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    तेजस्वी का बैंगन दान; तेज प्रताप का दही-चूड़ा दरबार, मकर संक्रांति पर लालू परिवार की 'खामोश' राजनीति

    Updated: Thu, 15 Jan 2026 10:10 AM (IST)

    तेजस्वी यादव ने तेज प्रताप के दही-चूड़ा भोज से दूरी बनाकर मकर संक्रांति पर लालू परिवार की 'खामोश राजनीति' का संकेत दिया। तेजस्वी ने खिचड़ी में बैंगन द ...और पढ़ें

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    मकर संक्रांति पर लालू परिवार की 'खामोश' राजनीति

    राधा कृष्ण, पटना। मकर संक्रांति के मौके पर बिहार की राजनीति में इस बार तिल-गुड़ से ज्यादा चर्चा दही-चूड़ा और बैंगन की रही। नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव ने खिचड़ी में बैंगन दान कर परंपरा निभा दी, लेकिन बड़े भाई तेज प्रताप यादव के दही-चूड़ा दरबार से दूरी बनाकर एक गहरा सियासी संकेत भी दे दिया।

    बिहार की राजनीति में यह पर्व महज धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि सत्ता, समीकरण और संदेश का प्रतीक माना जाता है। कौन किसके घर दही-चूड़ा खाता है, यह बताता है कि सियासत की थाली में किसकी हिस्सेदारी कितनी है। कभी लालू प्रसाद यादव और राबड़ी देवी के आवास पर मकर संक्रांति का भव्य आयोजन राजनीतिक ताकत का पैमाना हुआ करता था, लेकिन इस बार वहां सन्नाटा रहा।

    विरासत का यह शून्य तेज प्रताप यादव के आंगन में भरा नजर आया, जहां राजनीति, परंपरा और शक्ति प्रदर्शन एक साथ दिखे। यही वजह है कि इस मकर संक्रांति को लालू परिवार की ‘खामोश राजनीति’ के तौर पर देखा जा रहा है।

    दही-चूड़ा और बिहार की राजनीति

    बिहार की राजनीति में मकर संक्रांति सिर्फ पर्व नहीं, बल्कि शक्ति प्रदर्शन और राजनीतिक संकेतों का दिन माना जाता है। किस नेता ने कहां दही-चूड़ा खाया, किसके घर गया और किसे न्योता मिला, यह सब आने वाले राजनीतिक समीकरणों की झलक देता है। इस बार भी मकर संक्रांति ने राजद परिवार के भीतर की खामोश सियासत को सार्वजनिक कर दिया।

    खिचड़ी में बैंगन दान, थाली से दूरी

    नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव ने खिचड़ी में बैंगन दान कर जरूर औपचारिकता निभाई, लेकिन बड़े भाई तेज प्रताप यादव के दही-चूड़ा भोज में शामिल नहीं होकर एक साफ संदेश दे दिया। सियासी गलियारों में इसे 'बैंगन दिया, पर खुद बैंगन नहीं बने' की संज्ञा दी जा रही है। मतलब साफ है, संबंध बने रहें, पर मंच साझा न किया जाए।

    लालू-राबड़ी आवास में सन्नाटा

    जिस मकर संक्रांति पर कभी राबड़ी देवी और लालू प्रसाद यादव के आवास पर भव्य आयोजन होते थे, वहां इस बार सन्नाटा पसरा रहा। वर्षों से चली आ रही यह राजनीतिक-सांस्कृतिक विरासत इस बार छोटे बेटे के बजाय बड़े बेटे तेज प्रताप यादव के आंगन में नजर आई। यही बदलाव इस आयोजन को साधारण से खास बना गया।

    तेज प्रताप के आंगन में विरासत

    तेज प्रताप यादव ने इस मौके को सिर्फ भोज तक सीमित नहीं रखा, बल्कि इसे राजनीतिक उपस्थिति में बदल दिया। राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान और लालू यादव को आमंत्रित करना, शकुनी मामा कहे जाने वाले कई वरिष्ठ नेताओं की मौजूदगी, यह सब बताता है कि तेज प्रताप अपनी जगह बनाने की कोशिश में कोई कसर नहीं छोड़ रहे।

    तेजस्वी की गैरहाजिरी पर चर्चाएं

    तेजस्वी यादव की गैरहाजिरी को लेकर कई तरह की व्याख्याएं की जा रही हैं। कुछ लोग कहते हैं कि वह अब नए दौर की राजनीति, क्रिसमस, हेलोवीन और आधुनिक आयोजनों, में ज्यादा सक्रिय हैं। वहीं पारंपरिक दही-चूड़ा की विरासत अनजाने में ही उनके बड़े भाई के हिस्से आ गई।

    गोद में बच्चे, पर दूरी बरकरार

    तेज प्रताप द्वारा तेजस्वी के बच्चों को गोद में खिलाने की तस्वीरें जरूर भावनात्मक संदेश देती हैं, लेकिन इससे सियासी दूरी कम होती नहीं दिखी। जानकार मानते हैं कि तेजस्वी लालू कुनबे की चल-अचल और राजनीतिक विरासत में किसी भी तरह का बंटवारा नहीं होने देना चाहते।

    अपने दम पर आगे बढ़ने की सलाह

    राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि तेज प्रताप यादव को अब यह सच्चाई स्वीकार कर अपने दम पर मजबूती से आगे बढ़ना होगा। पिता की विरासत की छाया में नहीं, बल्कि अपनी राजनीतिक जमीन खुद तैयार करनी होगी।

    खिचड़ी में बैंगन: परंपरा या प्रयोग?

    अंत में सबसे दिलचस्प सवाल यही है, क्या खिचड़ी में बैंगन दान करने की कोई परंपरा है? आमतौर पर छीमी, आलू, गाजर और दाल-चावल का दान देखा गया है, लेकिन बैंगन? न देखा, न सुना। शायद यह भी इस बार की राजनीति की तरह एक नया प्रयोग है,जो संकेत ज्यादा देता है, पर जवाब कम।