

    लोजपा को 5.66 प्रतिशत वोट मिला। इस चुनाव में चिराग के दो लक्ष्य थे-उनकी मदद से भाजपा की अगुआई में सरकार का गठन और नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री बनने से रोकना। उन्हें दोनों प्रत्यक्ष लक्ष्य हासिल नहीं हुआ।

    बाद के दिनों में पता चला कि जदयू को कमजोर करना ही उनका असली लक्ष्य था, जिसे उन्होंने हासिल कर लिया। 71 विधायकों के साथ चुनाव मैदान में गया जदयू जब परिणाम के साथ लौटा तो उसके विधायकों की संख्या 41 रह गई थी।

    तब जदयू ने भी स्वीकार किया था कि चुनाव में उसकी खराब उपलब्धि के लिए लोजपा जिम्मेवार है, जिसे भाजपा ने प्रायोजित किया था। उस वक्त जदयू-भाजपा के बीच मनमुटाव में चिराग फैक्टर बहुत कारगर रहा था।

    रामविलास की विरासत

    लोजपा की स्थापना 2003 में हुई। वह पहली बार 2005 के फरवरी में हुए विधानसभा चुनाव में अकेले लड़ी। 178 में से 29 उम्मीदवार जीते। 12.62 प्रतिशत वोट मिला। यह लोजपा का अब तक का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन है।

    उसी साल नवंबर के विस चुनाव में लोजपा के उम्मीदवारों की संख्या 203 हो गई। जीत सिर्फ 10 सीटों पर हुई। वोट प्रतिशत भी 11.10 प्रतिशत पर आ गया। लोजपा 2010 का विधानसभा चुनाव राजद से मिलकर और 2015 का विधानसभा चुनाव भाजपा की साझेदारी में लड़ी।

    वोट प्रतिशत क्रमश: 6.74 और 4. 83 रहा। इस लिहाज से 2020 के चुनाव में अपने दम पर 5.66 प्रतिशत वोट चिराग की पार्टी को हासिल हुआ था।