इस भारतीय सेठ की मुगल-अंग्रेज भी करते थे गुलामी, ब्रिटेन बैंक से भी ज्यादा थी दौलत; आज कहां हैं इसके वंशज?
एक समय था जब मुगल और अंग्रेज भी एक भारतीय सेठ की गुलामी करते थे। उनकी संपत्ति ब्रिटेन के बैंक से भी ज्यादा थी। जगत सेठ परिवार 18वीं शताब्दी में भारत के सबसे धनी परिवारों में से एक था, जिन्होंने बैंकिंग और साहूकारी के कारोबार से मुगल बादशाहों और ईस्ट इंडिया कंपनी को कर्ज दिया। आज उनके वंशजों के बारे में बहुत कम जानकारी है।

हम जिस परिवार की बात कर रहे हैं उसका नाम जगत सेठ था।
नई दिल्ली। हम आपको उस भारतीय परिवार की कहानी बता रहे हैं, जो इतना अमीर था कि अमीरी भी शरमा जाए! जिसने मुगलों को उधार दिया, अंग्रेजों को कर्ज दिया और अंत में इतिहास को एक सवाल दिया कि, ''जो दुनिया को कर्ज देता हो, उसे भला कोई कैसे कंगाल कर दिया? तो चलिए इस सवाल का जवाब जानते हैं।
हम जिस परिवार की बात कर रहे हैं उसका नाम जगत सेठ था। जिनकी दौलत को देखकर आज के आज के एलन मस्क, जेफ बेजोस और बिल गेट्स भी फीके पड़ जाएं। जगत सेठ की कुल संपत्ति आज के मूल्य में लगभग 8.3 लाख करोड़ रुपये थी और जो मुगलों से लेकर ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी तक को कर्ज देते थे।
18वीं सदी के बंगाल में एक बैंकर थे फतेह चंद, जिन्हें “जगत सेठ” (यानी विश्व का सेठ या बैंकर ऑफ द वर्ल्ड) की उपाधि मिली। जगत सेठ खानदान की जड़ें पटना के माणिक चंद से जुड़ी हैं, जो 1700 के शुरुआती दशक में व्यापार करने ढाका आए।
जब बंगाल की राजधानी ढाका से मुर्शिदाबाद स्थानांतरित हुई, तो माणिक चंद भी वहां चले गए। मुर्शिदाबाद में वे नवाब के चहेते बन गए और नवाब के निजी बैंकर व वित्तीय सलाहकार बन बैठे। सन् 1712 में दिल्ली के बादशाह फर्रुखसियर ने उन्हें 'नागर सेठ' की उपाधि दी।
जगत सेठ परिवार का उदय
1714 में माणिक चंद की मृत्यु के बाद उनका भतीजा और दत्तक पुत्र फतेह चंद ने कारोबार संभाला। फतेह चंद के नेतृत्व में यह परिवार इतना शक्तिशाली हो गया कि ईस्ट इंडिया कंपनी भी इनसे उधार लेती थी, सोना-चांदी खरीदती-बेचती थी।
ब्रिटिश इतिहासकार रॉबर्ट ओर्मे ने लिखा है कि मुगल साम्राज्य में यह हिंदू व्यापारी परिवार सबसे धनी था और मुर्शिदाबाद की सरकार पर इसका जबरदस्त प्रभाव था।
बैंकिंग साम्राज्य
जगत सेठों की तुलना उस समय के बैंक ऑफ इंग्लैंड से की जाती थी। बंगाल सरकार के लिए ये रेवेन्यू वसूलते थे, सरकारी खजमा रखते थे, सिक्के ढालते थे और विदेशी मुद्रा का लेन-देन करते थे। कुछ समकालीन विवरणों के अनुसार 1720 के दशक में जगत सेठों की दौलत ब्रिटिश अर्थव्यवस्था से भी ज्यादा थी। कहा जाता है कि उनके पास नकद राशि इंग्लैंड के सभी बैंकों को मिलाकर उससे भी अधिक थी। आज के मूल्य में उनकी संपत्ति कम-से-कम 1 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर (लगभग ₹8.3 लाख करोड़) आंकी जाती है।
उत्तराधिकारी और राजनीतिक प्रभाव
फतेह चंद के बाद 1744 में उनका पोता महताब चंद गद्दी पर बैठा। महताब चंद और उनके चचेरे भाई महाराजा स्वरूप चंद का अलीवर्दी खान के समय बहुत दबदबा था। लेकिन जब सिराजुद्दौला नवाब बना तो जगत सेठों ने अंग्रेजों के साथ मिलकर उसके खिलाफ साजिश रची, जिसके परिणामस्वरूप 1757 में प्लासी का युद्ध हुआ और बंगाल पर ब्रिटिश कब्जा हो गया।
इसके बाद जगत सेठों ने अपनी अधिकांश जमीनें गँवा दीं और कंपनी ने उन्हें दिया गया भारी-भरकम कर्ज कभी लौटाया ही नहीं। 1857 के विद्रोह ने इस खानदान को अंतिम झटका दिया।
अंत और वर्तमान
1900 आते-आते जगत सेठ सार्वजनिक जीवन से पूरी तरह गायब हो चुके थे। उनके वंशज आज कहां हैं, यह किसी को नहीं पता, ठीक वैसे ही जैसे मुगल वंशज अज्ञात हैं। मुर्शिदाबाद में हजादुआरी पैलेस से थोड़ी ही दूरी पर जगत सेठ का भव्य महल आज एक संग्रहालय बन चुका है, जहां उस अतुलनीय वैभव की बस कुछ यादें शेष हैं।
एक समय था जब एक भारतीय परिवार दुनिया का सबसे बड़ा बैंकर था और आज हम उसे लगभग भूल ही चुके हैं।

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