सियासत के केंद्र में मखाना... बिहार का सुपरफूड बना चुनावी हथियार, बिहार का मखाना बना इंटरनेशनल ब्रांड
मखाना आज बिहार की पहचान है तो राजनीति में भी इसकी धमक है। मखाने का आलम यह है कि इसका असर तीन स्तर पर दिखता है आर्थिक सांस्कृतिक और राजनीतिक। बिहार के पानी में उगने वाले इस मखाने को आज सुपर फूड कहा जाने लगा है।मखाना इन दिनों अपने स्वाद और सेहत की बजाय राजनीति की वजह से चर्चा में है।

सुनील राज, पटना। मखाना आज बिहार की पहचान है तो राजनीति में भी इसकी धमक है। मखाने का आलम यह है कि इसका असर तीन स्तर पर दिखता है आर्थिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक। बिहार के पानी में उगने वाले इस मखाने को आज सुपर फूड कहा जाने लगा है। एक आकलन के मुताबिक अकेले बिहार में करीब तीन लाख से अधिक किसान और मजदूर मखाना की खेती व प्रोसेसिंग से जुड़े हैं। परंतु यह मखाना इन दिनों अपने स्वाद और सेहत की बजाय राजनीति की वजह से चर्चा में है।
चुनाव के पहले सरकार को घेरने सड़कों पर उतरा विपक्ष मखाना किसानों के दुख, पीड़ा, बिचौलियों की मार को मुद्दा बनाने में जुटा है। लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने इसकी पहल की जिसमें अब निषाद नेता मुकेश सहनी भी कूद गए हैं। हालांकि विधानसभा ने नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव इस मुद्दे पर फिलहाल मौन हैं। दरअसल राहुल गांधी और तेजस्वी यादव महागठबंधन के अपने अन्य सहयोगियों के साथ बिहार के गांव, बघार में घूमकर एसआइआर के बहाने सरकार के खिलाफ लामबंदी में जुटे हैं। ये नेता वोटर अधिकार यात्रा के जरिये चुनाव आयोग और सरकार की नीतियों की खामियों के खिलाफत कर अपनी चुनावी जमीन तैयार कर रहे हैं।
इसी कड़ी में चंद रोज पहले महागठबंधन के नेता कटिहार पहुंचे। जहां राहुल गांधी मखाना की खेती की तकनीकी समझने वे पानी मे भी उतरे। इसके बाद क्रमश: उन्होंने मखाना किसानों से बात की। किसानों ने उन्हें खेती में होने वाले संकट, बाजार तक इसे पहुंचाने की जद्दोजहद से लेकर बिचौलियों के खेल तक कि जानकारी दी। जिसके बाद राहुल गांधी ने अपने एक्स हैंडल पर मखाना किसानों की बात उठाई और सरकार तक को घेरा। उन्होंने लिखा कि आपका सुपर फूड मखाना, बिहार के किसानों के खून-पसीने का उत्पाद है। बिक्री हजारों में, मगर आमदनी कौडिय़ों में पूरा मुनाफा सिर्फ बिचौलियों का।
बिहार दुनिया का 90 प्रतिशत मखाना उगाता है, मगर दिन-रात धूप-पानी में मेहनत करने वाले किसान-मज़दूर मुनाफे का एक प्रतिशत भी नहीं कमाते हैं। बड़े शहरों में 1000-2000 रुपए किलो बिकता है। पर मेहनतकशों, पूरे उद्योग की नींव को, नाम मात्र का दाम मिलता है। कौन हैं ये किसान-मज़दूर, अतिपिछड़े, दलित-बहुजन। पूरी मेहनत इन 99 प्रतिशत बहुजनों की और फायदा सिर्फ एक प्रतिशत बिचौलियों का। हमारी लड़ाई इसी अन्याय के खिलाफ है। बात यही नहीं थमी, राहुल का साथ देने वीआइपी नेता मुकेश सहनी भी कूद पड़े।
सहनी ने कहा कि बिहार में हमारी सरकार बनने पर मखाना का न्यूनतम समर्थन मूल्य तय होगा, मखाना मजदूरों को सरकारी गारंटी पर सस्ता ऋण मिलेगा, प्रमंडल स्तर पर मंडी की व्यवस्था होगी, गोदाम की सुविधा दी जाएगी और बिचौलिया मुक्त खरीद-फरोख्त होगी। राहुल गांधी के पूर्व कुछ दिनों पहले फरवरी में केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान भी बिहार आए रहे। इस दौरे में वे दरभंगा गए जहां तालाब में उतरकर उन्होंने मखाना किसानों से उनकी खेती, बाजार, तकलीफों पर विस्तार से बात की थी। यहां उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में गहराई में जाकर किसानों की तकलीफ दूर करने की कोशिश होगी। किसानों की तकलीफ देखे बिना कृषि भवन में बैठ मखाना बोर्ड नहीं बनाया जा सकता।
एक पहलू यह भी
असल में पक्ष-विपक्ष दोनों मखाना किसानों के हिमायती होने की बात कर रहे हैं। लेकिन मखाना किसानों को लेकर राजनीति से परे किसानों के हित मे सरकार के काम जारी हैं। राज्य सरकार के प्रयास से 2022 में मिथिला मखाना को जीआई टैग मिला, जिससे इसकी अंतरराष्ट्रीय मार्केटिंग और मजबूत हुई। नीतीश कुमार की सरकार ने मखाना मिशन शुरू किया है, ताकि खेती, भंडारण और पैकेजिंग को बढ़ावा मिले। विशेषज्ञ मानते हैं कि यदि सरकार सही सप्लाई चेन और वैल्यू ऐडिशन करे तो आने वाले सालों में बिहार का मखाना बासमती चावल और दार्जिलिंग चाय की तरह एक इंटरनेशनल ब्रांड बन सकता है।
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