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    दरकंधा के दरिया दास मठ की दुर्दशा... प्रशासनिक उपेक्षा के कारण विलुप्त होने के कगार पर

    Updated: Sat, 30 Aug 2025 02:47 PM (IST)

    फ्रांसीसी यात्री बुकनान ने अपनी पुस्तक ए टूर रिपोर्ट ऑफ नॉर्दर्न इंडिया (वर्ष 1812 -13) में दरिया दास साहब के संबंध में उल्लेख करते हुए लिखा है कि उनके अनुयायियों की संख्या काफी थी जो पुराने शाहाबाद सारण जिलों साथ के साथ उत्तर प्रदेश तथा हरियाणा तक फैले हुए थे। जिनकी संख्या लगभग 20 हजार से अधिक बतायी जाती है।

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    ऐतिहासिक एवं धार्मिक धरोहर दरिया दास मठ उपेक्षा का शिकार

    संवाद सूत्र दिनारा (रोहतास)। प्रखंड क्षेत्र के धरकंधा में स्थित दरिया दास मठ एक राष्ट्रीय ऐतिहासिक एवं धार्मिक धरोहर के रूप में विकसित होने होने योग्य है लेकिन स्थानीय लोगों एवं प्रशासनिक उपेक्षा के कारण यह विलुप्त होने के कगार पर खड़ा है। 16वीं शताब्दी के आसपास भारतीय समाज जब  रूढ़िवादी आडंबरों सहित अन्य विकृतियों से जकड़ा हुआ था उस समय कबीर, नानक, दादू,शिवनारायण दास, दरिया दास आदि  कई महान संतों का प्रादुर्भाव हुआ। इन महान संतों ने समाज में  रूढ़िवादी आडंबरों को समाप्त करने के उद्देश्य से अलग-अलग पंथों की स्थापना की।

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    उन्ही में से एक दरिया दास ने दरिया पंथों की स्थापना की। दरिया दास का जन्म दिनारा प्रखंड के धरकंधा गांव में 1634 ई  में माना जाता है। आज भी धरकंधा गांव में दरिया साहब का मठ विद्यमान है। मठ के पुस्तकालय में दरिया साहब द्वारा स्वहस्तलिखित पांडुलिपियों के अध्ययन से पता चलता है कि वे नानक, कबीर की तरह निर्गुण ब्रह्म के उपासक थे। उन्होंने सत्पुरुष, जीव, शरीर, पुनर्जन्म, कर्म सिद्धांत, मुक्ति, स्वर्ग, नरक आदि की व्याख्या संतमत के परंपरा सिद्धांतों का अनुरूप की है।

    दरिया साहब मूर्ति पूजा को नहीं मानते थे और जात-पात, छुआ छूत के विरोधी थे। उनके लिखित पुस्तक के अनुसार "मिट्टी भर बर्तन बहुत तेरा, अलख ब्रह्म  तेहि भीतर डेरा।। जात-पात नहीं पूछिए, पूछही निर्मल ज्ञान। संत की जाति अजाति है, जिन पायो पद निर्वान।।"ऐसी चर्चा मिलती है की दरिया साहब बगल के मां यक्षिणी भवानी मंदिर में बली पूजा का विरोध किया था। तभी से वहां बली पूजा आज तक बंद है। उन्होंने सत्पुरुष को सर्वव्यापी माना तथा वही सच्चा मित्र है। इस छदभंगुर संसार में वह नाविक के समान है और उसका नाम ही जहाज है वह जीवन का उद्धार करने वाला है।

    फ्रांसीसी यात्री बुकनान ने अपनी पुस्तक ए टूर रिपोर्ट ऑफ नॉर्दर्न इंडिया (वर्ष 1812 -13) में दरिया दास साहब के संबंध में उल्लेख करते हुए लिखा है कि उनके अनुयायियों की संख्या काफी थी जो पुराने शाहाबाद, सारण जिलों साथ के साथ उत्तर प्रदेश तथा हरियाणा तक फैले हुए थे। जिनकी संख्या लगभग 20 हजार से अधिक बतायी जाती है। डॉ धर्मेंद्र ब्रह्मचारी के शोध ग्रंथ में दरिया साहब द्वारा लिखित 20 पुस्तकों का उल्लेख है।

    जिनमें अग्रज्ञान, अमरसार, ब्रह्म चेतना दरियानामा, दरिया सागर, गणेश गोष्टी, कलव चरित्र, मूर्ति खंड आदि शामिल है। दरिया पंथ के मुख्य चार मठ धरकंधा (दिनारा), तेलपा एवं मिर्जापुर (छपरा), दलसी (गोपालगंज) के अलावे उत्तर प्रदेश, हरियाणा सहित देश के विभिन्न भागों में लगभग 300 मठ हैं।

    दरिया साहब ने जिस प्रकार से अंग्रेजी शासन के विरुद्ध अपने मत का प्रचार प्रसार कर पूरे बिहार ही नहीं संपूर्ण देश को एक नई दिशा प्रदान की वह अवर्णनीय है। साथी उन्होंने समाज में व्याप्त कुरीतियों तथा आडंबरों को समाप्त करने के लिए भी आंदोलन चलाया। उन्होंने बताया कि समकालीन नवाब मीर काशीम ने महान संत दरिया दास से प्रभावित होकर लगन मुक्त 101 बीघा जमीन भेंट दिया था लेकिन आज प्रशासन एवं स्थानीय लोगों की उदासीनता के कारण कुछ असमाजिक तत्वों द्वारा अधिकांश जमीन को हड़प लिया गया है। आज इस बात का दुख है की हम लोग उस महान संत को भूलते जा रहे हैं तथा राष्ट्रीय धरोहर के रूप में विकसित होने योग्य दरिया दास मठ आज विलुप्त होने के कगार पर खड़ा है।

    दरिया दास मठ एक प्रसिद्ध धार्मिक स्थल तथा राष्ट्रीय धरोहर है। इस पर्यटक स्थल के रूप में विकसित किया जाना चाहिए। लेकिन प्रशासनिक तथा सरकारी उपेक्षा के कारण यह राष्ट्रीय धरोहर धीरे-धीरे विलुप्त होने के कगार पर है।

    महंत इंद्रदेव दास