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    वैवाहिक विवाद हो पर तालाक न हुआ तो पति की मृत्यु पर पत्नी को पेंशन से वंचित नहीं रख सकते: दिल्ली हाई कोर्ट

    Updated: Fri, 29 Aug 2025 08:51 PM (IST)

    दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा कि तलाक न होने पर पत्नी को पारिवारिक पेंशन से वंचित नहीं किया जा सकता भले ही आवेदन में देरी हो। कोर्ट ने एक महिला की याचिका पर सुनवाई करते हुए यह फैसला सुनाया जिसके पति का निधन 2009 में हुआ था। अदालत ने सरकार को 2009 से बकाया पेंशन ब्याज समेत देने का आदेश दिया। वैवाहिक विवाद के बावजूद पत्नी पेंशन की हकदार है।

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    दिल्ली हाई कोर्ट ने पत्नी की याचिका पर दिया आदेश।

    जागरण संवाददाता, नई दिल्ली। दिल्ली हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि पति-पत्नी के बीच वैवाहिक विवाद हो, लेकिन तलाक की स्थिति न बनी हो, तो पति की मृत्यु के बाद पत्नी को पारिवारिक पेंशन से वंचित नहीं किया जा सकता।

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    कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि पत्नी द्वारा आवेदन करने में देरी होने मात्र से उसके अधिकार खत्म नहीं हो जाते। न्यायमूर्ति नवीन चावला और न्यायमूर्ति मधु जैन की पीठ ने यह आदेश उस महिला की याचिका पर दिया, जिसके पति का निधन 2009 में हुआ था।

    महिला ने 2013 में सरकार के समक्ष पारिवारिक पेंशन के लिए आवेदन किया। केंद्रीय प्रशासनिक न्यायाधिकरण ने उसे पेंशन देने का आदेश तो दिया, लेकिन बकाया राशि सिर्फ 2014 से मंजूर की थी।

    सरकार ने दावा किया कि मृतक ने अपनी पारिवारिक सूची में पत्नी का नाम नहीं लिखा था और उनके बीच वैवाहिक विवाद था। महिला ने तर्क दिया कि वह कानूनी रूप से पत्नी थी और कोई अन्य व्यक्ति पेंशन का दावा नहीं कर रहा, इसलिए पेंशन रोकने का कोई औचित्य नहीं है।

    पीठ ने कहा कि सरकार की यह दलील कि महिला को पति की मृत्यु की जानकारी नहीं थी और पेंशन के लिए आवेदन देरी से किया गया, पत्नी के अधिकार को प्रभावित नहीं कर सकती।

    पीठ ने कहा कि याचिकाकर्ता (पत्नी) ने मृतक से रखरखाव की मांग की थी, स्पष्ट है कि उनके बीच वैवाहिक विवाद थे। इसी के चलते, जब तक यह विवाद तलाक में नहीं बदल जाता, पत्नी को पारिवारिक पेंशन से वंचित नहीं किया जा सकता।

    हाईकोर्ट ने केंद्रीय प्रशासनिक न्यायाधिकरण का आदेश को खारिज करते हुए कहा कि महिला को पेंशन उसके पति की मृत्यु की तिथि से ही मिलनी चाहिए।

    अदालत ने यह भी कहा कि सिर्फ इसलिए पत्नी का अधिकार खत्म नहीं हो सकता कि पति ने उसे परिवार की सूची में शामिल नहीं किया था। कोर्ट ने केंद्र सरकार को निर्देश दिया कि वर्ष 2009 से बकाया पेंशन राशि चार माह के भीतर ब्याज सहित महिला को दी जाए।

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